{"_id":"617d2132f648910bba415144","slug":"expensive-drugs-in-america-joe-biden-could-not-tackle-lobbying-of-pharmaceutical-companies","type":"story","status":"publish","title_hn":"अमेरिका में महंगी दवाएं: दवा कंपनियों की लॉबिंग के आगे हार गए जो बाइडन","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
अमेरिका में महंगी दवाएं: दवा कंपनियों की लॉबिंग के आगे हार गए जो बाइडन
Sat, 30 Oct 2021 04:10 PM IST
Amit Mandal
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
Published by: Amit Mandal
Updated Sat, 30 Oct 2021 04:10 PM IST
सार
दवा कंपनियां लॉबिंग पर हर साल एक अरब डॉलर से ज्यादा खर्च करती हैं। इसका नतीजा है कि अमेरिका में लोगों को तमाम दूसरे विकसित देशों की तुलना में सभी प्रकार की दवाएं काफी महंगी मिलती हैं।
विज्ञापन
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन
- फोटो : पीटीआई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की यह पुरानी राय रही है कि सरकार को दवाओं की कीमत नियंत्रित करने का अधिकार मिलना चाहिए। इसीलिए जब उन्होंने अपनी बिल्ड बैक बेटर (सॉफ्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर) योजना पेश की, तो उसमें अमेरिका सरकार की मेडिकेयर योजना के लिए दवा कंपनियों से किफायदी दरों पर दवाएं खरीदने का अधिकार सरकार को देने का प्रावधान रखा गया। लेकिन इस गुरुवार को जब उन्होंने अपनी संशोधित योजना पेश की, तो उसमें से ये प्रावधान गायब था।
दवा कंपनियों के आगे सभी नतमस्तक
अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने इसकी खबर देते हुए अपनी रिपोर्ट में यह जिक्र किया है कि पिछले तकरीबन 30 वर्षों से हर अमेरिकी राष्ट्रपति ने दवा कंपनियों से सौदेबाजी करने के लिए सरकार को अधिकृत करने की इच्छा जताई है। खासकर पूर्व राष्ट्रपतियों बिल क्लिंटन, बराक ओबामा, और डॉनल्ड ट्रंप ने दवाओं की महंगाई रोकने को अपना एजेंडा बनाया था। लेकिन उनमें कोई ऐसा करने में सफल नहीं हुआ।
सरकारी कामकाज में पारदर्शिता के लिए अभियान चलाने वाली संस्था ओपन सीक्रेट्स का दावा है कि ऐसा दवा और विज्ञापन उद्योग की लॉबिंग के कारण होता है। ये कंपनियां लॉबिंग पर हर साल एक अरब डॉलर से ज्यादा खर्च करती हैं। इसका नतीजा है कि अमेरिका में लोगों को तमाम दूसरे विकसित देशों की तुलना में सभी प्रकार की दवाएं काफी महंगी मिलती हैं। अब बिल्ड बैक बेटर योजना से दवा उद्योग संबंधी प्रावधान हटने का मतलब है कि अमेरिकी जनता की महंगी दवाएं खरीदने की मजबूरी बनी रहेगी।
विज्ञापन
अकेले वॉशिंगटन में ही 1500 लॉबिस्ट तैनात
राष्ट्रपति बाइडन के ताजा एलान के बाद हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में मेडिसीन के प्रोफेसर जेरी एवर्न ने कहा कि यह इस बात का उल्लेखनीय उदाहरण है कि कैसे एक बेहतरीन कानून के प्रस्ताव को उद्योग जगत ने अपने प्रचार अभियान से नाकाम कर दिया है। सोशलिस्ट नेता और सीनेट की बजट समिति के अध्यक्ष बर्नी सैंडर्स ने कहा कि दवा उद्योग ने लगभग 1500 लॉबिस्ट्स को सिर्फ वॉशिंगटन में तैनात किया है। दोनों पार्टियों ऐसे नेता भी लॉबिस्ट के रूप में काम कर हैं, जो कांग्रेस (संसद) के सदस्य रह चुके हैं। इसका मतलब यह हुआ कि कांग्रेस के हर सदस्य के लिए दवा उद्योग ने औसतन तीन लॉबिस्ट नियुक्त किए हैं।
जानकारों का कहना है कि दवा उद्योग राजनेताओं को बड़े पैमाने पर चंदा देता है। इसलिए निर्वाचित नेता उसके प्रभाव में रहते हैं। इस बार शुरुआत से ही दवा उद्योग का प्रचार तंत्र यह कहता रहा कि अगर दवा कंपनियों को सस्ती दवाएं बेचनी पड़ीं, तो उनका अनुसंधान पर खर्च घट जाएगा। इसका नुकसान मरीजों को ही होगा।
सस्ती दवाएं खरीदने पर प्रस्ताव बेहद लोकप्रिय
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में बताया गया है कि सस्ती दवाएं खरीदने के लिए सरकार को अधिकृत करने का प्रावधान अमेरिकी जनमत में बेहद लोकप्रिय है। जनमत सर्वेक्षणों में उसका डेमोक्रेटिक पार्टी समर्थक 92 फीसदी, रिपब्लिकन पार्टी समर्थक 76 फीसदी और खुद को किसी पार्टी का समर्थक न मानने वाले मतदाताओं के 85 फीसदी हिस्से ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। इसके बावजूद रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी के मध्यमार्गी नेताओं ने इस प्रस्ताव का पक्ष नहीं लिया। राष्ट्रपति बाइडन ने भी इसके लिए ‘करो या मरो’ की लड़ाई नहीं लड़ी। आखिरकार दवाओं की कीमत नियंत्रित करने की उनकी योजना नाकाम हो गई है।
विज्ञापन
दवा कंपनियों के आगे सभी नतमस्तक
अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने इसकी खबर देते हुए अपनी रिपोर्ट में यह जिक्र किया है कि पिछले तकरीबन 30 वर्षों से हर अमेरिकी राष्ट्रपति ने दवा कंपनियों से सौदेबाजी करने के लिए सरकार को अधिकृत करने की इच्छा जताई है। खासकर पूर्व राष्ट्रपतियों बिल क्लिंटन, बराक ओबामा, और डॉनल्ड ट्रंप ने दवाओं की महंगाई रोकने को अपना एजेंडा बनाया था। लेकिन उनमें कोई ऐसा करने में सफल नहीं हुआ।
विज्ञापन
सरकारी कामकाज में पारदर्शिता के लिए अभियान चलाने वाली संस्था ओपन सीक्रेट्स का दावा है कि ऐसा दवा और विज्ञापन उद्योग की लॉबिंग के कारण होता है। ये कंपनियां लॉबिंग पर हर साल एक अरब डॉलर से ज्यादा खर्च करती हैं। इसका नतीजा है कि अमेरिका में लोगों को तमाम दूसरे विकसित देशों की तुलना में सभी प्रकार की दवाएं काफी महंगी मिलती हैं। अब बिल्ड बैक बेटर योजना से दवा उद्योग संबंधी प्रावधान हटने का मतलब है कि अमेरिकी जनता की महंगी दवाएं खरीदने की मजबूरी बनी रहेगी।
विज्ञापन
अकेले वॉशिंगटन में ही 1500 लॉबिस्ट तैनात
राष्ट्रपति बाइडन के ताजा एलान के बाद हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में मेडिसीन के प्रोफेसर जेरी एवर्न ने कहा कि यह इस बात का उल्लेखनीय उदाहरण है कि कैसे एक बेहतरीन कानून के प्रस्ताव को उद्योग जगत ने अपने प्रचार अभियान से नाकाम कर दिया है। सोशलिस्ट नेता और सीनेट की बजट समिति के अध्यक्ष बर्नी सैंडर्स ने कहा कि दवा उद्योग ने लगभग 1500 लॉबिस्ट्स को सिर्फ वॉशिंगटन में तैनात किया है। दोनों पार्टियों ऐसे नेता भी लॉबिस्ट के रूप में काम कर हैं, जो कांग्रेस (संसद) के सदस्य रह चुके हैं। इसका मतलब यह हुआ कि कांग्रेस के हर सदस्य के लिए दवा उद्योग ने औसतन तीन लॉबिस्ट नियुक्त किए हैं।
जानकारों का कहना है कि दवा उद्योग राजनेताओं को बड़े पैमाने पर चंदा देता है। इसलिए निर्वाचित नेता उसके प्रभाव में रहते हैं। इस बार शुरुआत से ही दवा उद्योग का प्रचार तंत्र यह कहता रहा कि अगर दवा कंपनियों को सस्ती दवाएं बेचनी पड़ीं, तो उनका अनुसंधान पर खर्च घट जाएगा। इसका नुकसान मरीजों को ही होगा।
सस्ती दवाएं खरीदने पर प्रस्ताव बेहद लोकप्रिय
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में बताया गया है कि सस्ती दवाएं खरीदने के लिए सरकार को अधिकृत करने का प्रावधान अमेरिकी जनमत में बेहद लोकप्रिय है। जनमत सर्वेक्षणों में उसका डेमोक्रेटिक पार्टी समर्थक 92 फीसदी, रिपब्लिकन पार्टी समर्थक 76 फीसदी और खुद को किसी पार्टी का समर्थक न मानने वाले मतदाताओं के 85 फीसदी हिस्से ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। इसके बावजूद रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी के मध्यमार्गी नेताओं ने इस प्रस्ताव का पक्ष नहीं लिया। राष्ट्रपति बाइडन ने भी इसके लिए ‘करो या मरो’ की लड़ाई नहीं लड़ी। आखिरकार दवाओं की कीमत नियंत्रित करने की उनकी योजना नाकाम हो गई है।