फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   How will China manage both Iran and Saudi Arabia together

China: ईरान और सऊदी अरब दोनों को एक साथ कैसे साध पाएगा चीन? जानें पूरा मामला

Sun, 18 Dec 2022 03:49 PM IST
Jeet Kumar डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, वॉशिंगटन
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, वॉशिंगटन Published by: Jeet Kumar Updated Sun, 18 Dec 2022 03:49 PM IST
सार

जीसीसी-चीन और अरब-चीन शिखर सम्मेलनों का आयोजन सऊदी अरब की राजधानी रियाद में हुआ। इन दोनों शिखर सम्मेलनों के बाद जारी साझा बयानों में ताइवान को चीन का अभिन्न अंग बताया गया।

विज्ञापन
How will China manage both Iran and Saudi Arabia together
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Social media

विस्तार

क्या सऊदी अरब से बने गहरे  रिश्ते का असर ईरान के साथ चीन के रिश्तों पर भी पड़ेगा? पश्चिमी विश्लेषक इस बारे में कयास लगा रहे हैं। बीते नौ दिसंबर को सऊदी अरब और खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के अन्य देशों के साथ चीन ने जो साझा बयान जारी किया, उसमें ईरान को क्षेत्रीय आतंकवादी संगठनों का समर्थक देश बताया गया। साथ ही उसमें सभी भागीदार देशों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अस्थिरता फैलाने वाली उसकी गतिविधियों का हल ढूंढने की अपील की गई। 

विज्ञापन


जीसीसी-चीन और अरब-चीन शिखर सम्मेलनों का आयोजन सऊदी अरब की राजधानी रियाद में हुआ। इन दोनों शिखर सम्मेलनों के बाद जारी साझा बयानों में ताइवान को चीन का अभिन्न अंग बताया गया। साथ ही हांगकांग मुद्दे पर भी चीन के रुख का समर्थन किया गया। समझा जाता है कि इसके बदले चीन ने उन तीन द्वीपों पर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के दावे का समर्थन किया, जिन पर ईरान का कब्जा है। 
विज्ञापन


बाद में ईरान के विदेश मंत्रालय ने इन बयानों पर नाखुशी जताई। खास कर उसने तीन द्वीपों के मुद्दे पर अपनी नाराजगी जताई। उसके बाद तेहरान स्थित चीनी राजदूत ने एक बयान में कहा कि चीन ईरान की प्रादेशिक अखंडता का समर्थन करता है। राजदूत ने कहा- ‘चीन के राष्ट्रपति की रियाद यात्रा का मकसद इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम करने में मददगार बनना था।’
विज्ञापन
विज्ञापन


पश्चिमी मीडिया में इस विवाद को खूब तव्वजो दी गई है। लेकिन कुछ विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम ने इससे जो उम्मीदें जोड़ी हैं, वे निराधार हैं। वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम के विश्लेषक ताला तस्लीमी ने एक टिप्पणी में लिखा है कि चीन की नीति में वैसा कोई बदलाव नहीं आया है, जैसा पश्चिमी मीडिया में अनुमान लगाया गया है। 

उधर वेबसाइट एशिया टाइम्स की एक टिप्पणी में कहा गया है कि जीसीसी-चीन के साझा बयान का यह मतलब नहीं है कि पश्चिम एशिया में अब एक महाशक्ति के रूप में चीन का आगमन हो गया है। लेकिन इससे यह संकेत जरूर मिला है कि जब तक इस क्षेत्र में रणनीतिक प्रभाव कायम नहीं होता, चीन एक वैश्विक महाशक्ति की हैसियत में नहीं आ सकेगा। इसीलिए यह सवाल अहम है कि क्या चीन सऊदी अरब सहित जीसीसी देशों और ईरान के बीच संतुलित रिश्ता बना पाएगा। 

चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। मंत्रालय ने इसी हफ्ते कहा कि जीसीसी के सदस्य देश और ईरान सभी चीन के मित्र हैं। ना तो चीन-जीसीसी का रिश्ता और ना ही चीन-ईरान का रिश्ता किसी तीसरे देश के खिलाफ है। चीन ईरान के साथ जीसीसी देशों के संबंध में सुधार का समर्थन करता है। दोस्ताना पड़ोसी का व्यवहार करते हुए ये देश संबंध सुधार सकते हैं, जिससे सबको लाभ होगा।


विश्लेषकों के मुताबिक चीन पश्चिम एशिया में उन तमाम देशों से रिश्ते जोड़ रहा है, जिनके आपसी संबंध तनावपूर्ण हैं।

उनमें तुर्किये भी है, जिसका ईरान के साथ छत्तीस का आंकड़ा है। लेकिन हाल में इन दोनों देशों के साथ चीन का कारोबार बढ़ा है। पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि रियाद में चीन ने फिलस्तीन का खुला समर्थन किया, जबकि इजराइल के साथ भी उसके मजबूत कारोबारी रिश्ते बने हुए हैँ। ऐसे में इन अनुमानों में ज्यादा दम नहीं है कि रियाद में हुए शिखर सम्मेलनों के बाद ईरान के साथ चीन के रिश्ते बिगड़ जाएंगे।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed