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IMF की चेतावनी: ईरान युद्ध लंबा खिंचा तो वैश्विक मंदी का खतरा, 2026 में वैश्विक विकास दर जा सकती है 2% से नीचे
Wed, 15 Apr 2026 04:06 AM IST
Nirmal Kant
अमर उजाला नेटवर्क, वॉशिंगटन/लंदन।
अमर उजाला नेटवर्क, वॉशिंगटन/लंदन।
Published by: Nirmal Kant
Updated Wed, 15 Apr 2026 04:06 AM IST
सार
आईएमएफ ने कहा है कि अगर ईरान युद्ध लंबे समय तक चला और ऊर्जा आपूर्ति बाधित रही तो दुनिया की अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव बनेगा और विकास दर 2% से नीचे जा सकती है। होर्मुज जलमार्ग में रुकावट और तेल-गैस की कीमतों में उछाल से महंगाई बढ़कर 6% तक पहुंच सकती है, जिससे ब्याज दरें बढ़ेंगी और वैश्विक आर्थिक गति धीमी पड़ेगी। पढ़िए रिपोर्ट-
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पश्चिम एशिया में संघर्ष
- फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
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विस्तार
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान युद्ध लंबा चलता है और ऊर्जा कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी के करीब पहुंच सकती है। आईएमएफ की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को पुन: अस्थिर कर दिया है। खास तौर पर होर्मुज जलमार्ग बाधित होने से ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ा है। यदि तेल, गैस व खाद्य पदार्थों की कीमतें अगले वर्ष तक ऊंची बनी रहती हैं, तो 2026 में वैश्विक विकास दर 2 फीसदी से नीचे जा सकती है।
आईएमएफ के मुख्य अर्थशास्त्री पियरे-ओलिवियर गोरिनचास ने कहा, यह विश्व में मंदी जैसी स्थिति महसूस कराएगी, जिसमें बेरोजगारी बढ़ेगी व खाद्य असुरक्षा गहराएगी। गंभीर परिदृश्य में इस वर्ष तेल की औसत कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल व 2027 में 125 डॉलर तक पहुंच सकती है। इसके चलते वैश्विक महंगाई दर 2027 में 6% तक जा सकती है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक महंगाई नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियां और धीमी पड़ सकती हैं। यदि आने वाले हफ्तों में युद्ध खत्म हो जाता है और ऊर्जा उत्पादन व निर्यात सामान्य होने लगता है, तो 2026 में वैश्विक विकास दर 3.1% रह सकती है।
ब्रिटेन पर सबसे ज्यादा असर...
आईएमएफ के मुताबिक विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ब्रिटेन इस ऊर्जा झटके से सबसे अधिक प्रभावित होगा। 2026 के लिए उसकी विकास दर का अनुमान घटाकर 0.8% कर दिया गया। वहीं खाड़ी के तेल उत्पादक देशों में इस साल आर्थिक सुस्ती या संकुचन देखने को मिल सकता है। ईरान की अर्थव्यवस्था 2026 में 6.1% सिकुड़ने का अनुमान है।
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भारत इस तरह हो सकता है प्रभावित
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत पर असर मुख्य रूप से महंगे तेल, बढ़ती महंगाई व बाहरी अस्थिरता के रूप में दिख सकता है। कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहने से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे चालू खाता घाटा (विदेशों से खरीद-बिक्री का अंतर) बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव आ सकता है। इससे पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे व ढुलाई लागत बढ़ने से आम महंगाई पर असर पड़ेगा। ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक को ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ सकती हैं, जिससे कर्ज महंगा होगा व आर्थिक वृद्धि की गति धीमी पड़ सकती है।
ये भी पढ़ें: Russia-Ukraine War: पहली बार सैनिकों का रोबोटों के समक्ष सरेंडर; जेलेंस्की का दावा- यूक्रेन ने रचा इतिहास
आईएमएफ ने कहा है कि देशों की आर्थिक स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि उनकी ऊर्जा संरचना को कितनी क्षति हुई है, वे होर्मुज जलमार्ग पर कितने निर्भर हैं और उनके पास वैकल्पिक निर्यात मार्ग कितने उपलब्ध हैं। उदाहरण के तौर पर सऊदी अरब के पास पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन है, जो प्रतिदिन लगभग 70 लाख बैरल तेल लाल सागर तक पहुंचा सकती है। इससे उसकी अर्थव्यवस्था 2026 में 3.1% की दर से बढ़ती रहेगी और 2027 में 4.5% तक पहुंच सकती है।
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आईएमएफ के मुख्य अर्थशास्त्री पियरे-ओलिवियर गोरिनचास ने कहा, यह विश्व में मंदी जैसी स्थिति महसूस कराएगी, जिसमें बेरोजगारी बढ़ेगी व खाद्य असुरक्षा गहराएगी। गंभीर परिदृश्य में इस वर्ष तेल की औसत कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल व 2027 में 125 डॉलर तक पहुंच सकती है। इसके चलते वैश्विक महंगाई दर 2027 में 6% तक जा सकती है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक महंगाई नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियां और धीमी पड़ सकती हैं। यदि आने वाले हफ्तों में युद्ध खत्म हो जाता है और ऊर्जा उत्पादन व निर्यात सामान्य होने लगता है, तो 2026 में वैश्विक विकास दर 3.1% रह सकती है।
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ब्रिटेन पर सबसे ज्यादा असर...
आईएमएफ के मुताबिक विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ब्रिटेन इस ऊर्जा झटके से सबसे अधिक प्रभावित होगा। 2026 के लिए उसकी विकास दर का अनुमान घटाकर 0.8% कर दिया गया। वहीं खाड़ी के तेल उत्पादक देशों में इस साल आर्थिक सुस्ती या संकुचन देखने को मिल सकता है। ईरान की अर्थव्यवस्था 2026 में 6.1% सिकुड़ने का अनुमान है।
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भारत इस तरह हो सकता है प्रभावित
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत पर असर मुख्य रूप से महंगे तेल, बढ़ती महंगाई व बाहरी अस्थिरता के रूप में दिख सकता है। कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहने से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे चालू खाता घाटा (विदेशों से खरीद-बिक्री का अंतर) बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव आ सकता है। इससे पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे व ढुलाई लागत बढ़ने से आम महंगाई पर असर पड़ेगा। ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक को ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ सकती हैं, जिससे कर्ज महंगा होगा व आर्थिक वृद्धि की गति धीमी पड़ सकती है।
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आईएमएफ ने कहा है कि देशों की आर्थिक स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि उनकी ऊर्जा संरचना को कितनी क्षति हुई है, वे होर्मुज जलमार्ग पर कितने निर्भर हैं और उनके पास वैकल्पिक निर्यात मार्ग कितने उपलब्ध हैं। उदाहरण के तौर पर सऊदी अरब के पास पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन है, जो प्रतिदिन लगभग 70 लाख बैरल तेल लाल सागर तक पहुंचा सकती है। इससे उसकी अर्थव्यवस्था 2026 में 3.1% की दर से बढ़ती रहेगी और 2027 में 4.5% तक पहुंच सकती है।
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