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संयुक्त राष्ट्र करेगा जांच: मानवाधिकार के मुद्दे पर घिरता ही जा रहा है श्रीलंका

Thu, 25 Nov 2021 07:45 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 25 Nov 2021 07:45 PM IST
सार

ब्रिटेन ने अपनी ये रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) को सौंपी है। यूएनएचआरसी ने बीते मार्च में श्रीलंका के बारे में एक प्रस्ताव पारित किया था। उसमें श्रीलंका में मानवाधिकारों की हालत को लेकर गहरी चिंता जताई गई थी...

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International pressure on Sri Lanka on the issue of human rights violations is increasing
श्रीलंका - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

मानवाधिकारों के हनन के मुद्दे पर श्रीलंका पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता जा रहा है। उसके मानवाधिकार रिकॉर्ड की जांच करने के लिए शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टियर श्रीलंका आएंगे। वे यहां तीन दिसंबर तक रहेंगे। इस दौरान श्रीलंका में मजदूरों, खास कर बाल मजदूरों के गंभीर शोषण के आरोपों की जांच करेंगे। ऐसी किसी जांच के लिए विशेष रैपोर्टियर तोमोया ओबोकाता की किसी देश की यह पहली यात्रा है।

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इस बीच ब्रिटेन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि 2021 के पहले छह महीनों में श्रीलंका में मानवाधिकारों की हालत का बिगड़ना जारी रहा। ब्रिटेन ने ये बात मानवाधिकारों की स्थिति के बारे में जारी अपनी ताजा वैश्विक रिपोर्ट में कही है। ये रिपोर्ट उन 31 देशों के बारे में है, जहां की मानवाधिकार की हालत को ब्रिटेन चिंताजनक मानता है। इसमें श्रीलंका की हालत को लेकर गहरी चिंता जताई है। इसमें कहा गया है- ‘पिछले एक साल में जो रूझान दिखे हैं, वे श्रीलंका में मानवाधिकारों की हालत बदतर होने और भविष्य में ऐसे उल्लंघन और बढ़ने के बारे में स्पष्ट संकेत देते हैं।’

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ब्रिटेन की सालाना रिपोर्ट में खुलासा

ब्रिटेन ने अपनी ये रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) को सौंपी है। यूएनएचआरसी ने बीते मार्च में श्रीलंका के बारे में एक प्रस्ताव पारित किया था। उसमें श्रीलंका में मानवाधिकारों की हालत को लेकर गहरी चिंता जताई गई थी। साथ ही उस प्रस्ताव में मानव अधिकार उल्लंघन के मामलों में जवाबदेही तय करने पर जोर दिया गया था।

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अब ब्रिटेन के विदेश, कॉमनवेल्थ, और विकास कार्यालय ने मानव अधिकार और लोकतंत्र के बारे में अपनी सालाना रिपोर्ट जारी की है। इसमें श्रीलंका के बारे में कहा गया है- ‘सुरक्षा बलों ने मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की निगरानी और उन्हें डराने-धमकाने की गतिविधियों में बढ़ोतरी कर दी है। कई लोगों को मनमाने ढंग से गिरफ्तर किया गया है। सरकार ने नए नियम प्रस्तावित किए हैं, जिनके तहत बिना न्यायिक निगरानी के किसी को भी गिरफ्तार करने और उसे डि-रैडिकलाइज करने के लिए पुनर्वास केंद्रों में भेजने के अधिकार उसने हासिल कर लिए हैं।’

विवादित लोगों की नियुक्ति से बवाल

श्रीलंका के राष्ट्रपति ने इस साल हत्या के मामले में सजायाफ्ता हुए एक मुजरिम को क्षमादान दे दिया था। साथ ही सरकार ने स्वतंत्र संस्थाओं के प्रमुख के रूप में विवादित लोगों की नियुक्ति की। साथ ही आरोप है कि श्रीलंका सरकार लगातार तमिल और मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ कदम उठा रही है। इन समुदायों के कई संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। सरकार के इन कदमों ने दुनिया भर में चिंता पैदा की है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसी वजह से श्रीलंका मानवाधिकार संगठनों की चिंता का केंद्र बना हुआ है।



संयुक्त राष्ट्र रैपोर्टियर यहां देश में जारी बाल मजदूरी और मानव तस्करी के मामलों की जांच भी करेंगे। संयुक्त राष्ट्र ऐसी कुप्रथाओं को ‘आधुनिक गुलामी’ की श्रेणी में रखता है। ओबोकाता ने कहा है कि वे यह जानने की कोशिश करेंगे कि इन प्रथाओं को दूर करने में श्रीलंका में अब तक कितनी प्रगति हुई है।

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