डिजिटल तकनीकों की वजह से भारत में लोगों के बीच कम हुई असमानता : संयुक्त राष्ट्र
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
संयुक्त राष्ट्र के एक प्रमुख अध्ययन के अनुसार भारत ने लोगों के बीच असमानताओं को कम करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का सफलतापूर्वक उपयोग किया है। इसके अनुसार असमानता को कम करने के लिए आधार पहचान प्रणाली के साथ डिजिटल तकनीक के देश के अनुभव को भविष्य में अन्य देशों में दोहराए जाने की संभावना है।
वर्ल्ड सोशल रिपोर्ट 2020 संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (डीईएसए)में प्रकाशित की गई है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत ने अधिक समावेशी विकास के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकियों की क्षमता का उचित तरीके से दोहन किया है।
इस रिपोर्ट में यूएन ने कहा है कि भारत के अनुभव से पता चलता है कि वित्तीय सेवाओं तक पहुंच में असमानता को कम करने के लिए मोबाइल डिजिटल तकनीकों को अन्य तकनीकों के पूरक होने की आवश्यकता है। भारत ने डिजिटल पहचान की एक राष्ट्रीय प्रणाली और निर्बाध आपूर्ति की एक सस्ती बिजली प्रणाली के साथ वित्तीय तकनीकों के लिए अधिक समान पहुंच हासिल करने में कामयाबी हासिल की है।
बिना खाते वाले लोगों की संख्या में आई कमी
पिछले हफ्ते जारी की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2014 में भारत सरकार ने सभी बैंकों को लोगों के आधार नंबर या उनकी पहचान और पते के अन्य स्रोतों का उपयोग करके बैंक खाते खुलवाने का निर्देश दिया था। इस निर्देश के बाद बिना बैंक खातों के लोगों की संख्या वर्ष 2011 के 55.7 करोड़ लोगों से घटकर वर्ष 2015 में 23.3 करोड़ हो गई थी।
वर्ष 2017 तक 80 प्रतिशत वयस्क भारतीयों के पास लगभग एक बैंक खाता था, जो कि विकासशील देशों में औसत हिस्सेदारी (63 प्रतिशत) से काफी अधिक है। बॉयोमीट्रिक पहचान ने लिंग-आय और शिक्षा आधारित अंतर को कम करने में मदद की। वास्तव में, इस प्रणाली ने सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और मतदान कार्यक्रमों की प्रभावशीलता में वृद्धि की है।