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अफगान शांति वार्ता की अड़चनों को कितना दूर कर पाए अमेरिकी विदेश मंत्री पोम्पियो?

Sun, 22 Nov 2020 09:44 PM IST
गौरव पाण्डेय डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, दोहा
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, दोहा Published by: गौरव पाण्डेय Updated Sun, 22 Nov 2020 09:44 PM IST
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How far did US Secretary of State Mike Pompeo be able to overcome the hurdles of Afghan peace talks
अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो - फोटो : एएनआई (फाइल)

कतर दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने शनिवार देर शाम यहां तालिबान और अफगानिस्तान सरकार के प्रतिनिधियों से बातचीत की। इसके ठीक पहले काबुल में जोरदार आतंकवादी हमले हुए। वहां दहशतगर्दों ने घनी आबादी वाले इलाकों पर कई रॉकेट दागे, जिनसे आठ लोगों की मौत हो गई। उनमें से एक रॉकेट काबुल स्थित ईरानी दूतावास की इमारत से टकराया, हालांकि वहां कोई हताहत नहीं हुआ। इन हमलों ने एक बार फिर अमेरिका की तरफ से शुरू की गई अफगानिस्तान शांति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बीच अपनी पूर्व घोषणा के मुताबिक अमेरिका अगले 15 जनवरी तक अफगानिस्तान से अपने ज्यादातर सैनिक वापस बुला लेने का इरादा जता चुका है।

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शनिवार को हुए हमलों की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने ली है। जानकारों ने अंदाजा लगाया है कि इस दावे में दम हो सकता है, क्योंकि तालिबान शांति प्रक्रिया में शामिल है और उसने पोम्पियो से वार्ता से ठीक पहले हमले नहीं किए होंगे। फिर पहली बार पाकिस्तान को अफगानिस्तान की शांति प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका मिली है। तालिबान के सूत्र हमेशा ही पाकिस्तान की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के हाथ में रहे है। शनिवार के हमलों के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने ‘ऐसी ताकतों से सावधान रहने की अपील की, जो अफगान शांति प्रक्रिया की अनदेखी करने पर तुले हैं।’
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पिछले गुरुवार को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने सत्ता में आने के बाद पहली बार अफगानिस्तान की यात्रा की। उनकी इस यात्रा को बहुत अहमियत दी गई। इमरान को अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने विशेष बातचीत के लिए आमंत्रित किया था। काबुल में इमरान खान ने आश्वासन दिया कि अफगानिस्तान में हिंसा घटाने में पाकिस्तान अपनी पूरी भूमिका निभाएगा। विश्लेषकों की राय है कि तालिबान पर पाकिस्तान के प्रभाव के कारण उसे अब अफगान शांति वार्ता में खास महत्त्व दिया जा रहा है। इससे पाकिस्तान को सामरिक रूप से इस अहम देश में अपने रणनीतिक मकसदों को पूरा करने का मौका मिल सकता है। इसलिए संभव है कि वह तालिबान को हिंसा छोड़ने के लिए राजी करने में सचमुच भूमिका निभाए।  
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तालिबार और अफगान सरकार के बीच पहली बार सीधी वार्ता
गौरतलब है कि ये पहला मौका है जब तालिबान और अफगानिस्तान सरकार के बीच सीधी वार्ता हो रही है। अमेरिकी पहल पर ये बातचीत शुरू हुई। फिर पिछले 12 सितंबर को दोनों पक्षों ने अफगान शांति समझौते पर दस्तखत किए। लेकिन सितंबर के बाद ये प्रक्रिया उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ी है। इसी गतिरोध को टालने की कोशिश में पोम्पियो ने दोहा में अफगान सरकार और तालिबान के नुमाइंदों से अलग-अलग बातचीत की। इसमें कितनी सफलता मिली, ये तुरंत मालूम नहीं हो सका।

सितंबर में समझौते पर दस्तखत होने के बाद अफगान सरकार और तालिबान के बीच वार्ता के बुनियादी ढांचे और उससे संबंधित मजहबी व्याख्याओं को लेकर मतभेद खड़े हो गए। मिली खबरों के मुताबिक शनिवार को पोम्पियो ने दोनों पक्षों से कहा कि वे बातचीत से अपने मतभेदों को हल करें। अल-जरीरा टीवी चैनल के मुताबिक मतभेद का एक बड़ा मसला यह है कि तालिबान अफगानिस्तान में सुन्नी मत की हनीफी धारा की न्याय प्रणाली लागू करना चाहता है। लेकिन अफगान सरकार का कहना कि ये न्याय प्रणाली लागू होने पर हाजरा समुदाय और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव होगा। हाजरा समुदाय के ज्यादातर लोग शिया मत को मानते हैं।

दोहा शांति वार्ताओं का रास्ता पिछले फरवरी में अमेरिका और तालिबान के बीच हुए एक समझौते से खुला था। उस समझौते में यह तय हुआ था कि अमेरिका अफगानिस्तान से अपनी सारी फौज इस शर्त पर वापस बुला लेगा कि तालिबान शांति वार्ता में शामिल हो। लेकिन फरवरी में हुए समझौते में शामिल होने के बावजूद तालिबान पर आतंकवादी हमले जारी रखने के आरोप लगे हैं। पाकिस्तानी मीडिया में छपे आंकड़ों के मुताबिक पिछले छह महीनों में तालिबान ने 53 फिदायीन हमले किए हैं और 1200 से ज्यादा विस्फोट किए हैं। इनमें 1210 नागरिकों की जान गई है और ढाई हजार से ज्यादा लोग घायल हुए हैं।

अब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन अपने आखिरी दिनों में है। इस बीच पोम्पियो ने शांति वार्ता में आई अड़चनों को दूर करने का प्रयास किया है। लेकिन अब सबकी निगाहें आगामी जो बाइडन प्रशासन पर होंगी। उसका अफगानिस्तान शांति प्रक्रिया और तालिबान के प्रति क्या रुख होता है, संभवतः उससे ही अफगानिस्तान का भविष्य तय होगा।  

अफगानिस्तान के लोग 40 साल तक खून खराबा सहा, उन्हें शांति से जीने का है अधिकार: पोम्पियो
हाल में ट्रंप प्रशासन ने कहा था कि वह अफगानिस्तान और इराक में अपने सैनिकों की संख्या को कम करके 2500-2500 करेगा। अफगानिस्तान में इस समय अमेरिका के 4,500 से अधिक सैनिक तैनात हैं।

पोम्पियो ने ट्वीट किया, दोहा में तालिबान और अफगानिस्तान के वार्ताकार दलों से मुलाकात की। मैं बातचीत जारी रखने और इसमें हुई प्रगति के लिए दोनों पक्षों की सराहना करता हूं। मैं राजनीतिक खाके और स्थायी व समग्र संघर्ष विराम के लिए बातचीत आगे बढ़ाने को प्रोत्साहन देता हूं। अफगानिस्तान के लोग 40 साल से युद्ध और खून खराबा सहने के बाद अब शांति व सुरक्षा के साथ जीने की उम्मीद करते हैं और वे इसके हकदार हैं।


वहीं, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता केल ब्राउन के मुताबिक, पोम्पियो ने तालिबान राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख मुल्ला बरादर और तालिबान की वार्ताकार टीम के सदस्यों से मुलाकात की। इस दौरान वार्ताकारों ने हिंसा कम करने के तरीकों पर चर्चा की।

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