जर्मनी: कितना दम है ‘लाल आतंक’ की कहानी में? खतरों को लेकर अंगेला मैर्केल ने किया आगाह
पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर सर्वेक्षणों में दिख रहे रूझान के अनुरूप एसपीडी सबसे आगे रही, तब उसके पास सरकार बनाने के दो विकल्प होंगे। इनमें एक विकल्प ग्रीन पार्टी और फ्री डेमोक्रेट्स (एफडीपीऑ) के साथ मिल कर सरकार बनाने का होगा...
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जर्मनी में चुनाव के गरमाते माहौल के साथ ‘लाल आतंक’ की चर्चा तेज हो गई है। इस चर्चा को हवा जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल दी है। जर्मन संसद में चांसलर के रूप में दिए अपने आखिरी भाषण में उन्होंने देश को वामपंथी सरकार के खतरों से आगाह किया। उसके बाद से मीडिया में ये चर्चा तेज हो गई। जर्मनी में 26 सितंबर को मतदान होगा। उसके पहले लगभग रोजमर्रा के स्तर पर जारी हो रहे चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षणों में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) की लीड बढ़ती जा रही है। मैर्केल ने आगाह किया कि एसपीडी ने ग्रीन पार्टी और दूसरी छोटी वामपंथी पार्टियों के साथ मिल कर सरकार बना लिया, तो देश उदारवाद के रास्ते से दूर चला जाएगा।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर सर्वेक्षणों में दिख रहे रूझान के अनुरूप एसपीडी सबसे आगे रही, तब उसके पास सरकार बनाने के दो विकल्प होंगे। इनमें एक विकल्प ग्रीन पार्टी और फ्री डेमोक्रेट्स (एफडीपीऑ) के साथ मिल कर सरकार बनाने का होगा। एफडीपी पूंजीवाद समर्थक पार्टी है। एसपीडी के पास दूसरा विकल्प ग्रीन और धुर वामपंथी पार्टी डाई लिंके के साथ मिल कर सरकार बनाने का होगा। एसपीडी ने दोनों में से किसी संभावना से इनकार नहीं किया है।
डाई लिंके को अभी जनमत सर्वेक्षणों में सात फीसदी वोट मिलने की संभावना जताई गई है। जर्मन मीडिया की चर्चाओं में एसपीडी-ग्रीन-लेफ्ट गठबंधन की संभावना की चर्चा रेड-रेड-ग्रीन (आर2जी) गठबंधन के रूप में की जा रही है। डाय लिंके का ज्यादातर आधार पूर्वी जर्मनी में है। उसके एजेंडे में एक प्रमुख बात जर्मनी को उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) से बाहर निकालना है।
लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि एसपीडी की तरफ से चांसलर पद के उम्मीदवार ओलफ शोल्ज एक मध्यमार्गी नेता हैं। उन्हें अंगेला मैर्केल जैसा ही सबको साथ लेकर चलने वाला नेता समझा जाता है। आम समझ यह भी है कि एसपीडी का रंग अब पहले की तरह ‘लाल’ नहीं रह गया है। यानी उसका वामपंथी तेवर काफी फीका हो चुका है। टैक्स से लेकर यूरोपीय एकता तक जैसे सवालों पर एसपीडी मध्यमार्गी सोच पर चलती रही है। वेबसाइट पॉलिटिको.ईयू के एक विश्लेषण में बताया गया है कि एसपीडी के ज्यादातर कार्यकर्ता एफडीपी के साथ गठबंधन बनाने का समर्थन करेंगे।
एफडीपी के नेता क्रिश्चियन लिंडनर बाजार को लोगों का सबसे अच्छा दोस्त मानते हैं। उनकी पार्टी धनी लोगों और कंपनियों के लिए टैक्स में कटौती की समर्थक है। वे बाजार को सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त करने के पक्षधर भी हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर संभावना के मुताबिक एसपीडी ने एफडीपी के साथ गठजोड़ किया, तो ‘लाल आतंक’ की बात बेबुनियाद साबित हो जाएगी।
लेकिन दक्षिणपंथी खेमे दूसरी तरह के गठबंधन की संभावना को लेकर चिंतित हैं। एसपीडी ने इस संभावना से इनकार नहीं किया है। कंजरवेटिव जर्मन लेखक मूलर-वॉग ने कहा है- ‘एसपीडी-ग्रीन-लेफ्ट का गंठबंधन एक अंधकारमय सूरत पेश करेगा। बेशक वो सरकार कम्युनिस्ट नहीं होगी, फिर भी वह अर्थव्यवस्था, कल्याणकारी राज्य और विदेश नीति के प्रति देश के नजरिए को बुनियादी रूप से बदल देगी। डर यह है कि तब यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धा की क्षमता बहुत घट जाएगी।’