एक्सप्लेनर: यहूदी देश इस्राइल की राजनीति में अरब समुदाय की क्या भूमिका, कितनी आबादी और चुनाव में कितना दबदबा?
इस्राइल में अरब समुदाय की राजनीतिक यात्रा आसान नहीं रही है। देश की स्थापना के बाद लंबे समय तक सीमित प्रतिनिधित्व के बाद अब अरब दल चुनावी राजनीति में अहम भूमिका निभा रहे हैं। करीब 21 फीसदी आबादी वाले इस समुदाय की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी और सरकार गठन में संभावित भूमिका ने एक बार फिर सबका ध्यान खींचा है। आइए विस्तार से जानते हैं।
विस्तार
इस्राइल में अरब समुदाय की आबादी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का इतिहास काफी अहम रहा है। देश की स्थापना के बाद से इस समुदाय की स्थिति में कई बदलाव आए हैं और अब चुनाव के बीच अरब राजनीतिक दलों की भूमिका भी चर्चा में है।
ऐसे में सवाल है कि इस्राइल में अरब समुदाय का इतिहास क्या है? उसकी राजनीति में भागीदारी कैसे बढ़ी? सरकार बनाने में उसके दलों की भूमिका क्यों अहम है?
कैसे बना इस्राइल?
इस्राइल के गठन का इतिहास यहूदियों की अलग देश बनाने की मांग और फलस्तीनी अरबों के अपने राजनीतिक अधिकारों के संघर्ष से जुड़ा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 70 ईस्वी में रोमन सेना ने यरुशलम पर कब्जा कर दूसरे यहूदी मंदिर को नष्ट कर दिया। इसके बाद यहूदी आबादी के बड़े हिस्से को विस्थापन और दमन का सामना करना पड़ा। 135 ईस्वी में रोमन सम्राट हैड्रियन के शासन के दौरान यहूदियों को यरुशलम में प्रवेश करने से रोकने जैसे प्रतिबंध लगाए गए और यहूदी आबादी का दुनिया के दूसरे हिस्सों में फैलाव बढ़ा। हालांकि, यहूदी समुदाय पूरी तरह इस क्षेत्र से समाप्त नहीं हुआ था।
1517 में फिलिस्तीन का क्षेत्र ओटोमन साम्राज्य के नियंत्रण में आ गया। इस शासन के दौरान यहां मुस्लिम, ईसाई और यहूदी समुदाय रहते थे। प्रथम विश्व युद्ध में ओटोमन साम्राज्य की हार के बाद इस क्षेत्र पर ब्रिटेन का नियंत्रण स्थापित हुआ।
1917 में ब्रिटेन ने एक घोषणा की जिसमें कहा गया कि ब्रिटेन फिलिस्तीन को यहूदियों की मातृभूमि बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसे बाल्फोर डिक्लेरेशन कहा जाता है। इटली और जर्मनी जैसे देश राष्ट्रवाद के नाम पर एक हो रहे थे। इसी दौर में जियोनिष्ट आंदोलन की शुरुआत हुई। इसी बीच आए बाल्फोर डिक्लेरेशन ने यहूदियों का फिलिस्तीन में आकर बसना तेज हुआ।
1930 के दशक में नाजी जर्मनी में यहूदियों पर अत्याचार बढ़ने और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान करीब 60 लाख यहूदियों की हत्या के बाद अलग यहूदी देश की मांग को और समर्थन मिला।
दूसरी ओर, फलस्तीनी अरब भी स्वतंत्रता चाहते थे। उन्हें आशंका थी कि यहूदी आव्रजन बढ़ने और अलग यहूदी राज्य बनने से उनके राजनीतिक अधिकार और जमीन पर नियंत्रण प्रभावित होगा। दोनों समुदायों के बीच बढ़ते तनाव के बीच ब्रिटेन ने 1947 में फलस्तीन का मामला संयुक्त राष्ट्र के सामने रख दिया।
संयुक्त राष्ट्र की योजना और इस्राइल की स्थापना
29 नवंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 181 पारित किया। इसके तहत फलस्तीन को दो राज्यों में बांटने की योजना बनाई गई। एक यहूदी राज्य और दूसरा अरब राज्य बनाया जाना था। यरुशलम को अंतरराष्ट्रीय प्रशासन के अधीन रखने का प्रस्ताव भी था।
