Trump Tariffs: 'संविधान मानिए, एकतरफा नहीं चल सकता टैरिफ', राष्ट्रपति ट्रंप को नील कात्याल की खुली चुनौती
नील कात्याल का कहना है कि अगर टैरिफ वाकई अच्छे और जरूरी हैं तो सरकार को कांग्रेस को मनाकर कानून के जरिए मंजूरी लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान भी यही प्रक्रिया बताता है। इस विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि क्या व्यापार घाटे को भुगतान संतुलन घाटा माना जा सकता है, जबकि आर्थिक और कानूनी विशेषज्ञ इसे अलग-अलग मानते हैं।
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'ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 का आधार कमजोर'
कात्याल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ट्रंप जिस कानून, ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122, का सहारा लेकर 15% तक का वैश्विक टैरिफ लगा रहे हैं, वह कानूनी तौर पर कमजोर आधार है। उन्होंने बताया कि पहले इसी मामले में अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजे) ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि यह धारा यहां लागू ही नहीं होती, क्योंकि व्यापार घाटा और भुगतान संतुलन घाटा दोनों अलग चीजें हैं। अब सरकार उसी धारा का इस्तेमाल कर रही है, जो खुद उसकी पहले की दलील से टकराता है।
Seems hard for the President to rely on the 15 percent statute (sec 122) when his DOJ in our case told the Court the opposite: “Nor does [122] have any obvious application here, where the concerns the President identified in declaring an emergency arise from trade deficits, which…
— Neal Katyal (@neal_katyal) February 21, 2026
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के टैरिफ को किया रद्द
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब हाल ही में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के पुराने व्यापक टैरिफ को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने साफ कहा था कि टैक्स लगाने का अधिकार मुख्य रूप से कांग्रेस के पास होता है और राष्ट्रपति ने आईईईपीए कानून का गलत इस्तेमाल किया था। इसके बाद ट्रंप प्रशासन ने तुरंत नया रास्ता अपनाते हुए पहले 10% का वैश्विक टैरिफ लगाया, जिसे बाद में बढ़ाकर 15% कर दिया गया। ट्रंप ने इसे 'अस्थायी आयात शुल्क' बताया और कहा कि यह अमेरिका के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी है।
कात्याल का कहना है कि अगर टैरिफ वाकई अच्छे और जरूरी हैं तो सरकार को कांग्रेस को मनाकर कानून के जरिए मंजूरी लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान भी यही प्रक्रिया बताता है। इस विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि क्या व्यापार घाटे को भुगतान संतुलन घाटा माना जा सकता है - जबकि आर्थिक और कानूनी विशेषज्ञ इसे अलग-अलग मानते हैं।
IMF की पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने किया कात्याल का समर्थन
इस बहस को और वजन तब मिला जब अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्री और आईएमएफ की पूर्व वरिष्ठ अधिकारी गीता गोपीनाथ ने भी कात्याल की बात का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि कात्याल 'इंटरनेशनल इकॉनॉमिक्स की बुनियादी बात' समझा रहे हैं और सरकार का तर्क आर्थिक दृष्टि से भी कमजोर लगता है।
.@neal_katyal speaking International Economics 101:“Nor does [122] have any obvious application here, where the concerns the President identified in declaring an emergency arise from trade deficits, which are conceptually distinct from balance-of-payments deficits." https://t.co/lQyeKGJ4Hi
— Gita Gopinath (@GitaGopinath) February 21, 2026
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भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर पड़ सकता है असर
इस बीच, इस फैसले का असर भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी पड़ सकता है। अमेरिकी अधिकारी पहले ही कह चुके हैं कि भारत समेत सभी देशों पर यह नया टैरिफ लागू होगा, जब तक कोई नया समझौता नहीं हो जाता। भारत सरकार ने कहा है कि वह इस पूरे घटनाक्रम का अध्ययन कर रही है और उसके असर का आकलन किया जा रहा है।
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