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जलवायु परिवर्तन का असर: जहां इतिहास में पहले कभी नहीं हुई बारिश, उस बर्फीले देश में तीन दिन में गिर गया 7 अरब टन पानी
Fri, 20 Aug 2021 05:28 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्रा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, नूक
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, नूक
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्रा
Updated Fri, 20 Aug 2021 05:28 PM IST
सार
ग्रीनलैंड के नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर के वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले एक दशक में यह तीसरी बार है जब आर्कटिक रिसर्च स्टेशन में द्वीप के किसी क्षेत्र का तापमान फ्रीजिंग पॉइंट के ऊपर रिकॉर्ड किया गया।
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ग्रीनलैंड की सबसे ऊंची चोटी पर पहली बार दर्ज की गई बारिश।
- फोटो : NSF/Social Media
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विस्तार
दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन का व्यापक असर अब धीरे-धीरे सामने आने लगा है। इसका ताजा प्रभाव दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड में देखने को मिला। आर्कटिक और अटलांटिक महासागरों के बीच दुनिया के सबसे ठंडे और बर्फीले इलाकों में से एक ग्रीनलैंड में पिछले हफ्ते कई घंटों तक जमकर बारिश हुई। चौंकाने वाली बात यह है कि इस देश के अब तक के इतिहास में कभी बारिश का कोई रिकॉर्ड नहीं रहा हालांकि, इस बार बारिश ग्रीनलैंड की सबसे ऊंची बर्फीली सतह पर हुई।
क्या थी ग्रीनलैंड में बारिश की वजह?
वैज्ञानिकों ने बुधवार को ग्रीनलैंड के ऊंचे हिस्से में बारिश की पुष्टि की। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीनलैंड में आमतौर पर पूरे साल बर्फ गिरती है। ऐसे में पूरे द्वीप का पारा फ्रीजिंग पॉइंट (हिमांक बिंदु), जो कि पानी के जमने का पारा (0 डिग्री सेल्सियस) है, उससे नीचे ही रहता है। लेकिन जलवायु परिवर्तन का असर अब ग्रीनलैंड तक पहुंच गया है और इसकी वजह से ही यहां पारा फ्रीजिंग पॉइंट से ऊपर पहुंच गया, जिससे पानी बरसने की घटना पहली बार दर्ज की गई।
ग्रीनलैंड के नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर के वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले एक दशक में यह तीसरी बार है जब आर्कटिक रिसर्च स्टेशन में द्वीप के किसी क्षेत्र का तापमान फ्रीजिंग पॉइंट के ऊपर रिकॉर्ड किया गया। बताया गया है कि इस बारिश की वजह से द्वीप के दक्षिणपूर्वी तट पर स्थित बर्फ की चादर तेजी से पिघली है। यह घटना जुलाई में बर्फ के तेजी से पिघलने की घटना के ठीक बाद हुआ है। वैज्ञानिकों ने अब आर्कटिक में लगातार बर्फ के पिघलने की घटना पर चिंता जताई है, क्योंकि इससे दुनियाभर में समुद्र का स्तर तेजी से ऊपर जा रहा है।
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समुद्र से 10,551 फीट ऊपर बर्फीली सतह पर गिरा 7 अरब टन पानी
डेटा सेंटर के मुताबिक, ग्रीनलैंड की सबसे ऊंची सतह समुद्र की सतह से करीब 10 हजार 51 फीट ऊपर है। यहां पिछले हफ्ते तापमान फ्रीजिंग पॉइंट से ऊपर दर्ज किया गया। अनुमान में कहा गया है कि इस क्षेत्र में बर्फीली सतह पर महज तीन दिन के अंदर ही 7 अरब टन बारिश का पानी गिरा। बता दें कि ग्रीनलैंड का 6 लाख 56 हजार वर्ग-मील का बर्फीला इलाका हर साल घटता-बढ़ता रहा है। हालांकि, ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते बर्फ के पिघलने की घटनाएं काफी तेज हो गई हैं। कुछ जलवायु मॉडल्स में तो यहां तक कहा गया है कि अगर मौजूदा हालात बरकरार रहे, तो आर्कटिक महासागर से 2050 तक बर्फ का नामोनिशान मिट सकता है।
इसका असर कितना डरावना होगा, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगर ग्रीनलैंड की बर्फ पूरी तरह पिघल गई, तो समुद्र का स्तर 20 फीट तक ऊपर पहुंच सकता है, जिससे समुद्र की सतह से थोड़ा ऊपर मौजूद जमीनें डूब सकती हैं। यानी चीन के शंघाई, एम्सटर्डैम और न्यूयॉर्क जैसे बड़े शहरों के तटीय इलाके पूर तरह डूब जाएंगे।
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क्या थी ग्रीनलैंड में बारिश की वजह?