यहूदी नेतृत्व ने इस योजना को स्वीकार कर लिया, जबकि अरब फलस्तीनी नेतृत्व और अरब देशों ने इसका विरोध किया। इसके बाद क्षेत्र में संघर्ष तेज हो गया।
14 मई 1948 को ब्रिटिश शासन समाप्त होने के साथ डेविड बेन-गुरियन ने इस्राइल की स्वतंत्रता की घोषणा की। अमेरिका ने उसी दिन इस्राइल की अस्थायी सरकार को मान्यता दे दी। अगले दिन अरब देशों की सेनाओं के युद्ध में शामिल होने के साथ पहला अरब-इस्राइल युद्ध शुरू हो गया।
युद्ध के दौरान करीब 7.5 लाख फलस्तीनी अपने घरों से विस्थापित हो गए या उन्हें वहां से निकलना पड़ा। फलस्तीनी इस घटना को नकबा कहते हैं, जिसका अर्थ है तबाही। युद्ध के बाद इस्राइल का नियंत्रण संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना में प्रस्तावित क्षेत्र से आगे तक फैल गया। गाजा पट्टी पर मिस्र और पश्चिमी तट पर जॉर्डन का नियंत्रण हो गया।
इस युद्ध के बाद फलस्तीनियों की एक बड़ी आबादी अपने घरों से दूर हो गई, जबकि कुछ अरब परिवार इस्राइल की सीमाओं के भीतर रह गए।
इस्राइल में अरब समुदाय का इतिहास क्या है?
इस्राइल की स्थापना के बाद देश की सीमाओं के भीतर रह गए अरब नागरिकों को इस्राइली नागरिकता मिली। उन्हें 1949 के पहले संसदीय चुनाव से ही मतदान का अधिकार भी हासिल था। हालांकि, नागरिकता मिलने के बावजूद शुरुआती दशकों में उनकी राजनीतिक भागीदारी सीमित रही।
अरब नागरिक 1966 तक सैन्य प्रशासन के अधीन रहे। इस दौरान उनकी आवाजाही पर प्रतिबंध थे। संसद में उनका प्रतिनिधित्व अक्सर तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन की प्रमुख पार्टी मपाई से जुड़ी राजनीतिक सूचियों के माध्यम से होता था। इन सूचियों के जरिए अरब प्रतिनिधि संसद पहुंचे, लेकिन उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक फैसले लेने की सीमित गुंजाइश मिलती थी।
इसी दौर में अरब नागरिकों के बीच स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग भी विकसित हुई। कुछ लोगों ने इस्राइल की व्यवस्था के भीतर रहकर समान अधिकार हासिल करने पर जोर दिया, जबकि दूसरे समूहों ने फलस्तीनी राष्ट्रीय पहचान और व्यापक फलस्तीनी आंदोलन के साथ अपने संबंधों को प्रमुखता दी। यही अंतर आगे चलकर अरब राजनीतिक दलों की अलग-अलग विचारधाराओं में दिखाई दिया।
इस्राइल में अरब आबादी में क्या बदलाव देखने को मिला?
इस्राइल के केंद्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, देश में अरब आबादी में लगातार वृद्धि हुई है।
1950 में यह आबादी करीब 1.67 लाख थी। 1970 में बढ़कर 4.40 लाख और 1990 में 8.75 लाख हो गई। वर्ष 2003 के अंत तक अरब आबादी 13.02 लाख पहुंच गई थी, जो उस समय इस्राइल की कुल आबादी का करीब 19 फीसदी थी। इसके बाद भी आबादी बढ़ती रही। 2015 में अरब आबादी करीब 18.14 लाख थी। 2026 में अरब आबादी बढ़कर 21.47 लाख पहुंच गई।
2003 के अंत के आंकड़ों के मुताबिक, अरब आबादी में 82 फीसदी मुस्लिम, नौ फीसदी ईसाई और नौ फीसदी द्रूज समुदाय के लोग थे। इनमें मुस्लिम सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय है। इस्राइल की कुल आबादी करीब एक करोड़ है। अरब इस्राइल की कुल आबादी का 21.1 फीसदी हैं।
अरब राजनीतिक दलों की शुरुआत कैसे हुई?
