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दिमाग में लगाया इलेक्ट्रोड, कंप्यूटर की मदद से हिला हाथ, छह साल बाद खुद चम्मच से खाया खाना

Tue, 10 Mar 2020 06:44 AM IST
संजीव कुमार झा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: संजीव कुमार झा Updated Tue, 10 Mar 2020 06:44 AM IST
सार

  • वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने खोपड़ी खोली और दिमाग की सतह पर इलेक्ट्रोड लगा दिया 
  • 16 साल की उम्र में सड़क हादसे में गले के नीचे से टूट गई युवक के रीढ़ की हड्डी
  • 21 साल की उम्र में खुद को मियामी यूनिवर्सिटी को शोध के लिए सौंपा

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Electrode placed in the brain, shake hands with the help of computer, after six years eat food
सांकेतिक तस्वीर

विस्तार

दुनियाभर में तकनीक की बदौलत हर समस्या को हल करने की कोशिश हो रही है। सड़क हादसे में पूरी तरह अपंग हो चुके एक युवक को तकनीक की मदद से नई जिंदगी मिलने की उम्मीद बढ़ी है। जर्मनी के रहने वाले अलदाना (16) सड़क हादसे में बुरी तरह चोटिल हो गए थे। गले के नीचे से उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई। पांच साल तक वे सिर्फ अपनी गर्दन और हाथ को ही थोड़ा बहुत हिला पाते थे। 21 साल के हुए तो अलदाना ने खुद को यूनिवर्सिटी ऑफ मियामी के रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए सौंप दिया।

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शोधकर्ताओं ने मियामी प्रोजेक्ट के तहत युवक की तकलीफ का विश्लेषण किया। इसके बाद वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने खोपड़ी खोली और दिमाग की सतह पर इलेक्ट्रोड लगा दिया। इसके बाद लैब में कंप्यूटर को ऐसे प्रशिक्षित किया कि वे इलेक्ट्रोड से मिलने वाले सिग्नल्स को पहचान सके। अब अलदाना जब अपने हाथों को खोलने के लिए सोचते हैं तो उनके दिमाग में लगा इलेक्ट्रोड कंप्यूटर प्रोग्राम की मदद से प्रोस्थेटिक और मांसपेशियों को भेजता है।
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इस प्रक्रिया की मदद से अलदाना अपने हाथों को हिलाने के साथ खोल और बंद कर सकते हैं। ऑपरेशन के एक साल बाद अलदाना अब हाथों से हल्की चीजें उठा लेते हैं। छह साल बाद खुद चम्मच से खाना भी खाया। पेन या स्केच भी पकड़ लेते हैं और कुछ शब्द भी लिख देते हैं।
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ट्रेडमिल पर अपने पैरों को चलाने की कोशिश करते हैं और दाहिने हाथ की अंगुली से ट्रेडमिल को नियंत्रित करते हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस तकनीक के पूरी तरह सफल होने के बाद दुनियाभर में अपंगता के शिकार लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है।

हरकत के लिए 400 मिली सेकंड का वक्त

मियामी यूनिवर्सिटी के बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग में असिस्टेंट प्रो. अभिषेक प्रसाद ने बताया कि इलेक्ट्रोड और कंप्यूटर से सिगनल्स को दिमाग से रीढ़ की हड्डी और मांशपेशियों तक पहुंचने में 400 मिलीसेकंड का समय लगता है।

सामान्य व्यक्ति में इस प्रक्त्रिस्या को पूरा होने में भी 60 से 120 मिली सेकंड का समय लगता है। प्रो. अभिषेक बताते हैं कि अभी इस प्रक्त्रिस्या को लैपटॉप से अंजाम दिया गया है। जल्द ही इसे मोबाइल से पूरा करने की तैयारी चल रही है।

अभी सिर्फ लैब में प्रक्रिया की है इजाजत

मियामी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने जो कमाल किया है वो सिर्फ लैब में ही संभव है। वे अपने इस शोध को आगे बढ़ाने के लिए सरकार से इजाजत लेना चाहते हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि साल के अंत तक अलदाना इस तकनीक को अपने घर ले जा सकेंगे। इसकी मदद से वे खुद से खाना खाने के साथ दरवाजा खोलने और अन्य सामान्य काम कर सकेंगे।

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