फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Hiroshima Tragedy: Japan's aging atomic bomb survivors speak out against nuclear weapons

Hiroshima Nightmare: 'परमाणु हथियारों का अंत ही शांति का रास्ता', विनाश से बचे जापानी बुजुर्गों का छलका दर्द

Tue, 05 Aug 2025 08:47 AM IST
पवन पांडेय वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हिरोशिमा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हिरोशिमा Published by: पवन पांडेय Updated Tue, 05 Aug 2025 08:47 AM IST
सार

80 Years Of Hiroshima Nightmare: जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिकी परमाणु बम हमले को 80 वर्ष हो गए। तब से लेकर अब तक जापान ने बहुत तरक्की की है। लेकिन इस त्रासदी के पीड़ितों के जेहन में आज भी वो घटना ताजा है। वे कई वर्षों से दुनिया भर के लोगों के यही संदेश दे रहे हैं कि परमाणु हथियारों का अंत ही शांति का रास्ता है।

विज्ञापन
Hiroshima Tragedy: Japan's aging atomic bomb survivors speak out against nuclear weapons
हिरोशिमा में परमाणु बमबारी का गुंबद, परमाणु बमबारी के बाद नागासाकी (फाइल फोटो) - फोटो : ANI

विस्तार

हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमलों को आज लगभग 80 साल हो चुके हैं, लेकिन इन त्रासदियों से बचे कुछ बुजुर्ग आज भी जिंदा हैं- और अब वे खुलकर बोल रहे हैं। इन लोगों को डर है कि दुनिया एक बार फिर परमाणु खतरे की ओर बढ़ रही है, और नेता इन हथियारों को स्वीकार करने लगे हैं।
विज्ञापन


1945 की वो भयानक सुबह
6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर पहला परमाणु बम गिराया था। तीन दिन बाद 9 अगस्त को नागासाकी पर दूसरा बम गिराया गया। साल के अंत तक इन बमबारी में करीब 2 लाख लोग मारे गए थे। हजारों लोग बच तो गए, लेकिन रेडिएशन की वजह से जीवन भर बीमारियों से जूझते रहे। 
विज्ञापन

कुनिहिको ईदा: 60 साल बाद बोलने की हिम्मत जुटाई

83 वर्षीय कुनिहिको ईदा, जब बम गिरा, तब वे केवल 3 साल के थे। वह अपनी मां के मायके वाले घर में थे, जो धमाके के केंद्र से सिर्फ 900 मीटर दूर था। विस्फोट इतना जोरदार था कि उन्हें लगा जैसे कोई इमारत उन पर गिर गई हो। उनके पूरे शरीर में कांच के टुकड़े चुभ गए थे। वे चिल्लाना चाहते थे - 'मां, बचाओ!', लेकिन आवाज ही नहीं निकल रही थी। उनके दादा ने उन्हें मलबे से बाहर निकाला। एक महीने के भीतर उनकी मां और बहन की मौत हो गई। उन्हें भी स्कूल के दिनों तक रेडिएशन की वजह से कई स्वास्थ्य समस्याएं रहीं।

ईदा ने 60 साल बाद पहली बार हिरोशिमा के शांति पार्क का दौरा किया, जब उनकी बूढ़ी मौसी ने साथ चलने की गुजारिश की। फिर उन्होंने फैसला किया कि वे अपनी कहानी दुनिया को बताएंगे, लेकिन ऐसा कर पाना आसान नहीं था। शुरू में वे बोलते समय भावनाओं में बह जाते थे। उन्हें मंच पर बोलने में कई साल लग गए। अब वे हिरोशिमा शांति स्मारक पार्क में गाइड के तौर पर विदेशी आगंतुकों को परमाणु हमले की सच्चाई बताते हैं। वे हाल ही में पेरिस, लंदन और वारसॉ में छात्रों से मिले। वहां उन्हें काफी समर्थन और तालियां मिलीं। ईदा कहते हैं, 'परमाणु हथियार अगर चलाए जाते हैं, तो दोनों पक्ष खत्म हो जाएंगे। और जहर छोड़ जाएंगे, जो सदियों तक मिटेगा नहीं। इसलिए एक ही रास्ता है - परमाणु हथियारों का अंत।'

