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भरोसे की कमी : फ्रांस में एक बार फिर से ‘लोकतांत्रिक संकट’, केवल एक तिहाई मतदान ने बढ़ाई चिंता
Mon, 28 Jun 2021 06:39 PM IST
संजीव कुमार झा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Mon, 28 Jun 2021 06:39 PM IST
सार
पर्यवेक्षकों का कहना है कि इन दोनों चरणों में मतदान इतना कम रहा है कि अब इसके आधार पर अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए कोई अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है।
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इमैनुअल मैक्रों (फाइल फोटो)
- फोटो : Facebook
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विस्तार
फ्रांस में प्रांतीय और स्थानीय चुनावों के लिए दूसरे चरण के नतीजों से मेनस्ट्रीम पार्टियों को राहत जरूर मिली है, लेकिन फ्रांस की राजनीतिक प्रणाली में लोगों के घटते भरोसे से उनकी चिंता भी बढ़ गई है। 20 जून को पहले चरण में हुए मतदान में सिर्फ 32 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाले थे। उसके बाद तमाम पार्टियों ने दूसरे चरण में ज्यादा संख्या में मतदाताओं को घर से निकालने की मुहिम चलाई। लेकिन रविवार को हुए इस मतदान में सिर्फ दो फीसदी ज्यादा यानी 34 फीसदी मतदातों ने ही वोट डाले।
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पर्यवेक्षकों का कहना है कि इन दोनों चरणों में मतदान इतना कम रहा है कि अब इसके आधार पर अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए कोई अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है। जबकि पहले यह कहा गया था कि ये चुनाव अगले राष्ट्रपति चुनाव के लिए हवा के रुख का संकेत देंगे।
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कम मतदान के बीच आए चुनाव नतीजों से धुर दक्षिणपंथी पार्टी नेशनल रैली की नेता मेरी ली पेन की महत्त्वाकांक्षाओं को तगड़ा झटका लगा है। इन चुनावों के पहले माना जा रहा था कि ली पेन अगले चुनाव में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मुख्य प्रतिद्वंद्वी होंगी। लेकिन जिस आल्पस- कोट दा अजूर प्रांत में उनकी पार्टी के जीतने की संभावना जताई गई थी, वहां वह हार गई। वहां क्षेत्रीय प्रेसिडेंट के चुनाव में मुख्यधारा की दक्षिणपंथी पार्टी लेस रिपब्लिकन्स के उम्मीदवार रेनो मुसेलियर 57 फीसदी वोट पाकर जीते।
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पर्यवेक्षकों का कहना है कि ये चुनाव नतीजे मेरी ली पेन के बहुत निराशाजनक हैं। उनकी पार्टी अगर एक भी क्षेत्र में जीत जाती, तो 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में उनकी दावेदारी को बहुत ताकत मिलती। पहले चरण के मतदान के बाद ली पेन ने कहा था कि उनके ज्यादातर समर्थक वोट डालने नहीं आए, इसलिए उनकी पार्टी अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाई। बीते एक हफ्ते में उन्होंने अपने समर्थकों से वोट डालने आने की अपील लगातार की थी। लेकिन इसका कोई खास असर नहीं हुआ।
चुनाव नतीजे राष्ट्रपति मैक्रों की ला रिपब्लिका एन मार्श (एलआरईएम) के भी बेहद निराशाजनक रहे हैं। पहले चरण में उनकी पार्टी को 11 फीसदी से भी कम वोट मिले थे। दूसरे चरण में वह इतने वोट भी नहीं हासिल कर पाई। पार्टी के नेता स्तानिसलास गुएरिनी ने एक बयान में यह माना की पार्टी को चुनाव परिणाम से मायूसी हुई है। लेकिन उन्होंने इस पर संतोष जताया कि उनकी पार्टी ने ली पेन की पार्टी को हराने में खास भूमिका निभाई।
फ्रांस में असल चिंता दोनों चरणों में बेहद कम मतदान होने से पैदा हुई है। कई विशेषज्ञों ने इसे फ्रांस का लोकतांत्रिक संकट कहा है। आर्थिक मामलों के पूर्व मंत्री और अब कॉर्ट ऑफ ऑडिटर्स नाम की संस्था के प्रमुख पियरे मोस्कोविची ने एक ट्विट में कहा कि से चुनाव से मतदाताओं में मौजूद भ्रम और उदासीनता का इजहार हुआ है। उन्होंने कहा- ‘फ्रांस का लोकतांत्रिक संकट गहरा है। अब अगले साल राष्ट्रपति चुनाव में इस मसले को हल करने की चुनौती होगी।’ अखबार द लिबरेशन ने अपने संपादकीय में लिखा है- ‘प्रातिनिधिक लोकतंत्र में नई जान फूंकने की तुरंत जरूरत है। मतदान प्रक्रिया ऐसी बनाई जानी चाहिए, जिससे मतदाता वोट डालने के लिए उत्साहित हो सकेँ।’
साल 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में 74.7 फीसदी मतदान हुआ था। पर्यवेक्षकों को उम्मीद है कि अगले साल राष्ट्रपति चुनाव में अभी हुए क्षेत्रीय चुनाव से कहीं अधिक मतदान होगा।