सारी दुनिया है परेशान: ये महंगाई कहां से आई? क्या करेंसी की ज्यादा सप्लाई है जिम्मेदार
अमेरिका में एक और चुनौती कर्मचारियों की कमी से पेश आई है। इससे कर्मचारियों का वेतन बढ़ गया है। कई जगहों पर कर्मचारियों ने हड़ताल का सहारा लेकर अपनी तनख्वाह बढ़वाई है। इसकी वजह से जहां अर्थव्यवस्था में पैसे की सप्लाई बढ़ी है, वहीं चीजों की सप्लाई बाधित है...
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महंगाई से सारी दुनिया परेशान है। अर्थशास्त्री ये समझने में लगे हैं कि आखिर पूरी दुनिया के सामने ये चुनौती कैसे खड़ी हो गई। इस हफ्ते अमेरिका में महंगाई दर 1982 के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। भारत में थोक भाव मूल्य सूचकांक 12 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है। चीन से लेकर यूरोप तक इस समस्या का सामना कर रहे हैं। इससे उपभोक्ता, उद्योगपति, बैंकर और राजनेता सभी परेशान हैं।
वस्तुएं कम और पैसा ज्यादा
अमेरिकी टीवी चैनल सीएनबीसी के एक सर्वे के मुताबिक देश में उपभोक्ता चीजों के दाम बढ़ने के कारण 47 फीसदी परिवारों के लिए स्थिति गंभीर हो गई है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि एक साथ कई ऐसे पहलू सामने आ गए हैं, जिनकी वजह से महंगाई बढ़ रही है। आमतौर पर मुद्रास्फीति दर तब बढ़ती है, जब बाजार में वस्तुएं कम और पैसा ज्यादा उपलब्ध हो जाता है। कोविड-19 महामारी के समय आर्थिक प्रोत्साहन के लिए लगभग तमाम बड़े देशों ने असामान्य रूप से मुद्रा मुहैया कराई। सिर्फ अमेरिका बाजार में उपलब्ध मुद्रा में 38 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। उसका असर अब देखने को मिल रहा है।
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक महंगाई का दूसरा कारण महामारी के दौरान वैश्विक सप्लाई चेन में आई रुकावटें हैं। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार संबंधों में पैदा हुईं पेचीदगियों की भी इसमें भूमिका है। इन वजहों से दुनिया भर में जरूरी चीजों की सप्लाई मांग के मुताबिक नहीं हो पा रही है।
अमेरिका में एक और चुनौती कर्मचारियों की कमी से पेश आई है। इससे कर्मचारियों का वेतन बढ़ गया है। कई जगहों पर कर्मचारियों ने हड़ताल का सहारा लेकर अपनी तनख्वाह बढ़वाई है। इसकी वजह से जहां अर्थव्यवस्था में पैसे की सप्लाई बढ़ी है, वहीं चीजों की सप्लाई बाधित है।
नोटों की सप्लाई को नियंत्रित करें बैंक
अर्थशास्त्रियों का सुझाव है कि महंगाई पर काबू पाने के लिए सेंट्रल बैंकों को तुरंत नोटों की सप्लाई को नियंत्रित करना चाहिए। इसके लिए ब्याज दरों को बढ़ाना एक रास्ता है। अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपने एक संपादकीय में कहा है- ‘महंगाई बढ़ने की ताजा रिपोर्ट इस दलील को मजबूत करती है कि फेडरल रिजर्व (अमेरिका का सेंट्रल बैंक) को अगले हफ्ते प्रोत्साहन कदमों को समेटने की शुरुआत करनी चाहिए। संभवतः उसे ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी करनी होगी।’
विश्लेषकों के मुताबिक अगर सेंट्रल बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ाईं, तो उसका खराब असर आर्थिक वृद्धि दर पर पड़ेगा। जिस समय महामारी के बाद अर्थव्यवस्थाएं अपनी पुरानी गति पाने की कोशिश कर रही हैं, वैसे समय ऐसे कदम से मुश्किलें खड़ी होंगी। इसलिए सेंट्रल बैंकों के सामने कठिन चुनौती है। इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने चीन का उदाहरण देते हुए इसी महीने चेतावनी जारी की। आईएमएफ की प्रबंध निदेशक क्रिस्टेलीना जोर्गिएवा कहा कि चीन की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार हुआ था, लेकिन अब उसकी वृद्धि दर गिर रही है।
इस बीच रेटिंग एजेंसी फिच ने कहा है कि इस साल मार्च के बाद दुनिया भर में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत बढ़ने की वजह इन चीजों की मांग में हुई भारी बढ़ोतरी है। महंगाई में वृद्धि जितने लंबे समय से जारी है, उससे ज्यादातर विशेषज्ञ और सेंट्रल बैंक हैरत में हैं। फिच ने सुझाव दिया है कि सरकारों को मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की तरफ बढ़ना चाहिए। मुद्रा की उपलब्धता घटाने की जरूरत है, जिसके लिए ब्याज दरों को भी बढ़ाना पड़ सकता है।