वैज्ञानिकों ने बुधवार को ग्रीनलैंड के ऊंचे हिस्से में बारिश की पुष्टि की। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीनलैंड में आमतौर पर पूरे साल बर्फ गिरती है। ऐसे में पूरे द्वीप का पारा फ्रीजिंग पॉइंट (हिमांक बिंदु), जो कि पानी के जमने का पारा (0 डिग्री सेल्सियस) है, उससे नीचे ही रहता है। लेकिन जलवायु परिवर्तन का असर अब ग्रीनलैंड तक पहुंच गया है और इसकी वजह से ही यहां पारा फ्रीजिंग पॉइंट से ऊपर पहुंच गया, जिससे पानी बरसने की घटना पहली बार दर्ज की गई।
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ग्रीनलैंड के नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर के वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले एक दशक में यह तीसरी बार है जब आर्कटिक रिसर्च स्टेशन में द्वीप के किसी क्षेत्र का तापमान फ्रीजिंग पॉइंट के ऊपर रिकॉर्ड किया गया। बताया गया है कि इस बारिश की वजह से द्वीप के दक्षिणपूर्वी तट पर स्थित बर्फ की चादर तेजी से पिघली है। यह घटना जुलाई में बर्फ के तेजी से पिघलने की घटना के ठीक बाद हुआ है। वैज्ञानिकों ने अब आर्कटिक में लगातार बर्फ के पिघलने की घटना पर चिंता जताई है, क्योंकि इससे दुनियाभर में समुद्र का स्तर तेजी से ऊपर जा रहा है।
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समुद्र से 10,551 फीट ऊपर बर्फीली सतह पर गिरा 7 अरब टन पानी
डेटा सेंटर के मुताबिक, ग्रीनलैंड की सबसे ऊंची सतह समुद्र की सतह से करीब 10 हजार 51 फीट ऊपर है। यहां पिछले हफ्ते तापमान फ्रीजिंग पॉइंट से ऊपर दर्ज किया गया। अनुमान में कहा गया है कि इस क्षेत्र में बर्फीली सतह पर महज तीन दिन के अंदर ही 7 अरब टन बारिश का पानी गिरा। बता दें कि ग्रीनलैंड का 6 लाख 56 हजार वर्ग-मील का बर्फीला इलाका हर साल घटता-बढ़ता रहा है। हालांकि, ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते बर्फ के पिघलने की घटनाएं काफी तेज हो गई हैं। कुछ जलवायु मॉडल्स में तो यहां तक कहा गया है कि अगर मौजूदा हालात बरकरार रहे, तो आर्कटिक महासागर से 2050 तक बर्फ का नामोनिशान मिट सकता है।
इसका असर कितना डरावना होगा, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगर ग्रीनलैंड की बर्फ पूरी तरह पिघल गई, तो समुद्र का स्तर 20 फीट तक ऊपर पहुंच सकता है, जिससे समुद्र की सतह से थोड़ा ऊपर मौजूद जमीनें डूब सकती हैं। यानी चीन के शंघाई, एम्सटर्डैम और न्यूयॉर्क जैसे बड़े शहरों के तटीय इलाके पूर तरह डूब जाएंगे।