डॉक्टर भी हैं हैरान: क्या जापान में अपना ‘आत्म-विनाश’ कर लिया कोरोना वायरस के डेल्टा वैरिएंट ने!
शोधकर्ताओं के एक समूह का कहना है कि डेल्टा वैरिएंट ने खुद ही ‘आत्म-विनाश’ कर लिया। तीन महीने पहले इस वैरिएंट के कारण जापान में रोजाना नए संक्रमण के 26 हजार से ज्यादा मामले सामने आने लगे थे। हाल के हफ्तों में ऐसे लगभग 200 मामले ही सामने आए हैं...
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जापान में तेजी से फैलने के बाद कोरोना वायरस का डेल्टा वैरिएंट जिस रफ्तार से खत्म हो गया, उसने यहां के डॉक्टरों को हैरत में डाल रखा है। डेल्टा वैरिएंट के कारण जापान में कोरोना वायरस संक्रमण की पांचवीं लहर आई थी। अब स्वास्थ्य वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि ये वैरिएंट अचानक कैसे गायब हो गया। वे यह भी समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इस बारे में जापान का अनुभव दूसरे देशों से बिल्कुल अलग कैसे रहा है।
नए संक्रमण के 26 हजार से ज्यादा मामले
शोधकर्ताओं के एक समूह का कहना है कि डेल्टा वैरिएंट ने खुद ही ‘आत्म-विनाश’ कर लिया। तीन महीने पहले इस वैरिएंट के कारण जापान में रोजाना नए संक्रमण के 26 हजार से ज्यादा मामले सामने आने लगे थे। हाल के हफ्तों में ऐसे लगभग 200 मामले ही सामने आए हैं। इस साल सात नवंबर एक ऐसी तारीख रही, जब महामारी आने के बाद जापान में पहली बार कोविड-19 संक्रमण से किसी की मौत नहीं हुई। ऐसा 15 महीनों के बाद हुआ।
दो महीने में जेनेटिक संरचना में आता है बदलाव
कुछ विशेषज्ञों ने संक्रमण की दर में गिरावट का कारण टीकाकरण की अब ऊंची हो गई संख्या को बताया है। जबकि कुछ विशेषज्ञों की राय है कि अब सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क पहनना जापान के लोगों की आदत में शुमार हो गया है, जिसकी वजह से संक्रमण की दर घट गई है। लेकिन कुछ शोधकर्ताओं ने कहा है कि कोरोना वायरस के म्युटेशन (प्रतिकृति निर्माण) की प्रक्रिया में हर दो महीने में उसकी जेनेटिक संरचना में बदलाव आता है। ये समझ जापान के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ जिनेटिक्स में प्रोफेसर इतुरो इनोउ ने सामने रखी है।
इस सिद्धांत के मुताबिक वायरस ने अपने प्रोटीन एनएसपी-14 में जरूरत से अधिक म्यूटेशन किए। यही प्रक्रिया उसके आत्म विनाश की वजह बनी। इसके अलावा कुछ अध्ययनों में यह ध्यान दिलाया गया है कि एशिया में अधिक संख्या में लोगों के शरीर में रक्षात्मक एंजाइम एपीओबीईसी3ए मौजूद है। ये एंजाइम आरएनए वायरसों से बचाव करता है। कोविड-19 का वायरस भी एक आरएनए वायरस है। अध्ययनों में देखा गया है कि यूरोप और अफ्रीका के लोगों में ये एंजाइम कम मात्रा में रहती है।
एपीओबीईसी3ए एंजाइम तो नहीं है वजह
जापान के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ जिनेटिक्स और निगाता यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने एक साझा अध्ययन में इस बात की व्याख्या की है कि एपीओबीईसी3ए एंजाइम का एनएसपी प्रोटीन पर कैसा असर होता है। इससे यह भी मालूम हुआ है कि ये एंजाइम किस तरह कोरोना वायरस की गतिविधियों को रोकता है। इन दोनों संस्थानों के अध्ययनकर्ताओं ने अपना अध्ययन कोरोना वायरस के अल्फा और डेल्टा दोनों वैरिएंट्स पर किया।
इनोउ भी उस अध्ययन से जुड़े थे। उन्होंने यहां के अखबार जापान टाइम्स से कहा- ‘हम अपने निष्कर्षों को देख कर चकित रह गए। डेल्टा वैरिएंट के संक्रमण की गति जापान में बहुत तेज थी। लेकिन जैसे ही इसके म्यूटेशन बढ़े, तो हमारा यकीन है कि यह आगे अपनी प्रतिकृति तैयार करने में अक्षम हो गया। अब चूंकि इसके संक्रमण के मामले सामने नहीं आ रहे हैं, इसलिए हमारी राय बनी है कि किसी बिंदु पर पहुंच कर इस वैरिएंट ने अपना आत्म विनाश कर लिया।’