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कितने सच्चे हैं कार कंपनियों के दावे?

Mon, 18 Mar 2013 12:28 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Mon, 18 Mar 2013 12:28 PM IST
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how many companies claim are true

चिकने टायरों की प्रतिरोधक क्षमता बढाने के लिए उसमें ढेर सारी हवा भर दी जाती है।

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घर्षण कम हो इसके लिए ब्रेक में कुछ बदलाव लाया जाता है, या इसे कई बार हटा भी दिया जाता है।

हवाई बाधाओं से बचने के लिए बॉडी पैनल और विंडो के बीच के खांचों को हटा दिया जाता है और कभी-कभी तो विंग मिरर को भी निकाल दिया जाता है।

ये सब आज कल की कारों में किया जाना आम है। अब आप पूछेंगे किस लिए?

'फ्यूल एफिशियंसी' यानि गाड़ी की ईंधन खपत की कार्यक्षमता और 'एमिशन टेस्ट' यानि उत्सर्जन परीक्षणों में पास होने के लिए कार निर्माताओं में होड़ सी लग गई है।

अपनी कारों को ज्यादा से ज्यादा स्वच्छ और ईंधन की बचत करने वाली कार साबित करने के लिए वो ये सब करने को तैयार हैं।

परिवहन और पर्यावरण दबाव समूह के लिए काम करने वाले क्लीन व्हीकल मैनेजर, ग्रेग आर्चर के अनुसार “ये छोटे छोटे झटकों वाला एक बड़ा झटका है।”

यूरोपीय संघ में जितनी भी कारें बेची जाती हैं उन सभी को कई परीक्षणों से गुजरना होता है।

यह जांच की जाती है कि, ये कारें कार्बन डाइऑक्साइड या नाईट्रोजन आक्साइड जैसी हानिकारक गैसों की कितनी मात्रा छोड़ती हैं? या कार कितना ईंधन खाती है?।

भ्रामक आंकड़ें
असलियत में, ये आंकड़ें गंभीर रुप से भ्रम पैदा करते है। परिवहन और पर्यावरण समूह ने जो रपट जारी की है उसके अनुसार कार निर्माता संबंधित परीक्षणों में बड़ी सफाई से बच निकलने की कवायद में लगे रहते है।
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ग्रेग आर्चर कहते हैं, “नतीजा ये है कि हानिकारक गैसों के उत्सर्जन और ईंधन बचत के बारे में टेस्ट जो बताता हैं, उसमें और ड्राइवर के अनुभव में साफ फर्क दिखता है। यही नहीं, यह फर्क बढ़ता ही जा रहा है।”
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सरकारी आंकड़ों पर अगर एक नज़र डालें तो वर्ष 2001 और 2011 के बीच यूरोपीय संघों में कारों से कार्बन डाइआक्साइड के उत्सर्जन की मात्रा 180 ग्राम/किमी से घटकर 150 ग्राम/किमी के स्तर पर आ गई।

इसकी तुलना में गैरसरकारी आंकड़ों में यह उत्सर्जन 190 ग्राम/किमी से 80 ग्राम/किमी के रुप में ज्यादा मात्रा में देखा गया। इसमें जर्मन चालकों के उपर किए गए एक अध्ययन के ज़रिए परिवहन और पर्यावरण विभाग द्वारा इकट्ठा किए गए आंकड़े भी शामिल है।

इस तथ्य से यूरोपीय उपभोक्ता संगठन, बीईयूसी के महानिदेशक मोनिक गोयन्स पूरी तरह से सहमत हैं, “कार मालिकों को भटकाया जा रहा है, एक परफेक्ट कार की कल्पना लिए वे शोरुम में आते हैं। मगर वहां उन्हें पूरा सच नहीं बताया जाता।”

वे कहती हैं, “ईंधन के उपभोग में कटौती का जो स्तर प्रयोगशालाओं में हासिल किया गया है, उसका आर्थिक फायदा आम ग्राहकों तक नहीं पहुंच पा रहा।”

कुछ बड़ी कमियां
कार निर्माताओं के पास ग्राहकों के लिए एक गाइड बुक उपलब्ध होती है। इसमें कई तरीके बताए गए होते हैः

- बैटरी खत्म हो गई है या नहीं, इस बात को सुनिश्चत करने के लिए आल्टरनेटर को हटा दें। इससे उसका वजन कम हो जाएगा।
- घर्षण को कम करने के लिए खास ल्यूब्रिकेंट का इस्तेमाल करें।
- एसी या रेडियो जैसे बिजली से चलने वाले सभी गैजेट्स को बंद कर दें।

इस तरह की तरकीबों का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है।

परिवहन और पर्यावरण विभाग समूह जोर देते हुए कहता है, “ऐसा करने की उन्हें कोई जरूरत नहीं। मौजूदा प्रक्रिया इतनी ढीली है कि परीक्षण में सफल होना कोई मुश्किल बात नहीं।”

दरअसल, यूरोपीय ड्राइविंग सायकिल की नई प्रणाली के तहत कार निर्माताओं को ये छूट है कि वह नपे-तुले स्तर से 4% नीचे के स्तर पर भी अपने रिजल्ट की घोषणा कर सकते हैं।


चलन से बाहर हो चुके टेस्ट
सच्चाई तो ये है कि, कुछ मॉडल सरकारी आंकड़ों के दावों की तुलना में 50 प्रतिशत ज्यादा मात्रा में कार्बन डाइआक्साइड छोड़ते हैं, जबकि अन्य 15 प्रतिशत ज्यादा। 'मोटरिंग जर्नलिस्ट' पत्रिका के अनुसार, वे ईंधन का भी ज्यादा इस्तेमाल करते हैं।

ग्रेग आर्चर मानते हैं कि इतनी लचीली प्रक्रिया वाले इन परीक्षणों के ताजा आंकड़े “बेहद पुराने” हैं।

अब वर्ल्ड लाइट ड्यूटी टेस्ट सायकल (डब्ल्यूएलटीसी) नाम का एक नया टेस्ट विकसित किया जा रहा है। इसे 2016 में शुरु किया जाना है।

जैसे ही ये टेस्ट शुरु कर दिया जाएगा, ये साफ हो जाएगा कि कार निर्माताओं को निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने की कोई जरूरत नहीं है।

आंकड़ों का इस्तेमाल
प्रबंधकर्ता- जिनके मानदंड हमेशा सख्त होते हैं।
सरकार- गाड़ी और सड़क कर (रोड टैक्स) के इरादे से।
उपभोक्ता- जो ये जानने के लिए बेचैन रहते हैं कि उनकी गाड़ी कितनी प्यासी और कितनी दूषित है।

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