कोरोना: ...यदि लॉकडाउन नहीं होता तो दुनिया में चार करोड़ से ज्यादा होतीं मौतें
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कोरोना वायरस के प्रकोप को कम करने के लिए अधिकांश देशों में लॉकडाउन है। भारत में भी सरकार ने 14 अप्रैल तक लॉकडाउन का एलान किया है। अधिकतर लोग लॉकडाउन को सही मानते हैं, लेकिन इसके आलोचकों की भी कमी नहीं है।
चीन के हुबेई प्रांत से शुरू हुआ कोरोना वायरस का संक्रमण दुनिया के 180 से ज्यादा देशों में पहुंच चुका है, लेकिन लॉकडाउन के विरोधियों का तर्क है इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था कमजोर होगी और लोग बेरोजगार होंगे।
लेकिन एक नए शोध में बताया गया है कि यदि दुनिया की अधिकांश आबादी लॉकडाउन में नहीं होती तो कोरोना वायरस के चलते अब तक 4 करोड़ से ज्यादा मौतें हो चुकी होतीं और कई अरब लोग इससे संक्रमित हो चुके होते।
बचेंगी 3.8 करोड़ जानें
इंपीरियल कॉलेज, लंदन के शोधकर्ताओं ने इस महामारी से होने वाले संभावित नुकसान का आकलन किया है। उन्होंने बताया है कि वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए उठाए गए कदमों से मृतकों की संख्या 50 से 95 प्रतिशत तक कम रह सकती है। उन्हेंने कहा है कि लॉकडाउन, सोशल डिस्टेंसिंग और बुजुर्गों को सुरक्षित रखने जैसे उपायों से करीब 3.8 करोड़ लोगों की जान बच सकती है।
आठ महीने के भीतर आ सकती है वैक्सीनती है वैक्सीन
कोरोना की वैक्सीन जल्द ही मिल जाएगी। इम्युनोलॉजिस्ट और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रो. मार्टिन बाकमैन का दावा है कि अगले 6 से 8 महीने में दुनिया में पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन उपलब्ध हो जाएगी। वैक्सीन बनाने में वायरस जैसे तत्त्व प्रयोग होते हैं जो संक्रामक नहीं होते। ये पार्टिकल शरीर में जरूरी एंटीबॉडीज को तैयार करते हैं जो रोग से लड़ने में सहायक होता है।
कोरोना वायरस स्पाइक प्रोटीन से कोशिका पर स्थित रिसेप्टर से जुड़ता है, जो संक्रमण फैलाने की इजाजत देता है। इस रिसेप्टर को एसीई-2 कहते हैं। हम वैक्सीन बनाने की दिशा में स्पाइक प्रोटीन के एक हिस्से के साथ ही काम कर रहे हैं, जिसे रिसेप्टर-बाइंडिंग डोमेन (आरबीडी) कहते हैं।