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सऊदी अरबः स्टीयरिंग व्हील मिली लेकिन ये पांच अधिकार आज भी नहीं हैं
Sun, 24 Jun 2018 01:28 PM IST
बीबीसी, हिंदी
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Updated Sun, 24 Jun 2018 01:28 PM IST
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पिछले कुछ दिनों में सऊदी अरब की कई ऐसी खबरें सुर्खियों में रहीं जो महिलाओं के अधिकारों में बदलाव को लेकर उन्हें कुछ आजादी देती हैं। यहां की महिलाएं पहली बार स्टेडियम जाकर फुटबॉल मैच देखने में कामयाब हुईं। महिलाओं को बताया गया कि अब वो सैन्य और खुफिया सेवाओं में शामिल हो सकती हैं (लेकिन युद्ध की भूमिका में नहीं)। वहां की महिलाओं ने पहली बार साइकिल रेस में भाग लिया। और अब 24 जून यानी आज से बहुप्रतीक्षित ड्राइविंग पर लागू प्रतिबंध को भी उठा लिया गया है।
कुछ महिलाओं को किया गया था गिरफ्तार
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वैसे तो सऊदी अरब ने यहां की महिलाओं के लिए पहला ड्राइविंग लाइसेंस जारी कर दिया है, लेकिन पुरुषों के साथ और अधिक समानता को लेकर अभियान चलाने वाली कुछ महिला अधिकार कार्यकर्ताओं को पिछले महीने 'विदेशी ताकतों से संबंध' और देश को "अस्थिर" करने की कोशिश में लगे होने के संदेह में गिरफ्तार कर लिया गया था।
पुरुषों का बोलबाला
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सऊदी अरब में सिंहासन के वारिस 32 वर्षीय क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कहा था कि वो देश को आधुनिक बनाने की योजना के तहत उदार इस्लाम की वापसी चाहते हैं। महिलाओं को अधिकार देने के ये फैसले उनके 'विजन 2030' का हिस्सा है। लेकिन चैथम हाउस में वरिष्ठ शोधार्थी जेन किन्निनमोंट ने अपने अध्ययन में पाया कि 2017 के अंत में किए गए ये उपाय राजनीतिक उदारीकरण के साथ मेल नहीं खाते हैं। सऊदी अरब महिला अधिकारों पर सबसे अधिक प्रतिबंध लगाने वाले देशों में से है। विश्व आर्थिक मंच के विश्व लिंगभेद सूचकांक में शामिल 144 देशों में इसका स्थान 138वां है। ऐसी कई चीजें हैं जो इस बेहद रुढ़िवाद देश में महिलाएं आज भी नहीं कर सकती हैं।
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चलिए देखते हैं उन पांच चीजों को जो महिलाएं यहां आज भी नहीं कर सकतीं:-
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बैंक अकाउंट खोलना
सऊदी अरब की महिलाएं अपने पुरुष अभिभावक की अनुमति के बिना बैंक अकाउंट नहीं खोल सकतीं। यह सऊदी अरब के पितृसत्तात्मक व्यवस्था की वजह से है। अपने गठन के बाद से सुन्नी इस्लाम के कट्टर कहे जाने वाले वहाबी पंथ की ओर सऊदी अरब का झुकाव रहा है। वहाबी पंथ के मुताबिक प्रत्येक महिला का एक पुरुष अभिभावक होना जरूरी है, जो उनके अहम फैसले लेगा। ह्यूमन राइट वॉच संगठन सहित कई महिला अधिकार समूहों ने इस अभिभावक व्यवस्था की आलोचना की। ह्यूमन राइट वॉच का कहना था कि इस व्यवस्था के तहत तो महिलाएं "कानूनी तौर पर नाबालिग" हो जाती हैं जो खुद के अहम फैसले नहीं ले सकतीं।
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पासपोर्ट पाना (या विदेश यात्रा करना)
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अभिभावक व्यवस्था का यह एक और उदाहरण है। इसके अनुसार सऊदी महिलाओं का पासपोर्ट बनवाने या देश से बाहर जाने के लिए पुरुष अभिभावक की सहमति होना आवश्यक है। अभिभावक से सहमति लेने की यह व्यवस्था महिलाओं के जीवन के अन्य पहलुओं से भी जुड़े हैं, जिसमें काम पर जाने, पढ़ाई, यहां तक कि कुछ तरह की स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी यह लागू है। अभिभावक के रूप में महिला के पिता, भाई या कोई अन्य पुरुष रिश्तेदार हो सकते हैं, अगर महिला विधवा हो तो वैसे मामलों में कभी कभी यह उसका बेटा भी हो सकता है।
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