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'साख बचानी है तो छोड़े दोहरा रवैया': भारत की यूएनएचआरसी को खरी खरी: कहा- मानवाधिकार के नाम पर राजनीति बंद करे
Sat, 31 Oct 2026 09:14 AM IST
प्रशांत तिवारी
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Sat, 31 Oct 2026 09:14 AM IST
सार
भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से बिना भेदभाव और राजनीतिक दबाव के काम करने की बात कही है। भारत का कहना है कि किसी देश को विश्वास में लिए बिना उसके खिलाफ विशेष आदेश जारी करने से मानवाधिकारों की स्थिति नहीं सुधरती, बल्कि देशों के बीच दूरियां बढ़ती हैं।
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संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान भारत का पक्ष रखा। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसकी साख तभी बनी रह सकती है, जब वह सभी देशों के साथ एक जैसा व्यवहार करे। किसी देश को शामिल किए बिना उसके खिलाफ विशेष आदेश जारी करने से जमीनी स्तर पर कोई खास बदलाव नहीं आता। इससे परिषद के भीतर मतभेद जरूर बढ़ते हैं। मानवाधिकारों की रक्षा के नाम पर किसी देश को निशाना बनाना या दोहरे मापदंड अपनाना सही तरीका नहीं है।
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बातचीत और सहयोग से आगे बढ़ेंगे मानवाधिकार
भाविका मंगलानंदन ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के फरवरी में दिए गए बयान का भी जिक्र किया। जयशंकर ने मानवाधिकार परिषद के 61वें उच्चस्तरीय सत्र में कहा था कि मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका आपसी बातचीत, क्षमता बढ़ाने में मदद और सच्ची साझेदारी है। इसके बजाय राजनीतिक फायदे के लिए मानवाधिकारों का इस्तेमाल करना और चुनिंदा देशों पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। भारत का मानना है कि अगर परिषद को एकजुट होकर काम करना है, तो उसे उन आरोपों से बचना होगा, जिनमें कहा जाता है कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है।
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सभी देशों के लिए एक जैसा नियम हो
भारत ने यूनिवर्सल पीरियोडिक रिव्यू (UPR) को मानवाधिकारों पर चर्चा का बेहतर मंच बताया। इस व्यवस्था में संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड की समीक्षा होती है। इसकी खासियत यह है कि इसमें हर देश को बराबर माना जाता है और बातचीत के जरिए सुधार पर जोर दिया जाता है। भारत इस साल 2026-28 के कार्यकाल के लिए सातवीं बार मानवाधिकार परिषद का सदस्य बना है।
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आतंकवाद को बताया मानवाधिकारों के लिए बड़ा खतरा
भारत ने आतंकवाद को मानवाधिकारों के लिए सबसे गंभीर खतरों में से एक बताया। खासतौर पर जीवन के अधिकार पर इसके खतरे को रेखांकित करते हुए परिषद से अपील की गई कि वह आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाए और इस मुद्दे पर लगातार ध्यान दे।
विकास के अधिकार को भी मिले बराबर महत्व
भारत ने कहा कि मानवाधिकारों को अलग-अलग नजरिए से देखने के बजाय सभी अधिकारों को समान महत्व दिया जाना चाहिए। नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की तरह आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ विकास के अधिकार को भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए। भारत ने बताया कि विकासशील देशों में गरीबी, बढ़ता कर्ज और आर्थिक संसाधनों व नई तकनीक तक सीमित पहुंच लोगों के अधिकारों के रास्ते में बड़ी रुकावट हैं। इन समस्याओं का समाधान दबाव बनाकर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही निकाला जा सकता है।
परिषद के कामकाज में पारदर्शिता की मांग
भारत ने यह भी कहा कि मानवाधिकार परिषद को अपने उपलब्ध संसाधनों के हिसाब से ही काम करना चाहिए। परिषद में सुधार की प्रक्रिया सदस्य देशों की अगुवाई में और पूरी पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए। इस दौरान विकास और आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े काम प्रभावित नहीं होने चाहिए। भारत ने मानवाधिकारों से जुड़े कामों के लिए संयुक्त राष्ट्र के नियमित बजट से पर्याप्त धन देने की मांग भी की। उसका कहना है कि परिषद की प्राथमिकताएं कुछ खास देशों या संगठनों की ओर से मिलने वाले स्वैच्छिक फंड पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।
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एक जैसे मुद्दों पर बार-बार प्रस्ताव लाने पर जताई चिंता
भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा और मानवाधिकार परिषद में एक ही तरह के मुद्दों पर बार-बार प्रस्ताव लाने से बचने की जरूरत बताई। उसने यह भी कहा कि परिषद की ओर से अपनी रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र महासभा की थर्ड कमेटी को भेजने का चलन बढ़ रहा है। इसमें विशेष प्रतिवेदकों की रिपोर्ट भी शामिल हैं। भारत के मुताबिक, ऐसा होने से मानवाधिकार परिषद के अलग और विशेष मंच होने का महत्व कम हो सकता है। गौरतलब है कि महासभा की थर्ड कमेटी सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक मुद्दों पर काम करती है।