श्रीलंका: जन आंदोलन फैलने के बावजूद सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं राजपक्षे परिवार
पर्यवेक्षकों के मुताबिक विपक्ष के बिखरे रहने के कारण राजपक्षे परिवार को सत्ता पर अपना नियंत्रण कसने में मदद मिली है। 17 सदस्यीय नए मंत्रिमंडल का गठन कर उसने इसी बात का संकेत दिया। उसके बाद से सरकारी अधिकारी लगातार मीडिया ब्रीफिंग कर रहे हैं और ये दावा कर रहे हैं कि जल्द ही सरकार जरूरी विदेशी मुद्रा का इंतजाम कर लेगी...
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श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबया राजपक्षे के परिवार ने साफ संकेत दिया है कि देश में बढ़ते जन विरोध के बावजूद उसका सत्ता छोड़ने का कोई इरादा नहीं है। घोर आर्थिक संकट में फंसे इस देश में तकरीबन महीने भर से सरकार विरोधी जन आंदोलन चल रहा है। आंदोलनकारी राजपक्षे परिवार से सत्ता छोड़ने की मांग कर रहे हैं। गोटबया राजपक्षे और उनके भाई प्रधानमंत्री महिंद राजपक्षे ने इस्तीफे की मांग साफ ठुकरा दी है। अब यह भी संकेत दिया गया है कि राजपक्षे परिवार के किसी सदस्य को उसके पद से नहीं हटाया जाएगा।
आईएमएफ से मदद की कोशिश
महिंद राजपक्षे ने कुछ ही रोज पहले अपने मंत्रिमंडल का पुनर्गठन किया है। इसके साथ ही भारत, चीन और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से राजपक्षे सरकार ने वित्तीय मदद हासिल करने की कोशिश तेज कर दी है। इस बीच देश में ईंधन, अनाज, दवाओं, और अन्य जरूरी चीजों की कमी बनी हुई है। महंगाई भी रिकॉर्ड स्तर पर है। इसके विरोध में देश भर में जन प्रदर्शन का आयोजन भी जारी है।
इस हफ्ते श्रीलंकाई के शेयर बाजारों भारी गिरावट दर्ज हुई। इसकी वजह से सोमवार और मंगलवार को वहां कारोबार रोकना पड़ा। इस बीच श्रीलंकाई मुद्रा का भारी अवमूल्यन हो चुका है। श्रीलंका सरकार विदेशी कर्ज के मामले में डिफॉल्ट (समय पर किश्त चुकाने में अक्षम हो जाना) कर चुकी है। इन सबसे दो करोड़ 20 लाख आबादी वाले इस देश में हताशा का आलम है।
विश्लेषकों का कहना है कि इसके बावजूद राजपक्षे सरकार बनी हुई है, तो उसकी वजह विपक्षी दलों का बिखराव है। दिशाहीन विपक्षी पार्टियां आंदोलन पर उतरे लोगों का भरोसा पाने में विफल रही हैं। आंदोलन से जुड़े कोलंबो स्थित एक सामाजिक कार्यकर्ता ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा- ‘हम किसी राजनीतिक दल या नेता को विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं कर रहे हैं। लोग इन सभी नेताओं से तंग आ चुके हैं।’ मुस्लिम समुदाय से आने वाले एक कार्यकर्ता ने कहा- विपक्ष के बंटे रहने से निश्चित रूप से सत्ताधारी पार्टी को मदद मिली है।
बिखरे विपक्ष का मिल रहा फायदा
उधर आंदोलनकारी भी कोई अपना कोई स्पष्ट नेतृत्व पेश करने में नाकाम रहे हैं। विश्लेषकों के मुताबिक इससे राजपक्षे परिवार के लिए अनुकूल स्थिति बनी है। विपक्षी दल यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) के एक नेता ने एशिया टाइम्स से बातचीत में इस बात को स्वीकार किया कि चुनौती दे सकने योग्य नेतृत्व के अभाव से राजपक्षे परिवार को फायदा पहुंचा है। 2019 के राष्ट्रपति चुनाव में गोटाबया राजपक्षे ने यूएनपी के ही उम्मीदवार सजित प्रेमदासा को 10 फीसदी वोटों के अंतर से हराया था।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक विपक्ष के बिखरे रहने के कारण राजपक्षे परिवार को सत्ता पर अपना नियंत्रण कसने में मदद मिली है। 17 सदस्यीय नए मंत्रिमंडल का गठन कर उसने इसी बात का संकेत दिया। उसके बाद से सरकारी अधिकारी लगातार मीडिया ब्रीफिंग कर रहे हैं और ये दावा कर रहे हैं कि जल्द ही सरकार जरूरी विदेशी मुद्रा का इंतजाम कर लेगी।
वैसे पर्यवेक्षकों के बीच एक राय यह भी है कि अगर जल्द ही सरकार आर्थिक संकट को कम करने में सफल नहीं हुई, तो विपक्ष की तमाम कमजोरियों के बावजूद राजपक्षे परिवार के लिए सत्ता में बने रहना संभव नहीं रह जाएगा।