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नक्शा विवाद पर बोले विशेषज्ञ, उल्टा पड़ सकता है राष्ट्रवाद के नाम पर सस्ती लोकप्रियता बटोरने का ओली सरकार का दांव
Sun, 14 Jun 2020 09:47 PM IST
गौरव पाण्डेय
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Sun, 14 Jun 2020 09:47 PM IST
सार
नेपाल और भारत के बीच चल रहे नक्शा विवाद को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल सरकार का यह दांव उन्हीं के लिए उल्टा पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक मामलों में बड़े स्तर पर भारत पर निर्भर नेपाल को कोई भी कदम सोच समझ कर उठाना चाहिए और भारत से वार्ता कर इस मसले का समाधान करना चाहिए।
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नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली (फाइल फोटो)
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विस्तार
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और नेपाल के पास दोनों देशों के बीच चल रहे सीमा विवाद को जल्द से जल्द हल करने के सिवा कोई चारा नहीं है। विशेषज्ञों और वरिष्ठ पत्रकारों ने रविवार को कहा कि नेपाल का नेतृत्व राष्ट्रवाद के नाम पर सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए यह कर रहा है।
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बता दें कि नेपाल की संसद के निचले सदन में शनिवार को नए नक्शे को लेकर विधेयक पारित हो गया था। अब यह विधेयक संसद के उच्च सदन में जाएगा। आज उच्च सदन में हुई बैठक में इस नए राजनीतिक नक्शे को संविधान में शामिल करने के लिए विचार प्रस्ताव पारित किया गया।
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नए नक्शे के मुताबिक भारत के उत्तराखंड में आने वाले लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को नेपाल ने अपना हिस्सा बताया है। हालांकि, भारत ने नेपाल के इस फैसले को अस्वीकार्य करार देते हुए ऐतिहासिक तथ्यों से एकदम अलग बताया है और कहा है कि ये तीनों क्षेत्र भारत के हैं और रहेंगे।
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नेपाली संसद के निचले सदन से विधेयक पारित होने के बाद विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने शनिवार को कहा था कि हम इस मामले में अपना पक्ष साफ कर चुके हैं। इस तरह का कृत्रिम विस्तार ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं है। यह कदम सीमा मुद्दे पर आपसी बातचीत और समझ के खिलाफ भी है।
वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक डेली के संपादक प्रह्लाद रिजल ने कहा कि नेपाल द्वारा नक्शे में संशोधन और कालापानी क्षेत्र को अपने में शामिल करने का फैसला यह दिखाता है कि केपी ओली सरकार राष्ट्रवाद के नाम पर महज सस्ती लोकप्रियता पाना चाहती है, इसका उन्हें उल्टा परिणाम भुगतना पड़ सकता है।
रिजल ने चेतावनी दी कि ओली सरकार का यह दांव नेपाल और भारत के बीच की भूमि को लेकर दोनों देशों के बीच नया और बड़ा विवाद का मुद्दा उत्पन्न कर सकता है। उन्होंने कहा, 'ऐसी रिपोर्ट सामने आई हैं जिनसे पता चलता है कि नेपाल ने यह कदम चीन के कहने पर उठाया है। अगर ऐसा है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है।'
उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का यह दांव उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पुष्प कमल दहल प्रचंड के बीच उत्पन्न हो रहे विवाद को लेकर भी हो सकता है। रिजल ने कहा, प्रधानमंत्री ओली को पार्टी में अपना आधिपत्य बनाए रखने के लिए स्वयं को अधिक राष्ट्रवादी साबित करना पड़ा।
ओली सरकार को कोरोना वायरस प्रबंधन के मोर्चे पर भी खासी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। सोशल मीडिया पर आवाजें उठ रही थीं कि सरकार इसे ठीक से नहीं संभाल सकती है। पर्याप्त जांच न होना, चिकित्सा उपकरणों की खरीद में अनियमितता और अन्य मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरे हैं।
दि काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल में कोरोना वायरस के अभी तक 5,760 मामले सामने आ चुके हैं। वहीं, इस जानलेवा वैश्विक महामारी की वजह से अभी तक नेपाल 19 लोगों की मौत हो चुकी है। नेपाल में कोरोना वायरस के अधिकांश मामलों की पुष्टि मरणोपरांत हो पाई है।
रिजल ने कहा कि यह देखते हुए कि नेपाल अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए 75 फीसदी आयात के लिए भारत पर निर्भर था। ऐसा लगता है कि नेपाल सरकार ने इस बारे में अपने लंबे समय के हितों को ध्यान में नहीं रखा।
यह देखते हुए कि नेपाल अपनी दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 75 प्रतिशत आयात के लिए भारत पर निर्भर था, रिजल ने कहा कि ऐसा लगता है कि सरकार ने इसके दीर्घकालिक निहितार्थ के बारे में नहीं सोचा होगा। ऐसे में यह स्थिति नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए उल्टी हो सकती है।
रिजल ने कहा, अगर भारत के साथ हमारे संबंध बिगड़ते हैं तो यह स्थिति हमारे आर्थिक हितों के लिए प्रतिकूल साबित हो सकती है। हम डेढ़ दशक पहले तक दक्षिण की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों से सीख सकते हैं कि चीन मीठे शब्द बोलने के अलावा कुछ नहीं कर सकता है। चीन भारत का विकल्प नहीं बन सकता।
वहीं, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि दोनों देशों के बीच वार्ता के जरिए यह विवाद सुलझाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। हमें मसले को सुलझाने के लिए व्यापक और गहन बातचीत की जरूरत है और नेपाल को परिपक्व कूटनीति दिखाने की आवश्यकता है।
वहीं, बाकी विशेषज्ञों से इतर नेपाल सेना के सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर जनरल प्रेम सिंह बसन्यात ने कहा कि भारत द्वारा नेपाल की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान न करना दोनों देशों के बीच सदियों पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों को खराब करने का मूल कारण रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत को नेपाल के साथ रिश्ते को मित्रतापूर्ण और पड़ोसी भावना से बनाए रखना चाहिए।