यह भी पढ़ें - Hiroshima People Missing: जापान परमाणु हमले के 80 साल बाद भी अपनों की तलाश, निनोशिमा में अवशेष तलाश रहे लोग

फुमिको डोई: ट्रेन की लेट-लतीफी ने बचा ली जान

86 वर्षीय फुमिको डोई को आज भी लगता है कि अगर वो ट्रेन समय पर पहुंच जाती, तो वह भी आज जिंदा न होतीं। जिस ट्रेन में वे नागासाकी जा रही थीं, वह थोड़ी देर से पहुंची थी- और इसी वजह से वह बम गिरने के समय 5 किलोमीटर दूर थीं। उन्होंने ट्रेन की खिड़की से तेज चमक देखी, आंखें ढंक लीं और नीचे झुक गईं। खिड़कियों के कांच के टुकड़े उड़कर लोगों पर गिरे, लेकिन कुछ मुसाफिरों ने उन्हें ढंक लिया।

उन्होंने देखा, 'सड़कों पर लोग जल चुके थे, उनके बाल उड़ चुके थे, कपड़े फटे थे, चेहरे काले पड़ चुके थे।' डोई ने अपने बच्चों को अपने अनुभव लिखकर दिए, लेकिन वर्षों तक अपनी पहचान छुपाई क्योंकि परमाणु हमले से बचे लोगों को जापान में अब भी भेदभाव झेलना पड़ता है। उन्होंने एक और सर्वाइवर से शादी की, लेकिन डरती रहीं कि उनके चार बच्चों पर रेडिएशन का असर न हो। उनके पिता, जो सरकारी अधिकारी थे, बम गिरने के बाद लाशें उठाने भेजे गए थे। वे भी बीमार पड़ गए। फिर उन्होंने अपनी पीड़ा कविताओं में लिखी।

2011 के फुकुशिमा हादसे के बाद शुरू की सार्वजनिक बात
डोई ने चुप्पी 2011 के फुकुशिमा परमाणु संयंत्र हादसे के बाद तोड़ी, जब सुनामी और भूकंप के कारण विकिरण फैला था। अब वे फुकुओका से निकलकर विरोध प्रदर्शनों में भाग लेती हैं, और हर मौके पर शांति का संदेश देती हैं। वे कहती हैं- 'लोग भूल गए हैं कि परमाणु बम क्या होता है... ये दुखद है। अगर आज फिर से ऐसा बम गिरा, तो जापान मिट जाएगा। और अगर और देशों में भी ऐसा हुआ, तो ये धरती का अंत होगा। इसलिए मैं हर जगह बोलती हूं।'

यह भी पढ़ें - स्मरण: परमाणु हमला और कुछ कहानियां, छह अगस्त 1945 का मनहूस दिन नहीं भूल पाएंगे जापान के लोग
विज्ञापन

शांति संग्रहालय में विदेशी पर्यटकों की भीड़
2023 में जी7 सम्मेलन के दौरान हिरोशिमा में विश्व नेताओं का आना और परमाणु हमले से बचे लोगों की संस्था 'निहोन हिडांक्यो' को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के बाद, हिरोशिमा और नागासाकी के संग्रहालयों में पर्यटकों की संख्या तेजी से बढ़ी है। अब हर तीन में से एक पर्यटक विदेशी होता है। एक अमेरिकी महिला सामंथा ऐनी ने कहा, 'मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चे जानें कि एक निर्णय कितना विनाश ला सकता है।' फ्रांस की एक पर्यटक मेलानी ग्रिंगोयर ने कहा- 'जब आप किसी सर्वाइवर से मिलते हैं, तब इतिहास सिर्फ किताब में नहीं, आपके सामने खड़ा हो जाता है।'

'हम क्यों न भूलें हिरोशिमा और नागासाकी?'
74 वर्षीय गाइड कात्सुमी ताकाहाशी को चिंता है कि जापान के युवा अपनी ही इतिहास को भूलते जा रहे हैं। जबकि दुनिया भर से लोग सीखने आ रहे हैं। ईदा, जो अब भी गाइड हैं, हर बार हिरोशिमा जाते हुए बच्चों की याद में बने स्मारक पर रुकते हैं। वहां दुनिया भर से भेजी गई रंग-बिरंगी कागज की सारस (क्रेन) लटक रही होती हैं - जो शांति का प्रतीक है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed