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हादसे का शिकार होने से बचीं यूरोपीय आयोग की प्रमुख: कैसे हवा में बंद हो गया विमान का GPS, ये कितना बड़ा खतरा?
Tue, 02 Sep 2025 06:29 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 02 Sep 2025 06:29 AM IST
सार
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष के विमान के नैविगेशन सिस्टम से छेड़छाड़ का मसला क्या है और यह कैसे हो सकता है? यह कितना खतरनाक है? हालिया वर्षों में किन जगहों पर जीपीएस बंद होने या इससे छेड़छाड़ होने से जुड़ी घटनाएं दर्ज की गई हैं? इससे निपटने के लिए क्या तरीके अपनाए जा सकते हैं? आइये जानते हैं...
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यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सला वॉन डेर लेयन।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
यूरोपीय आयोग (ईसी) की प्रमुख उर्सला वॉन डेर लेयन का विमान हादसे का शिकार होने से बच गया। आयोग के प्रवक्ता के मुताबिक, रविवार को जब यूरोप की शीर्ष नेता दक्षिणी बुल्गारिया में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने जा रही थीं, तब उनके विमान का जीपीएस (नैविगेशन सिस्टम) अचानक बंद हो गया। हालांकि, पायलट ने समझ-बूझ से विमान को सही-सलामत लैंड करा लिया।
आयोग की तरफ से दावा किया गया कि उसे बुल्गारिया के अधिकारियों से जानकारी मिली है कि इस घटना के पीछे रूस का हाथ होने का सबसे ज्यादा शक है। अमेरिकी अखबार द फाइनेंशियल टाइम्स (एफटी) ने सूत्रों के हवाले से दावा किया कि वॉन डेर लेयन का विमान जीपीएस बंद होने के बाद प्लोवदिव एयरपोर्ट पर उतरा। विमान को सही-सलामत लैंड कराने के लिए पायलट को कागज वाले नक्शों का इस्तेमाल कर रास्ता ढूंढना पड़ा।
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आयोग की तरफ से दावा किया गया कि उसे बुल्गारिया के अधिकारियों से जानकारी मिली है कि इस घटना के पीछे रूस का हाथ होने का सबसे ज्यादा शक है। अमेरिकी अखबार द फाइनेंशियल टाइम्स (एफटी) ने सूत्रों के हवाले से दावा किया कि वॉन डेर लेयन का विमान जीपीएस बंद होने के बाद प्लोवदिव एयरपोर्ट पर उतरा। विमान को सही-सलामत लैंड कराने के लिए पायलट को कागज वाले नक्शों का इस्तेमाल कर रास्ता ढूंढना पड़ा।
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बाद में बुल्गारिया की सरकार ने भी पुष्टि की कि यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष जिस वक्त फ्लाइट में थीं, उसी दौरान विमान के जीपीएस सिस्टम को जानकारी पहुंचाने वाले सैटेलाइट सिग्नल अचानक बंद हो गए। इसके बाद विमान की सुरक्षा और हवाई नियंत्रण बनाए रखने के लिए लैंडिंग के दूसरे तरीकों को आजमाया गया।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर नैविगेशन सिस्टम से छेड़छाड़ का मसला क्या है और यह कैसे हो सकता है? यह कितना खतरनाक है? हालिया वर्षों में किन जगहों पर जीपीएस बंद होने या इससे छेड़छाड़ होने से जुड़ी घटनाएं दर्ज की गई हैं? इससे निपटने के लिए क्या तरीके अपनाए जा सकते हैं? आइये जानते हैं...
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर नैविगेशन सिस्टम से छेड़छाड़ का मसला क्या है और यह कैसे हो सकता है? यह कितना खतरनाक है? हालिया वर्षों में किन जगहों पर जीपीएस बंद होने या इससे छेड़छाड़ होने से जुड़ी घटनाएं दर्ज की गई हैं? इससे निपटने के लिए क्या तरीके अपनाए जा सकते हैं? आइये जानते हैं...
क्या है नैविगेशन सिस्टम से छेड़छाड़ का मामला, यह होती कैसे है?
आसान शब्दों में समझें तो सड़क मार्ग से लेकर हवाई मार्ग और समुद्री मार्ग में आने-जाने के लिए गाड़ियां, विमान और शिप रास्ता खोजने के लिए नैविगेशन सिस्टम पर निर्भर हैं। यह नैविगेशन सिस्टम कई तरह के हैं, हालांकि सबसे ज्यादा प्रचलित प्रणाली- ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) है।
जीपीएस एक सैटेलाइट और इससे सिग्नल हासिल करने वाले उपकरणों का नेटवर्क है, जो कि पृथ्वी पर हर एक वस्तु की लोकेशन और जगह का 'समय' ठीक ढंग से पता कर सकता है। यानी ये एक तरह का निगरानी तंत्र है, जो कि जमीन, हवा और समुद्र तक में सैटेलाइट के जरिए किसी भी ऐसी चीज को ट्रैक कर सकता है बशर्ते, उस चीज में सैटेलाइट सिग्नल रिसीव करने की क्षमता हो।
आसान शब्दों में समझें तो सड़क मार्ग से लेकर हवाई मार्ग और समुद्री मार्ग में आने-जाने के लिए गाड़ियां, विमान और शिप रास्ता खोजने के लिए नैविगेशन सिस्टम पर निर्भर हैं। यह नैविगेशन सिस्टम कई तरह के हैं, हालांकि सबसे ज्यादा प्रचलित प्रणाली- ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) है।
जीपीएस एक सैटेलाइट और इससे सिग्नल हासिल करने वाले उपकरणों का नेटवर्क है, जो कि पृथ्वी पर हर एक वस्तु की लोकेशन और जगह का 'समय' ठीक ढंग से पता कर सकता है। यानी ये एक तरह का निगरानी तंत्र है, जो कि जमीन, हवा और समुद्र तक में सैटेलाइट के जरिए किसी भी ऐसी चीज को ट्रैक कर सकता है बशर्ते, उस चीज में सैटेलाइट सिग्नल रिसीव करने की क्षमता हो।
हालांकि, अगर सैटेलाइट और सैटेलाइट के सिग्नल हासिल करने वाले उपकरण के बीच संपर्क को किसी तरह तोड़ दिया जाए तो जिस भी चीज को ट्रैक किया जा रहा है, उसकी लोकेशन अपने आप खो जाएगी। यानी सैटेलाइट उसका पता नहीं लगा पाएंगी। आधुनिक तकनीक के आने के बाद से कई देशों ने ऐसे उपकरण बना लिए हैं, जो कि जीपीएस सिग्नल को पूरी तरह बंद कर सकते हैं या फिर उनमें दखल दे सकते हैं।
नैविगेशन के साथ खिलवाड़ कितना खतरनाक है?
किसी भी नैविगेशन सिस्टम में दखल देने की घटना अपने आप में काफी खतरनाक है। फिर चाहे वह नागरिक विमान का मामला हो या सैन्य विमान का। दरअसल, आधुनिक समय में अधिकतर विमान जीपीएस के जरिए न सिर्फ अपने हवाई मार्ग पर बने रहते हैं, बल्कि इससे ही एयरपोर्ट पर उनकी लोकेशन भी ट्रैक होती है। ऐसे में जीपीएस सिग्नल के बंद होने या इनमें अवरोध पैदा होने की स्थिति में पायलट विमान की स्थिति और लोकेशन को लेकर गलती कर सकता है और इससे प्लेन के जमीन पर गलत जगह लैंड होने या किसी अन्य विमान से टकराने का खतरा बढ़ सकता है।
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किसी भी नैविगेशन सिस्टम में दखल देने की घटना अपने आप में काफी खतरनाक है। फिर चाहे वह नागरिक विमान का मामला हो या सैन्य विमान का। दरअसल, आधुनिक समय में अधिकतर विमान जीपीएस के जरिए न सिर्फ अपने हवाई मार्ग पर बने रहते हैं, बल्कि इससे ही एयरपोर्ट पर उनकी लोकेशन भी ट्रैक होती है। ऐसे में जीपीएस सिग्नल के बंद होने या इनमें अवरोध पैदा होने की स्थिति में पायलट विमान की स्थिति और लोकेशन को लेकर गलती कर सकता है और इससे प्लेन के जमीन पर गलत जगह लैंड होने या किसी अन्य विमान से टकराने का खतरा बढ़ सकता है।
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रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2024 में हर दिन वैश्विक स्तर पर 700 जीपीएस स्पूफिंग के मामले सामने आए। इनमें विमान से लेकर पानी के जहाज और ट्रैफिक सिस्टम के जीपीएस सिस्टम में गड़बड़ियों का खुलासा हुआ था। हालांकि, हर बार इसके लिए कोई गलत हरकत जिम्मेदार नहीं होती। कई बार इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन की वजह से जीपीएस सिग्नल बाधित हो सकते हैं, जो कि मौजूदा समय में लगभग हर उपकरण से निकलते हैं। इसके अलावा सौर गतिविधियां और पहाड़ से निकलने वाली चुंबकीय तरंगें भी जीपीएस सिग्नल को प्रभावित करती हैं।
कहां-कहां ज्यादा देखी गई हैं ऐसी स्थितियां?
कुछ देशों ने ऐसी तकनीक पर तेजी से काम किया है, जो कि संघर्ष के दौरान दुश्मन के नैविगेशन सिस्टम को नुकसान पहुंचा सके। हालांकि, इसका एक दुष्प्रभाव यह हो सकता है कि नागरिक विमान और सैन्य विमान कई बार जिस फ्रीक्वेंसी पर सैटेलाइट से संपर्क बनाते हैं, वह समान होती है। ऐसे में किसी सैन्य विमान के जीपीएस ढांचे से छेड़छाड़ से नागरिक विमानों के जीपीएस सिग्नल भी निशाने पर आ सकते हैं और इससे भारी नुकसान होने की संभावना रहती है।
कहां-कहां ज्यादा देखी गई हैं ऐसी स्थितियां?
