सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त: मैर्केल के बाद जर्मनी की नीतियां कैसी होंगी, इस सवाल से चिंतित हैं उसके मित्र देश
जर्मन पर्यवेक्षकों ने कहा है कि चांसलर पद के सीडीयू के उम्मीदवार अरमिन लैशेट और एसपीडी के उम्मीदवार ओलफ शोल्ज दोनों खुद को मैर्केल के उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन चांसलर बनने पर वे मैर्केल जैसे नजरिए के साथ सत्ता संभाल पाएंगे, इसको लेकर शक जताया गया है...
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जर्मनी में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) के लिए जन समर्थन लगातार बढ़ता जा रहा है। सबसे ताजा जनमत सर्वेक्षण जारी होने के बाद राजनीतिक विश्लेषकों ने संभावना जताई है कि 26 सितंबर को होने वाले मतदान के बाद एसपीडी के नेता ओलफ शोल्ज ग्रीन पार्टी और सोशलिस्ट लेफ्ट पार्टी के सहयोग से सरकार बनाने की स्थिति में होंगे। अगर ऐसा हुआ, तो 16 साल से लगातार जर्मनी की कमान संभाल रही चांसलर अंगेला मैर्केल की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) सत्ता से बाहर हो जाएगी।
यूरोप के दूसरे देशों और अमेरिका के मीडिया में जर्मनी में संभावित इस सत्ता परिवर्तन के नतीजों को समझने की कोशिश अभी से शुरू हो गई है। अमेरिका मीडिया की कुछ टिप्पणियों में कहा गया है कि अंगेला मैर्केल पिछले 16 साल से यूरोपीय नेतृत्व का चेहरा रही हैं। इस दौरान अमेरिका में चार राष्ट्रपति आए-गए। लेकिन मैर्केल के नेतृत्व की खूबियों की वजह से जर्मनी और यूरोप के संबंधों में एक तरह की स्थिरता बनी रही। जर्मनी यूरोपियन यूनियन (ईयू) के भीतर सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसलिए उसकी आवाज को हमेशा ही अधिक महत्व मिलता है।
जर्मन पर्यवेक्षकों ने कहा है कि चांसलर पद के सीडीयू के उम्मीदवार अरमिन लैशेट और एसपीडी के उम्मीदवार ओलफ शोल्ज दोनों खुद को मैर्केल के उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन चांसलर बनने पर वे मैर्केल जैसे नजरिए के साथ सत्ता संभाल पाएंगे, इसको लेकर शक जताया गया है। यूरोप की खास दिलचस्पी यह जानने में है कि अगली जर्मन सरकार चीन और अमेरिका के प्रति क्या नीति अपनाती है। विश्लेषकों का कहना है कि इन दोनों मामलों में अगले जर्मन चांसलर को नई नीति अपनानी पड़ सकती है।
अमेरिकी थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन में जर्मन मामलों के विशेषज्ञ कोस्तांजे स्टेलजेनमूलर ने अमेरिकी न्यूज वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा है- ‘मैर्केल संकट के समय सावधानी से और धीरे-धीरे चलने में यकीन करती हैं। लेकिन अब जो चुनौतियां सामने हैं, उनके बीच अगले चांसलर के लिए ऐसा करना मुश्किल होगा। जलवायु परिवर्तन और चीन जैसे मसलों पर मैर्केल ने यथास्थिति कायम रखने की नीति अपनाई।’
थिंक टैंक जर्मन मार्शल फंड की विश्लेषक सुधा डेविड विल्प ने एक टिप्पणी में लिखा है कि रूस और चीन के साथ संबंधों को लेकर अब जर्मनी में आम सहमति में बदलाव आ रहा है। ऐसे में अगले चांसलर के लिए मैर्केल की तरह लोकतांत्रिक मूल्यों की वकालत करने और अमेरिका से करीबी संबंध रखने के साथ-साथ जर्मनी के निर्यात के हित में चीन से अच्छे संबंध बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। इस सिलसिले में ध्यान दिलाया गया है कि मैर्केल ने चीनी 5जी कंपनी हुवावे के खिलाफ कार्रवाई को देर तक लटकाए रखा। साथ ही वे यूरोप के चीन के साथ निवेश समझौते की वकालत करती रहीं।
जर्मन मीडिया में कहा गया है कि ओल्फ शोल्ज और अरमिन लैशेट दोनों मैर्केल की नीतियां जारी रखने की बात कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि शोल्ज की कार्यशैली मैर्केल के अधिक अनुरूप है, भले वे दूसरी पार्टी के उम्मीदवार हों। मैर्केल को जर्मनी में बहुत से लोग मुट्टी यानी मां कह कर संबोधित करते हैं। वे आज भी देश की सबसे लोकप्रिय नेता हैं। स्टेलजेनमूलर ने कहा है कि ऐसी अनुभवी नेता के कुर्सी पर ना रहने की कमी तुरंत महसूस की जाएगी। बहुत से लोगों में उससे असुरक्षा का भाव भी आ सकता है।
एक यूरोपीय राजनयिक ने मीडिया से बातचीत में कहा गया है कि नया चांसलर कोई भी बने, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी तुरंत मैर्केल जैसी हैसियत नहीं बन पाएगी। लेकिन असल सवाल यह है कि क्या वह मैर्केल की तरह नीतियों में स्थिरता बनाए रखेगा, या इस मामले में उथल-पुथल का दौर अब शुरू हो जाएगा।