समुद्र में तैरते चेर्नोबिल: ऑस्ट्रेलिया को मिलने वाली ताकत से क्यों खुश नहीं हैं देश के कुछ लोग?
ऑस्ट्रेलिया सरकार के लिए मुश्किल विदेश संबंधों में भी आई है। ताजा समझौते से फ्रांस तो इस हद तक नाराज हुआ है कि उसने अमेरिका के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया से भी अपने राजदूत को वापस बुला लिया है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राजदूत वापस बुलाने का फैसले को बेहद सख्त कदम माना जाता है...
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अमेरिका और ब्रिटेन के साथ हुए नए रक्षा समझौते के कारण ऑस्ट्रेलिया दुनिया के उन देशों में शामिल हो जाएगा, जिनके पास परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बियां हैं। अब तक सिर्फ अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, रूस, भारत और फ्रांस के पास ही ऐसी पनडुब्बियां हैं। इस समझौते के तहत अमेरिका और ब्रिटेन अपनी टेक्नोलॉजी और विशेषज्ञता ऑस्ट्रेलिया को देंगे। इनकी मदद से ऑस्ट्रेलिया परमाणु क्षमता वाली पनडुब्बियां खुद बनाएगा।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक नए समझौते से ऑस्ट्रेलिया को ऐसी क्षमता हासिल करने का मौका मिला है, जिसे वह अपने बूते नहीं प्राप्त कर सकता था। इसके बावजूद ऑस्ट्रेलियाई जनमत के कई खेमों से नए त्रिगुट समझौते का तीखा विरोध हो रहा है। उनमें एक खेमे परमाणु ऊर्जा विरोधी समूहों का है। ऑस्ट्रेलिया में परमाणु विरोधी आंदोलन की लंबी परंपरा रही है। 1970 के दशक में यहां ऐसा जोरदार हुआ था।
इस आंदोलन से जुड़े लोगों ने यूरेनियम संवर्धन से पर्यावरण पर पड़ने वाले खराब नतीजों की तरफ ध्यान खींचा है। ऑस्ट्रेलिया के पास यूरेनियम का समृद्ध भंडार है। लेकिन आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों की सेहत पर संभावित खराब असर के कारण ऑस्ट्रेलिया में यूरेनियम की खुदाई रुकी हुई है।
अमेरिका और ब्रिटेन के साथ नए समझौते की घोषणा के वक्त ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीसन ने सफाई दी थी कि ऑस्ट्रेलिया सिविल न्यूक्लियर क्षमता हासिल नहीं करने जा रहा है। उसने देश में परमाणु संयंत्र लगाने का फैसला नहीं किया है। लेकिन ऑस्ट्रेलिया की ग्रीन पार्टी के नेता एडम ब्रैंड्ट ने कहा है कि मॉरीसन सरकार ने समुद्र में तैरते चेर्नोबिल बनाने का फैसला किया है। चेर्नोबिल यूक्रेन में है, जहां परमाणु संयंत्र था और सोवियत दौर में उसमें बड़ा हादसा हो गया था। 1986 में हुई चेर्नोबिल दुर्घटना के बाद दूसरा बड़ा परमाणु हादसा जापान के फुकुशिमा में 2011 में हुआ।
अब ऑस्ट्रेलिया में चल रही चर्चाओं में उन दोनों दुर्घटनाओं का बार-बार हवाला दिया जा रहा है। ग्रीन पार्टी के नेता बॉब ब्राउन ने कहा है कि ताजा फैसले के बाद ऑस्ट्रेलिया परमाणु संयंत्र लगाने के करीब पहुंच गया है। उन्होंने कहा- ‘सरकार ने बहुत कायरतापूर्ण काम किया है। उसने बिना जनता को बताए फैसला कर लिया। उसे मालूम था कि लोग इस निर्णय का विरोध करेंगे।’
ऑस्ट्रेलिया सरकार के लिए मुश्किल विदेश संबंधों में भी आई है। ताजा समझौते से फ्रांस तो इस हद तक नाराज हुआ है कि उसने अमेरिका के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया से भी अपने राजदूत को वापस बुला लिया है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राजदूत वापस बुलाने का फैसले को बेहद सख्त कदम माना जाता है। उधर न्यूजीलैंड के विरोध से भी ऑस्ट्रेलिया के लिए मुश्किल हुई है।
न्यूजीलैंड उन चंद विकसित देशों में है, जिसके पास कोई परमाणु संयंत्र नहीं है। उसने शून्य परमाणु क्षेत्र की नीति अपना रखी है। इस नीति के तहत वह उन जहाजों को अपने जल क्षेत्र में आने की इजाजत नहीं देता, जिन पर परमाणु हथियार या रेडियो एक्टिव पदार्थों लदे हुए हों। न्यूजीलैंड ने कहा है कि वह ऑस्ट्रेलियाई परमाणु पनडुब्बियों को अपने जल क्षेत्र में नहीं आने देगा। न्यूजीलैंड अमेरिकी नेतृत्व वाले फाइव आई गठबंधन का हिस्सा है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद बने इस गठबंधन में ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं। लेकिन ताजा त्रिपक्षीय समझौत का न्यूजीलैंड ने जोरदार विरोध किया है। इससे ऑस्ट्रेलिया में परमाणु विरोधी संगठनों को बल मिला है।