इस्राइल में अरब राजनीति की एक प्रमुख धारा कम्युनिस्ट आंदोलन से विकसित हुई। इस्राइली कम्युनिस्ट पार्टी में अरब और यहूदी कार्यकर्ता भेदभाव के खिलाफ, समाजवाद और फलस्तीनी अधिकारों के समर्थन में साथ आए।
बाद में कम्युनिस्ट आंदोलन में विभाजन हुआ और राका नाम का समूह अरब मतदाताओं के बीच एक प्रमुख राजनीतिक ताकत बना। 1977 में इसने हदाश यानी डेमोक्रेटिक फ्रंट फॉर पीस एंड इक्वैलिटी की स्थापना में भूमिका निभाई। यह अरब और यहूदी कार्यकर्ताओं का साझा राजनीतिक मंच है।
दूसरी ओर, स्वतंत्र फलस्तीनी राष्ट्रवादी राजनीति की भी कोशिशें जारी रहीं। 1995 में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस यानी बलद की स्थापना हुई। इसने 1996 में नेसेट में प्रवेश किया। बलद का तर्क था कि इस्राइल के अरब नागरिकों को फलस्तीनी राष्ट्रीय अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।
अरब राजनीति की एक अन्य धारा इस्लामी आंदोलन से निकली। इसी से यूनाइटेड अरब लिस्ट यानी राअम का उदय हुआ। यह पार्टी धार्मिक पहचान, सामाजिक मुद्दों और अरब समुदायों के लिए व्यावहारिक लाभ हासिल करने पर जोर देती है।
फलस्तीनी आंदोलन का अरब नागरिकों की राजनीति पर क्या असर पड़ा?
दिसंबर 1987 में पश्चिमी तट और गाजा पट्टी में पहला इंतिफादा (विद्रोह) शुरू हुआ। इस आंदोलन ने इस्राइल के अरब नागरिकों के बीच फलस्तीनी पहचान और कब्जे वाले क्षेत्रों में रहने वाले फलस्तीनियों के साथ एकजुटता के मुद्दे को प्रमुख बना दिया।
1990 के दशक में ओस्लो शांति प्रक्रिया से इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष के समाधान की उम्मीदें बढ़ीं। हालांकि, इस्राइल के भीतर अरब नागरिकों की स्थिति और समान अधिकारों को लेकर असंतोष बना रहा।
सितंबर 2000 में दूसरा इंतिफादा शुरू होने के बाद इस्राइल के अरब कस्बों और गांवों में भी प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने कब्जे वाले फलस्तीनी क्षेत्रों के लोगों के समर्थन में आवाज उठाई। अक्तूबर 2000 में इस्राइली पुलिस की कार्रवाई के दौरान 13 अरब नागरिक मारे गए।
इन घटनाओं के बाद सरकार और पुलिस के प्रति अविश्वास बढ़ा। इसका असर मतदान पर भी दिखाई दिया। इस्राइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के अनुसार, 2003 से 2013 के बीच हुए चार चुनावों में अरब नागरिकों का औसत मतदान करीब 57 फीसदी रहा, जबकि राष्ट्रीय औसत लगभग 66 फीसदी था।
इस दौर ने अरब राजनीति में यह सवाल और अहम बना दिया कि समुदाय अपने अधिकारों के लिए स्वतंत्र राजनीतिक आवाज उठाए, यहूदी पार्टियों के साथ मिलकर काम करे या चुनावी व्यवस्था के भीतर दूसरे तरीकों से बदलाव की कोशिश करे।
जॉइंट लिस्ट का गठन क्यों हुआ?