कुछ देशों ने ऐसी तकनीक पर तेजी से काम किया है, जो कि संघर्ष के दौरान दुश्मन के नैविगेशन सिस्टम को नुकसान पहुंचा सके। हालांकि, इसका एक दुष्प्रभाव यह हो सकता है कि नागरिक विमान और सैन्य विमान कई बार जिस फ्रीक्वेंसी पर सैटेलाइट से संपर्क बनाते हैं, वह समान होती है। ऐसे में किसी सैन्य विमान के जीपीएस ढांचे से छेड़छाड़ से नागरिक विमानों के जीपीएस सिग्नल भी निशाने पर आ सकते हैं और इससे भारी नुकसान होने की संभावना रहती है।
दिसंबर 2023 में उड्डयन सलाहकार संगठन- ऑप्स ग्रुप (OPSGROUP) ने पश्चिम एशियाई देशों- इराक, ईरान और इस्राइल से लेकर काला सागर तक में निजी और वाणिज्यिक विमानों के जीपीएस सिग्नल से छेड़छाड़ का खुलासा किया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि युद्ध क्षेत्रों के आसपास खास तौर पर जीपीएस सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। कई देश दुश्मनों के ड्रोन्स को भटकाने के लिए जीपीएस जैमर लगाते हैं, जिससे नागरिक विमानों के जीपीएस भी प्रभावित होते हैं।
बीते कुछ वर्षों में बाल्टिक सागर के आसपास के क्षेत्र में भी यह समस्या देखी गई है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से यह परेशानी बढ़ी है। इसके चलते पोलैंड से लेकर स्वीडन और फिनलैंड तक विमानों को जीपीएस की समस्या झेलनी पड़ी है। दूसरी तरफ बुल्गारिया सीधा काला सागर के करीब है, जहां इस तरह की घटनाएं दर्ज हुई हैं।
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बीते कुछ वर्षों में बाल्टिक सागर के आसपास के क्षेत्र में भी यह समस्या देखी गई है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से यह परेशानी बढ़ी है। इसके चलते पोलैंड से लेकर स्वीडन और फिनलैंड तक विमानों को जीपीएस की समस्या झेलनी पड़ी है। दूसरी तरफ बुल्गारिया सीधा काला सागर के करीब है, जहां इस तरह की घटनाएं दर्ज हुई हैं।
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इस तरह की घटनाओं के लिए जिम्मेदार कौन?
रिकॉर्ड्स के मुताबिक, जीपीएस में बड़े स्तर पर गड़बड़ी का अनुभव सबसे पहले रूस ने 2017 में किया था। तब उसके कई शिप अचानक जीपीएस में गड़बड़ी होने की वजह से रास्ता भटक गए थे और गलत ठिकानों पर पहुंच गए।
मौजूदा समय में पश्चिमी देशों के नेता और अधिकारी इसके लिए रूस को जिम्मेदार ठहराते हैं तो वहीं कुछ और विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ब्रिटिश सेनाएं भी दुनिया के दूसरे हिस्सों में जीपीएस बाधित करने की तकनीक इस्तेमाल कर रही हैं।
रिकॉर्ड्स के मुताबिक, जीपीएस में बड़े स्तर पर गड़बड़ी का अनुभव सबसे पहले रूस ने 2017 में किया था। तब उसके कई शिप अचानक जीपीएस में गड़बड़ी होने की वजह से रास्ता भटक गए थे और गलत ठिकानों पर पहुंच गए।
मौजूदा समय में पश्चिमी देशों के नेता और अधिकारी इसके लिए रूस को जिम्मेदार ठहराते हैं तो वहीं कुछ और विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ब्रिटिश सेनाएं भी दुनिया के दूसरे हिस्सों में जीपीएस बाधित करने की तकनीक इस्तेमाल कर रही हैं।
इससे निपटने के लिए क्या तरीके अपनाए जा सकते हैं?
अधिकतर देश अब अपने हवाई और समुद्री मार्ग के नैविगेशन के लिए जीपीएस पर निर्भरता घटा रहे हैं। कई कंपनियां अब जीपीएस के साथ-साथ रूस के ग्लोनास (GLONASS), यूरोप के गैलिलियो और चीन के बेइदू नैविगेशन सिस्टम को भी सहायक प्रणालियों के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। भारतीय सेना ने इसरो की मदद से अपना अलग नाविक (NavIC) सिस्टम विकसित किया है, जो कि भारत और आसपास के 1500 किलोमीटर के दायरे में सही लोकेशन और समय की गणना करता है।
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अधिकतर देश अब अपने हवाई और समुद्री मार्ग के नैविगेशन के लिए जीपीएस पर निर्भरता घटा रहे हैं। कई कंपनियां अब जीपीएस के साथ-साथ रूस के ग्लोनास (GLONASS), यूरोप के गैलिलियो और चीन के बेइदू नैविगेशन सिस्टम को भी सहायक प्रणालियों के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। भारतीय सेना ने इसरो की मदद से अपना अलग नाविक (NavIC) सिस्टम विकसित किया है, जो कि भारत और आसपास के 1500 किलोमीटर के दायरे में सही लोकेशन और समय की गणना करता है।
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