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जाते-जाते जितना मुमकिन है, उतनी चिंगारियां सुलगा रहे हैं ट्रंप, बाइडन के लिए मुश्किल होगी राह

Thu, 14 Jan 2021 02:45 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 14 Jan 2021 02:45 PM IST
सार

1949 में चीन में गृह युद्ध के बाद वहां तत्कालीन शासक भागकर ताइवान चले गए और उसे अलग देश बना लिया। इसीलिए चीन आज भी ताइवान को अपना हिस्सा मानता है...

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Donald Trump creating obstacles for US President Elect Joe Biden before the power transfer
President Donald Trump - फोटो : PTI (फाइल फोटो)

विस्तार

यहां के राजनीतिक विश्लेषकों में इस बात पर आम राय है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले राष्ट्रपति जो बाइडन का काम मुश्किल बनाने के लिए जाते-जाते जितना संभव है, जगह-जगह चिंगारी सुलगाते जा रहे हैं। खास कर विदेश नीति और कूटनीति के क्षेत्र में ट्रंप प्रशासन ने जानबूझ कर हालात को उलझाने वाले कदम उठाए हैं। इनमें सबसे ताजा कदम क्यूबा को फिर से आतंकवाद फैलाने वाले देशों की सूची में डालना है। इस तरह उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय क्यूबा से रिश्ते सुधारने की दिशा में जो प्रगति हुई थी, उसे पलट दिया है।

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विश्लेषकों की राय है कि जो बाइडन प्रशासन का फौरी ध्यान घरेलू हालात पर होगा। देश में कोरोना महामारी से रोजाना हजारों मौतें हो रही हैं। अर्थव्यवस्था बदहाल है। साथ ही देश गहरे सामाजिक विभाजन का शिकार है। इसके बीच विदेशी मामलों को और उलझाने की ट्रंप की कोशिश को सीधे तौर पर उनकी खेल बिगाड़ने की सियासी सोच का नतीजा माना जा रहा है।
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ट्रंप प्रशासन ने हाल के महीनों में चीन से टकराव लगातार बढ़ाया। इस दौरान चीन के अधिकारियों और कारोबारियों पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। चीन से टकराव को बढ़ाने के मकसद ही ट्रंप प्रशासन ने एक उच्च स्तरीय अधिकारी को ताइवान भेजने का फैसला किया। अब क्यूबा के साथ भी तनाव पैदा किया गया है। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन ने यमन के हाउथी बागियों को विदेशी आतंकवादी संगठन की सूची में डालने की घोषणा भी की है।
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इसका अर्थ यह है कि बाइडन प्रशासन को विदेश नीति संबंधी मामलों में शुरुआत नए विवादों को सुलझाने की कोशिश के साथ करना होगी। सिंगापुर के एस. राजारत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में सीनियर फेलो राफेलो पांतुची ने टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ट्रंप प्रशासन ने टकरावों की एक शृंखला को भड़का दिया है, जिसमें कदम रखते हुए बाइडन प्रशासन को शुरुआत करनी होगी। कूटनीतिक स्तर पर इनमें शायद सबसे कठिन स्थिति ताइवान के साथ रिश्ते का रूप बदलने के ट्रंप प्रशासन के फैसले से पैदा हुई है।

ताइवान के मामले में अमेरिकी नीति दशकों तक सतर्कता भरी रही। 1949 में चीन में गृह युद्ध के बाद वहां तत्कालीन शासक भागकर ताइवान चले गए और उसे अलग देश बना लिया। इसीलिए चीन आज भी ताइवान को अपना हिस्सा मानता है। अमेरिका की ताइवान से निपट रिश्ता रखते हुए भी वन चाइना पॉलिसी को मानने की रही। यानी अमेरिका सिद्धांत रूप में ताइवान को चीन का हिस्सा मानता रहा। 1979 में कम्युनिस्ट चीन से औपचारिक रूप से राजनयिक संबंध कायम होने के बाद अमेरिका वन चाइना पॉलिसी की घोषणा भी करता रहा है। ताइवान की आबादी दो करोड़ 40 लाख है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कह चुके हैं कि अगर जरूरत पड़ी तो चीन ताकत का इस्तेमाल करके भी ताइवान को चीन में शामिल करेगा।

ट्रंप प्रशासन ने ताइवान के स्वतंत्र अस्तित्व को लगभग मान्यता दे दी है। पंतुची ने कहा- ‘अगर अमेरिका जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर चीन के साथ मिलकर काम करना चाहता है, तो बाइडन प्रशासन को अपनी ताइवान नीति बदलनी होगी।’ लेकिन इसका अमेरिका में विरोध होगा। इसलिए बाइडन प्रशासन के लिए इस मुद्दे पर एक बेहद मुश्किल हालत पैदा हो गए हैं। कूटनीति विशेषज्ञ लेसली विनजामुरी ने सीएनएन से कहा- बाइडन को यूरोपीय सहयोगी देशों के साथ मिलकर साझा चीन नीति पर अमल करना चाहिए। लेकिन ऐसा करने में समय लगेगा। यूरोपीय देशों का चीन के प्रति नजरिया अलग है। इटली और जर्मनी जैसे देश चीन को एक बड़े निर्यात बाजार के रूप में देखते हैं।

इसी तरह यमन की स्थिति बहुत टकरावपूर्ण है। अमेरिका के हाउथी बागियों को आतंकवादी संगठन घोषित करने से स्थिति और बिगड़ेगी। यमन में 2014 से गृह युद्ध चल रहा है। हाउथी बागियों को ईरान का समर्थन है, जो सऊदी अरब के समर्थन से चल रही सरकार से लड़ रहे हैं। बागियों को दबाने की कोशिश अब तक नाकाम रही है। थिंक टैंक काउंसिल फॉर अरब- ब्रिटिश अंडरस्टैंडिंग के निदेशक क्रिस डॉयल ने कहा है- हाउथी को आतंकवादी संगठन घोषित करने से यमन में लड़ाई खत्म करने में मदद नहीं मिलेगी। बल्कि इससे लड़ाई और भड़कने का अंदेशा है। इससे हो सकता है कि हाउथी और भी ज्यादा ईरान के खेमे में चले जाएं।


उधर क्यूबा को आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले देशों की सूची में डालने से जमीन पर शायद ही कोई फर्क पड़ेगा। लेकिन यह जो बाइडन के लिए एक निजी झटका है, क्योंकि जब वे उप राष्ट्रपति थे, तब अमेरिका ने क्यूबा से मेलमिलाप की नीति अपनाई थी।

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