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Gaza Crisis: गाजा में युद्ध और विस्थापन की पीड़ा से त्रस्त आधी आबादी; पढ़ें फलस्तीनी महिलाओं की दास्तां

Fri, 13 Dec 2024 02:40 PM IST
अभिषेक दीक्षित यूएन हिंदी समाचार
यूएन हिंदी समाचार Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Fri, 13 Dec 2024 02:40 PM IST
सार

85 वर्ष की थुराया अल गौरानी कहती हैं कि मेरा जीवन की रूप-रेखा, विस्थापन ने ही निर्धारित की है। मुझे 1948 का वो दिन आज भी याद है, जब मेरे पिता ने हमें, जल्दबाजी में हेब्रोन और गाजा के बीच स्थित एक छोटे से गांव, अल फलूजा छोड़कर भागने के लिए कहा था

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Gaza Crisis: Women in Gaza suffers from the pain of war and displacement Read the stories of Palestinian women
Gaza - फोटो : UN

विस्तार

हमारे पास कुछ बचा है तो वो है उम्मीद और स्वयं की शक्ति। ये कहना है गाजा युद्ध के कारण मौत के दर्द और विस्थापन से त्रस्त महिलाओं का। गाजा में जारी युद्ध का सबसे अधिक खामियाजा महिलाओं व लड़कियों को भुगतना पड़ रहा है, जिनके लिए इन हालात में सुरक्षित स्थान सिकुड़ते जा रहे हैं। युद्ध की भयावहता के बीच अलग-अलग पीढ़ियों व अलग-अलग क्षेत्रों से विस्थापित महिलाओं की दर्दभरी दास्तां।

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इस युद्ध ने मेरी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी है। हमें बार-बार विस्थापित होना पड़ा है, जिससे मेरी शिक्षा और मेरे दोस्त छिन गए। जिस डर के साथ हम जी रहे हैं, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। ये शब्द हैं- 14 साल की लीन नाहल के, जो इतनी छोटी सी उम्र में ही गाजा में पांच युद्ध देख चुकी हैं और कई बार विस्थापित होने को मजबूर हुई हैं।
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लीन नाहल बताती हैं कि पहले हम खाना, फल, और कपड़े खरीदने में सक्षम थे। अब हम आठ लोग एक अस्थाई तम्बू में सिमट कर रहने को मजबूर हैं। मुझ पर जिम्मेदारियों का इस तरह बोझ आ पड़ा है, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। लीन नाहल एक समय पर अपनी कक्षा की सबसे होनहार छात्रा थी, लेकिन 2023 के अंत में युद्ध बढ़ने के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई। उनके अनेक उसके दोस्त और सहपाठी गाजा छोड़कर अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए विदेश चले गए।
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वो कहती हैं कि अब मैं तम्बू में बैठी हूं, मेरी किताबें, स्कूल की वर्दी और बैग सब गायब हो चुके हैं। ऐसा महसूस होता है जैसे मेरा भविष्य, मेरी शिक्षा और मेरा बचपन मुझसे छिन गया है। मेरा सपना है कि यह युद्ध खत्म हो और मैं बड़ी होकर इतिहास की शिक्षिका बनूं और फलस्तीन के इतिहास व हमारे कभी न खत्म होने वाले दर्द की कहानी सबको सुना सकूं। इस युद्ध ने गाजा के सभी लोगों को प्रभावित किया है, चाहे वो नाहल जैसी छोटी बच्चियां हों या थुराया अल गौरानी जैसी बुज़ुर्ग महिलाएं।

85 वर्ष की थुराया अल गौरानी कहती हैं कि मेरा जीवन की रूप-रेखा, विस्थापन ने ही निर्धारित की है। मुझे 1948 का वो दिन आज भी याद है, जब मेरे पिता ने हमें, जल्दबाजी में हेब्रोन और गाजा के बीच स्थित एक छोटे से गांव, अल फलूजा छोड़कर भागने के लिए कहा था। उस समय इस्राइली सशस्त्र बल नजदीक आ रहे थे। हम अपना सब कुछ पीछे छोड़कर खान यूनिस भाग आए थे। अल गौरानी ने तब से लेकर आज तक सात युद्ध देखे हैं। 

