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आपदा में अवसर: अमेरिका विरोधी भावना ने करीब ला दिया है ईरान और तालिबान को

Mon, 30 Aug 2021 07:26 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 30 Aug 2021 07:26 PM IST
सार

ईरान की अफगानिस्तान के साथ कुल 921 किलोमीटर तक सीमा लगती है। पहले इस सीमा को पार कर बड़ी संख्या में शरणार्थी ईरान चले गए थे। ईरान में 30 लाख से ज्यादा अफगान शरणार्थी रहते हैं। इसके अलावा ऐसे अनगिनत अफगान भी वहां हैं, जिनका ब्योरा मौजूद नहीं है....

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Iran explores trade, security, transport and energy cooperation agreement with Taliban regime
ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

काबुल में तालिबान की सत्ता कायम होने से ईरान बहुत परेशान नहीं है। बल्कि उसने सीमा-पार पैदा हुए संकट को अवसर में तब्दील करने की कोशिश शुरू कर दी है। ऐसी खबर है कि वह तालिबान शासन के साथ व्यापार, सुरक्षा, परिवहन और ऊर्जा सहयोग के समझौतों की संभावना तलाश रहा है। अतीत में तालिबान से ईरान के संबंध खराब रहे हैं। इसके अलावा अनुमान था कि अपनी सीमा से लगे देश में कट्टर सुन्नी राज कायम होना शिया देश ईरान को पसंद नहीं आएगा। लेकिन शुरुआती संकेत इसके उलट हैं।

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ईरान की अफगानिस्तान के साथ कुल 921 किलोमीटर तक सीमा लगती है। पहले इस सीमा को पार कर बड़ी संख्या में शरणार्थी ईरान चले गए थे। ईरान में 30 लाख से ज्यादा अफगान शरणार्थी रहते हैं। इसके अलावा ऐसे अनगिनत अफगान भी वहां हैं, जिनका ब्योरा मौजूद नहीं है। ये समस्या ईरान और अफगानिस्तान के बीच तनाव का एक बड़ा मुद्दा रही है।
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फिलहाल, दोनों देशों के बीच सालाना व्यापार दो अरब डॉलर का है। इस लिहाज से ईरान अफगानिस्तान का सबसे बड़ा कारोबार पार्टनर रहा है। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 2019 में ईरान से निर्यात होने वाली चीजों का सबसे बड़ा आयातक अफगानिस्तान रहा था। अफगानिस्तान की कच्चे तेल की 40 फीसदी से भी ज्यादा जरूरत ईरान पूरी करता है।
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इसके अलावा अफगानिस्तान के बहुत से लोगों ने ईरान जाकर पढ़ाई की है। अभी ईरान के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में 40 हजार से ज्यादा अफगानी पढ़ाई कर रहे हैं। ईरान में शिया मुसलमानों के दो पवित्र स्थल- मशाद और कौम हैं। अफगानिस्तान से हर साल दस लाख से ज्यादा तीर्थयात्री इन स्थलों पर जाते हैं। अब ईरान और अफगानिस्तान आपसी संबंधों के सिलसिले में इन पहलुओं पर ज्यादा जोर कर रहे हैं। उनका मकसद यह बताना है कि दोनों देशों में गहरे संबंध बन सकते हैं।

विश्लेषकों के मुताबिक हालांकि अफगानिस्तान में शिया मुसलमानों के दमन सहित कई ऐसे मसले हैं, जिनको लेकर दोनों देशों में तनाव रहा है, लेकिन अमेरिका के प्रति ईरान और तालिबान दोनों में गहरा विरोध भाव है। यही अब उनके बीच नए रिश्ते बनने का आधार बन सकता है। वेबसाइट एशिया टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल तालिबान और ईरान दोनों की सोच यह है कि ‘अमेरिका का दुश्मन हमारा दोस्त है।’

अमेरिका में बोस्टन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एसोसिएट प्रोफेसर जोशुआ खिफ्रिनसन ने एशिया टाइम्स से कहा- ‘अमेरिका विरोधी भावना को ईरान और तालिबान ने अपनी विचारधारा बना लिया है। लेकिन बात इतनी ही नहीं है। बल्कि यह भावना उनकी चिंताओं और आपात जरूरतों को भी जाहिर करती है।’

दूसरे विश्लेषकों का भी कहना है कि ईरान और तालिबान के पास फिलहाल अमेरिका विरोध को तरजीह देने की ठोस वजहें मौजूद हैं। इस वजह से वे अपने आपसी विवादों की फिलहाल अनदेखी कर रहे हैं। इसीलिए हाल में ईरान सरकार ने यह दो टूक कहा कि वह तालिबान के साथ सामान्य संबंध बनाने का इरादा रखती है। उधर 21 अगस्त को ईरान के एक टीवी चैनल पर तालिबान के प्रवक्ता मोहम्मद नईम का लंबा इंटरव्यू दिखाया गया। उसमें नईम ने कहा कि तालिबान ईरान के साथ सम्मानजक और दोस्ताना संबंध बनाना चाहता है।

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