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Hindi News ›   World ›   India-Nepal Border Dispute: Boundary Working Group meeting Proposed to resolve the issue

कई महीनों के बाद भारत-नेपाल रिश्तों में आई कड़वाहट कम करने की कोशिश

Thu, 20 Aug 2020 08:15 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 20 Aug 2020 08:15 PM IST
सार

  • दो दौर की बैठकों के बाद अब बाउंड्री वर्किंग ग्रुप की बैठक की तैयारी
  • रिश्ते सामान्य करने की कोशिश में ओली और मोदी ने भी की थी 15 अगस्त को बात
  • भारत जारी रखेगा नेपाल को दी जाने वाली मदद, कोरोना से जंग में भी भारत नेपाल के साथ

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India-Nepal Border Dispute: Boundary Working Group meeting Proposed to resolve the issue
भारत-नेपाल के बीच बातचीत हुई - फोटो : ANI (File Photo)

विस्तार

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भारत और नेपाल के रिश्तों में सीमा विवाद को लेकर आई ताजा खटास को दूर करने की कोशिशें तेज हो गई हैं। इसके लिए दोनों देशों के बीच हाल ही में हुई दो बैठकों के बाद अब अगस्त के अंत या सितंबर की शुरुआत में एक तीसरी अहम बैठक की तैयारी हो रही है। अभी तक हुई दोनों बैठकें खासतौर से नेपाल में भारत की मदद से चल रही परियोजनाओं की समीक्षा करने के नाम पर हुईं और अब जो तीसरी बैठक होने वाली है, वह पूरी तरह मौजूदा सीमा विवाद पर केंद्रित होने की संभावना है।

यह प्रस्तावित बैठक बाउंड्री वर्किंग ग्रुप की है, जिसमें दोनों देशों की सीमा को लेकर चलने वाले विवादों को हल करने या फिर कोई बीच का रास्ता निकालने की बात होती है। जानकारों का मानना है कि ये बैठकें दोनों देशों के बीच के रिश्तों को फिर से ठीक करने की दिशा में अहम कदम हैं।

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नेपाल के विदेश मंत्रालय और सर्वे विभाग के अफसरों के मुताबिक 2014 में बनाए गई बाउंड्री वर्किंग ग्रुप की बैठक लंबे समय से नहीं हुई है। गठन के बाद से इसकी छह बैठकें हो चुकी हैं। पिछली यानी छठी बैठक पिछले साल अगस्त में देहरादून में हुई थी। लेकिन उसके तीन महीने बाद ही यानी नवंबर में भारत की ओर से जारी नए नक्शे में कालापानी को अपने क्षेत्र में बताए जाने के बाद से दोनों देशों के बीच तकरार तेज हो गई।
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इसके बाद इस साल मई में जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कैलाश मानसरोवर तक के लिए लिपुलेख के रास्ते बने सड़क मार्ग को हरी झंडी दिखाई, तब से नेपाल को अपनी संप्रभुता खतरे में नजर आने लगी और उसने आनन-फानन में अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी कर दिया। इसमें नेपाल ने लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपना हिस्सा दिखा दिया।

इस मामले को लेकर दोनों देशों में तनाव इतना बढ़ा कि आपसी रिश्ते दरकने लगे। बातचीत बंद हो गई। व्यापारिक रिश्तों पर आंच आने लगी। ऊपर से कोरोना काल ने इसे और प्रभावित किया। दरअसल जानकारों का मानना है कि नक्शा विवाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सियासत का एक हिस्सा है और अपने देश में राष्ट्रवाद की भावना जगाकर आम लोगों को अपने पक्ष में खड़ा करने की कवायद है। इसका फायदा उन्हें मिला भी और प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ने का जो उनपर दबाव लगातार रहा, उससे बचने और लोगों की भावनाओं को अपने पक्ष करने में वो कामयाब भी रहे।

लेकिन नेपाल अच्छी तरह जानता है कि भारत से रिश्ते बिगाड़कर वह कई मोर्चों पर संकट में पड़ जाएगा। इसलिए फिर शुरू हुई इसे सुधारने की कवायद। इसी के तहत अगस्त के पहले हफ्ते में नेपाल के कई मंत्री ये कहने लगे कि सीमा विवाद तो देर-सवेर बातचीत के जरिए किसी न किसी मुकाम पर पहुंच ही जाएगा, लेकिन भारत और नेपाल के बीच के सदियों पुराने द्विपक्षीय रिश्तों पर कभी आंच नहीं आ सकती।

व्यापारिक रिश्ते मजबूत होने के साथ ही भारत की मदद से चलने वाले विकास के काम भी बदस्तूर जारी रहेंगे। इसलिए बर्फ पिघलाने के लिए कुछ ही दिन पहले दोनों देशों के बीच दो दौर की बात हुई और इस स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के बीच फोन पर बात भी हुई। इससे ये संकते तो मिले ही हैं कि अब नक्शा विवाद खास अहमियत नहीं रखता और भारत भी इसे गंभीरता से नहीं लेता।

विदेश मंत्रालय के अफसरों का कहना है कि विदेश सचिव शंकरदास बैरागी और भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा के बीच वर्चुअल बातचीत के दौरान बेशक नेपाल में चल रहे भारत के तमाम प्रोजेक्ट की समीक्षा की गई, लेकिन इस दौरान इस बातप भी खासा जोर दिया गया कि जल्दी ही बाउंड्री वर्किंग ग्रुप की बैठक भी होनी चाहिए।


हालांकि इस ग्रुप की अपनी सीमाएं हैं और यह कालापानी और सुस्ता नदियों के अलावा नो मेंस लैंड के रखरखाव और मरम्मत के कामों पर ध्यान देने के लिए बनाया गया है, फिर भी दोनों पक्षों का मानना है कि इसकी प्रस्तावित बैठक में कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा के विवाद को भी सुलझाने की कोशिश की जाएगी।

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