उन्होंने बताया कि हर बार जब उनका परिवार विस्थापित हुआ, तो यह मालूम नहीं होता था कि जब वे वापस लौटेंगे, तो उनका घर बचा होगा या नहीं। उन्होंने कहा कि हर बार मानो हमारी गरिमा पर प्रहार होता। वर्तमान युद्ध सबसे निर्दयी व क्रूर है और अब तक के सभी युद्धों से अधिक लम्बा खिंच रहा है।

गाजा में चल रहे विनाशकारी युद्ध के दौरान, UN Women ने जीवन के हर क्षेत्र से अनगिनत महिलाओं और लड़कियों की दर्द भरी आपबीतियां सुनीं। पैरामेडिक के तौर पर काम करने वाली नीवीन को नवम्बर 2023 में एक ही दिन में अपने परिवार के 80 सदस्यों को खो देने के दर्द से गुजरना पड़ा। मगर इसके बावजूद उन्होंने अपना काम जारी रखा है. उन्हें कई बार विस्थापन और भयावह घटनाओं का सामना करना पड़ा है, जैसेकि कमाल अदवान अस्पताल का विनाश तथा जबालिया में UNRWA शरणस्थल पर बमबारी, जहाँ उन्होंने शरण ली थी।

गाजा स्वास्थ्य मंत्रालय में मनोचिकित्सक, अमानी वर्षों के युद्ध व टकराव से पीड़ित लोगों को सांत्वना देने का काम कर रही थीं. युद्ध से पहले उनका सपना छात्रवृत्ति लेकर पीएचडी की शिक्षा हासिल करने का था, लेकिन मई 2024 में एक इस्राइली हवाई हमले में अमानी और उनके चार बच्चों की मौत हो गई। इबतिसम व्हीलचेयर का उपयोग करती हैं, लेकिन अब उन्हें सोने के लिए एक उचित बिस्तर भी उपलब्ध नहीं हैं और वह गाजा की नष्ट हुई, दुर्गम सड़कों पर चलने में असमर्थ हैं। 

आश्रय सुविधाओं में विकलांग व्यक्तियों की मदद के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी के कारण, उन्हें अपनी माँ से भी अलग कर दिया गया है। इस बीच, पश्चिमी तट में फलस्तीनी महिलाएं और लड़कियां भी गम्भीर चुनौतियों व बोझ का सामना कर रही हैं। 49 वर्षीय विधवा काफा अबू हर्ब, तीन बच्चों की मां हैं। उन्होंने पश्चिमी तट में इस्राइली कब्जे के बीच जीवन जीने के दौरान जिन कठिन चुनौतियों का सामना किया है, उनकी कहानी सुनाई।

काफा अबू हर्ब का कहना है कि सैनिक हमारे घरों में घुस आते हैं, हमारी निजता का हनन करते हैं, हमें पूछताछ के लिए घसीटकर ले जाते और बिना किसी कारण या वारंट के हमारे बच्चों को रात के अंधेरे में उठा कर ले जाते हैं। यही हमारी वास्तविकता है। मेरे बेटों में से एक अब भी जेल में है, बिना किसी आरोप या सुनवाई के। हम इतना सब कुछ हम किस तरह सहन करें?


फलस्तीन में महिलाएं और लड़कियां अलबत्ता बेहद क्रूर परिस्थितियों का सामना कर रही हैं, मगर उन्होंने अब भी उम्मीद नहीं छोड़ी है। वो कहती हैं कि हम ज्यादा कुछ नहीं मांगते, बस शान्ति से जीने का अधिकार, बिना डर के सांस लेने का अधिकार चाहते हैं। फलस्तीनी महिलाओं ने इस पीड़ा का सर्वाधिक बोझ सहन किया है, फिर भी हम अब भी यहां हैं। अब भी अपने पैरों पर खड़ी हैं। हमारे पास कुछ बचा है तो केवल अपनी ताकत।

(नोट: यह लेख संयुक्त राष्ट्र हिंदी समाचार सेवा से लिया गया है।

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