Russia-Ukraine War: रूस-चीन गठजोड़ के आगे कितना सफल होंगे ट्रंप, अमेरिका के मंसूबे पूरे न होने पर क्या होगा?
राष्ट्रपति ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि वह रूस-यूक्रेन युद्ध को रुकवा देंगे। अपने इस मिशन को पूरा करने के चक्कर में भारत (रूस से कच्चा तेल खरीदने के मामले में) को घसीट लेते हैं। चीन पर परोक्ष रूप से हमला करते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप अलास्का में अपने समकक्ष पुतिन से मिल चुके हैं। दूसरी बार भी भेंट करना चाहते थे, लेकिन सफल नहीं हो पाए तो रूस की दो बड़ी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। ट्रंप चाहते हैं कि आर्थिक स्रोत कटने के दबाव में रूस आए और यूक्रेन के साथ युद्ध बंद हो। शांति समझौता हो। ट्रंप कहते हैं कि उन्होंने दूसरे कार्यकाल में कई युद्ध रुकवाए और अब दुनिया में किसी से छिपा नहीं है कि राष्ट्रपति ट्रंप ‘शांति का नोबल पुरस्कार’ पाने तक उसकी कतार में हैं।
यूक्रेन के खनिज के लिए तैयार हैं अमेरिका की कंपनियां
यूक्रेन के पास खनिज बड़ा भंडार है। लौह अयस्क, ग्रेफाइट, टाइटेनियम, यूरेनियम समेत तमाम दुर्लभ मृदा तत्व उसके पास हैं। सोना, लीथियम का बहुत बड़ा भंडार है। मैंगनीज और टाइटेनियम के मामले में यूक्रेन काफी संपन्न है। नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम(स्मार्ट फोन में उपयोगी) का भी बड़ा भंडार है। तांबा, सीसा, जस्ता, निकिल, कोबाल्ट, बेरिलियम, जिरकोनियम और तमाम मैग्नेटिक तत्वों की बात ही छोड़ दीजिए। अमेरिकी कंपनिया यूक्रेन के इस संसाधन का दोहन करने के लिए तैयार बैठी है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि रूस-यूक्रेन की जंग रुकते ही अमेरिका अपने इस मंसूबे को तेजी से आगे बढ़ाएगा। पूर्व एयर वाइस मार्शल एन बी सिंह कहते हैं कि अमेरिका जिसे जितना देता है, सूद समेत उससे उतना लेता है। इसलिए अमेरिका का मकसद केवल यूक्रेन में शांति की स्थापना नहीं है। याद कीजिए जब राष्ट्रपति जेलेंस्की राष्ट्रपति ट्रंप से मिलने व्हाइट हाऊस गए थे तो ट्रंप ने उनसे क्या शर्त रखी थी? इसलिए अमेरिका एक बड़े एजेंडे को साधने में लगा है। पूर्व विदेश सचिव शशांक भी कहते हैं कि अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए की प्लानिंग इतनी कमजोर नहीं होती। मकसद भी हमेशा बड़ा होता है।
अपने देश का आत्मसम्मान चाहते हैं राष्ट्रपति पुतिन
अर्थशास्त्री सारथी आचार्य के मुताबिक अभी तो भ्रम की स्थिति है। मामला फंसा हुआ है। सारथी कहते हैं कि रूस के राष्ट्रपति पुतिन अपने देश का 1990 के दशक में खोया आत्मसम्मान वापस चाहते हैं। उनके कार्यकाल में रूस बड़ी ताकत बनकर उभरा है। अब रूस अमेरिका को जवाब देता है। जबकि 90 के दशक के उत्तरार्ध में ऐसा नहीं था। लगता नहीं कि पुतिन आसानी से ट्रंप के मंसूबे को सफल होने देंगे। उन्हें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का साथ मिला है। चीन की कंपनियों ने रूस की तेल कंपनियों से 20 साल का अनुबंध कर रखा है। सारथी कहते हैं कि रक्षा के मामले में न तो रूस को आज चीन की जरूरत है और न चीन को रूस की, लेकिन दोनों देश अमेरिका को काबू में रखने के लिए रणनीतिक साझेदार बन गए हैं। दुनिया चीन में होने वाले 45 प्रतिशत उत्पादन पर निर्भर है। राष्ट्रपति ट्रंप चाहे जितनी बातें भले कह लें, लेकिन चीन के मामले में एक सीमा के बाद रुक जाते हैं। खास बात यह है कि दोनों देशों (रूस,चीन) में आपसी तारतम्य के कारण अमेरिका को संभलकर चलना पड़ रहा है।
ट्रंप के मंसूबे पूरे न हुए तो क्या होगा?
यह एक बड़ा सवाल है। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप थोड़ा जिद्दी लगते हैं। वह इसी तरह से किसी न किसी बहाने दुनिया में भ्रम की स्थिति बनाए रखेंगे। उथल-पुथल मची रहेगी। सारथी आचार्य का कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध चलता रहेगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था इस दंश को झेलती रहेगी। सारथी कहते हैं कि रूस के पास प्रचुर मात्रा में सैन्य ताकत है। यूरोपीय देश भी इसे समझते हैं। अमेरिका को भी पता है। इसलिए अमेरिका कभी भी रूस के साथ सीधे सैन्य टकराव में नहीं उलझेगा। जब तक रूस के साथ चीन खड़ा है, तबतक रूस को झुका पाना अमेरिका के बस की बात नहीं है। रहा सवाल, रूस से कच्चे तेल के आयात का तो सारथी आचार्य समेत तमाम लोगों को इसमें कुछ सांकेतिक कमी जरूर नजर आती है, लेकिन बड़े पैमाने पर कमी आने की कोई संभावना नहीं है। सारथी कहते हैं कि पश्चिमी मीडिया इसे चाहे जैसे प्रचारित करे, लेकिन जमीनी स्थिति थोड़ा अलग है।