अरब राजनीतिक दलों के सामने एक बड़ी चुनौती यह थी कि अलग-अलग चुनाव लड़ने पर उनके वोट बंट सकते थे। मार्च 2014 में इस्राइल ने संसद में प्रवेश के लिए न्यूनतम चुनावी सीमा दो फीसदी से बढ़ाकर 3.25 फीसदी कर दी। इससे छोटी पार्टियों के लिए नेसेट में सीट हासिल करना मुश्किल हो गया।
इसी पृष्ठभूमि में 2015 में जॉइंट लिस्ट का गठन हुआ। इसमें चार प्रमुख पार्टियां शामिल थीं। हदाश अरब-यहूदी सहयोग और वामपंथी राजनीति से जुड़ी थी, बलद फलस्तीनी राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती थी, ताअल अरब राष्ट्रवादी राजनीति से जुड़ी थी और राअम इस्लामी आंदोलन से निकली पार्टी थी। इस गठबंधन का उद्देश्य अरब मतों के बंटवारे को कम करना और संसद में प्रतिनिधित्व मजबूत करना था।
जनवरी 2019 में अहमद तिबी की पार्टी ताअल के अलग होने के बाद जॉइंट लिस्ट टूट गई। सितंबर 2019 और मार्च 2020 के चुनावों के लिए इसे फिर से बनाया गया। मार्च 2021 में राअम ने अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया। उस चुनाव में जॉइंट लिस्ट को छह सीटें मिलीं, जिनमें हदाश को तीन, ताअल को दो और बलद को एक सीट मिली।
नवंबर 2022 के चुनाव से पहले हदाश और ताअल ने साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया, जबकि बलद और राअम इससे बाहर रहीं।
जनवरी 2026 में अरब समुदायों में बढ़ते अपराध और सुरक्षा को लेकर असंतोष के बीच जॉइंट लिस्ट फिर से गठित हुई। हालांकि, राअम इसमें शामिल नहीं हुई। वह अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहती थी और भविष्य में सरकार बनाने वाले गठबंधन में शामिल होने का विकल्प खुला रखना चाहती थी।
अरब पार्टियों पर कब-कब लगा प्रतिबंध?
इस्राइल में अरब पार्टियों को चुनाव लड़ने से रोकने की कोशिशें कई बार हुई हैं। 1964 में सरकार ने अल-अर्द आंदोलन पर प्रतिबंध लगाया। 1965 में इससे जुड़ी स्वतंत्र अरब सूची को भी सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव लड़ने से रोक दिया।
इसके बाद 2003 और 2013 के चुनावों से पहले बलद और राअम-ताअल जैसी पार्टियों को अयोग्य ठहराने की मांग उठी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में बलद और उसके नेता अजमी बिशारा को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी।
2026 के चुनाव से पहले 23 सितंबर को केंद्रीय चुनाव समिति ने राअम और जॉइंट लिस्ट को चुनाव लड़ने से रोकने का फैसला किया। समिति में इन पार्टियों पर इस्राइल की यहूदी और लोकतांत्रिक पहचान को नकारने और सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करने के आरोप लगाए गए। हालांकि, 2 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पार्टियों को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी।
मौजूदा चुनाव में अरब पार्टियों की भूमिका क्यों अहम है?
इस्राइल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। इसलिए जब बड़े गठबंधनों में से कोई भी बहुमत तक नहीं पहुंचता, तो छोटे दलों का समर्थन सरकार गठन की बातचीत में महत्वपूर्ण हो सकता है।
एग्जिट पोल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन को करीब 53 सीटें मिल सकती हैं। लिकुड पार्टी गादी आइजेनकॉट की यशर पार्टी से पांच से छह सीटें आगे बताई गई है। आइजेनकॉट के गठबंधन को 48 सीटें मिलती दिख रही हैं।
वहीं जॉइंट लिस्ट और राअम पार्टी को मिलाकर 19 सीटें मिल रही हैं। अरब पार्टियों के अनुसार, उनके समुदाय में मतदान 75 प्रतिशत से ज्यादा रहा। अरब समुदाय में भी मतदान में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।
यह इस्राइल में अरब प्रतिनिधित्व का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा हो सकता है। इस बार अरब समुदाय में मतदान बढ़ने को नेतन्याहू की दक्षिणपंथी सरकार के खिलाफ नाराजगी से जोड़कर देखा जा रहा है।
इस बीच नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने मतदान में गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं। पार्टी ने दावा किया कि अरब पार्टियों ने कथित तौर पर वोट खरीदने, मतदाताओं को धमकाने, हिंसा, जालसाजी और अवैध सॉफ्टवेयर के जरिए मतदाताओं को जुटाने जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया। पार्टी ने पुलिस और इस्राइल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट से जांच कराने की मांग की।