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COP 29: वैश्विक पर्यावरण पर बात करने के लिए सीओपी29 की बैठक क्यों जरूरी? जानें इसके बारे में सबकुछ

Wed, 13 Nov 2024 12:39 AM IST
संध्या स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: संध्या Updated Wed, 13 Nov 2024 12:39 AM IST
सार

अजरबैजान सीओपी29 की अध्यक्षता कर रहा है। इसके लिए राजधानी बाकू में दिग्गजों का जमावड़ा लगा हुआ है। सीओपी29 के आयोजल  स्थल के रूप में बाकू स्टेडियम को चुना गया है। सम्मेलन 11 नवंबर को शुरू हुआ था। यह 22 नवंबर तक चलेगा।

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COP29 meeting necessary to talk about the global environment
सीओपी29 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संयुक्त राष्ट्र के वार्षिक जलवायु सम्मेलन की मेजबानी इस बार अजरबैजान कर रहा है। यह सम्मेलन 11 नवंबर को शुरू हुआ था, जो 22 नवंबर तक चलेगा। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए सीओपी29 के अध्यक्ष मुख्तार बाबायेव ने कहा कि वर्तमान नीतियां विश्व को तीन डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की ओर ले जा रही हैं, जो अरबों लोगों के लिए विनाशकारी होगा। उन्होंने सदस्य देशों से अपील की कि वे विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने और उसके अनुकूल होने में मदद करने के लिए नए जलवायु वित्त लक्ष्य पर सहमत होने के लिए तत्काल मतभेदों को सुलझाएं।

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क्या है सीओपी29
कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज (सीओपी) हर साल आयोजित किया जाता है, जिसमें अध्यक्षता पांच मान्यता प्राप्त संयुक्त राष्ट्र क्षेत्रों के बीच घूमती रहती है। इस वर्ष अजरबैजान को पार्टियों के 29वें सम्मेलन (सीओपी29) की अध्यक्षता के रूप में चुना गया है। सीओपी हर साल अपनी बैठक करता है और इसमें इसमें पर्यावरण में सुधार करने के लिए निर्णय लिए जाते है। पहली सीओपी बैठक मार्च, 1995 में बर्लिन, जर्मनी में हुई थी। जब तक कोई पार्टी सत्र की मेजबानी करने की पेशकश नहीं करती, तब तक सीओपी सचिवालय की सीट बॉन में मिलती है। जिस प्रकार सीओपी की अध्यक्षता संयुक्त राष्ट्र के पांच मान्यता प्राप्त क्षेत्रों - अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई, मध्य और पूर्वी यूरोप तथा पश्चिमी यूरोप और अन्य - के बीच घूमती रहती है, उसी प्रकार सीओपी के आयोजन स्थल के भी इन समूहों के बीच बदलने की प्रवृत्ति है।

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सीओपी29 का एक्शन एजेंडा 
सीओपी29 प्रेसीडेंसी ने अपने एक्शन एजेंडा के तहत वैश्विक पहलों की घोषणा की है। सीओपी29 प्रेसीडेंसी एजेंडा पहले से शुरू की गई पहलों की एक मूल्यवान विरासत पर आधारित है, ताकि तालमेल, सुसंगतता और उच्चतम प्रभाव सुनिश्चित किया जा सके। इनमें से कुछ मुख्य एजेंडे के बारे में आपको बताते है।  

जलवायु वित्त कार्य निधि (CFAF)

जलवायु वित्त कार्य निधि (CFAF) एक निधि है, जिसका उद्देश्य विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करना है। यह निधि सीओपी29 विषयगत दिनों के भाग के रूप में स्थापित की जाएगी और इसका मुख्यालय बाकू, अजरबैजान में होगा।

ग्रीन एनर्जी जोन एंड कॉरिडोर 
ग्रीन एनर्जी जोन एंड कॉरिडोर के लिए प्रतिबद्ध होगी, जिसमें निवेश को बढ़ावा देने, आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने, बुनियादी ढांचे को विकसित करने, आधुनिकीकरण और विस्तार करने और क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लक्ष्य शामिल हैं।

ऊर्जा भंडारण और ग्रिड
इसका लक्ष्य वैश्विक ऊर्जा भंडारण क्षमता को 2022 के स्तर से छह गुना बढ़ाना होगा, जो 2030 तक 1,500 गीगावाट तक पहुंच जाएगी। ऊर्जा ग्रिड को बढ़ाने के लिए, समर्थक 2040 तक 80 मिलियन किलोमीटर से अधिक जोड़ने या नवीनीकृत करने के वैश्विक प्रयासों के हिस्से के रूप में ग्रिड में निवेश को काफी हद तक बढ़ाने के लिए भी प्रतिबद्ध होंगे।

हाइड्रोजन एक्शन
परिणाम घोषणा पत्र नियामक, तकनीकी, वित्तपोषण और मानकीकरण बाधाओं को दूर करने के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों और प्राथमिकताओं के साथ स्वच्छ हाइड्रोजन और इसको फिर से उत्पन्न करने के लिए वैश्विक बाजार की क्षमता को अनलॉक करेगा।

ग्रीन डिजिटल एक्शन
इसका उद्देश्य सूचना और संचार प्रौद्योगिकी क्षेत्र में जलवायु-सकारात्मक डिजिटलीकरण और उत्सर्जन में कमी को तेज करना और ग्रीन डिजिटल प्रौद्योगिकियों की पहुंच को बढ़ाना है।

 

 

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सीओपी शिखर सम्मेलन के कुछ पिछले निष्कर्ष
लंबे समय तक, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसे पर्यावरणीय मुद्दे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय या संयुक्त राष्ट्र के लिए कोई बड़ी चिंता का विषय नहीं थे। लेकिन, 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत में, पर्यावरण को लेकर जागरूकता बढ़ी। 

क्योटो प्रोटोकॉल

  • 1995 में,   सीओपी का पहला सम्मेलन  बर्लिन में हुआ, उसके बाद स्विट्जरलैंड के जिनेवा में  सीओपी2 हुआ। दोनों ने बाद की अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं का आधार बनाया। 1997 में, यूएनएफसीसीसी के कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित किया गया था। लंबी बातचीत के बाद, पार्टियां क्योटो प्रोटोकॉल पर सहमत हुईं , जो आज तक का सबसे दूरगामी जलवायु समझौता है। पहली बार, औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन पर एक पूर्ण और कानूनी रूप से बाध्यकारी सीमा को एक अंतरराष्ट्रीय संधि में शामिल किया गया था।
  • कई वर्षों बाद 16 फरवरी 2005 को क्योटो प्रोटोकॉल को 191 देशों द्वारा अनुमोदित किया गया। सीओपी4 के दौरान हस्ताक्षरकर्ता बनने के बावजूद, अमेरिका इस समूह में शामिल नहीं था।
  • क्योटो प्रोटोकॉल के तहत 37 औद्योगिक देशों ने 2008 से 2012 के बीच ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 1990 के स्तर से 5.2% कम करने की प्रतिबद्धता जताई थी। विकासशील देशों, यहां तक कि उच्च प्रदूषण करने वाले देशों पर भी कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया। 

कैनकन समझौता

  • कैनकन समझौते में वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया। 2010 में सीओपी16 में, पक्षों ने कैनकन समझौते को अपनाया, जिसमें पूर्व-औद्योगिक स्तरों से ऊपर वैश्विक तापमान में 2 °C की कमी लाने के लक्ष्य को औपचारिक रूप दिया गया। 
  • वारसॉ में सीओपी19  के परिणामस्वरूप एक नए जलवायु समझौते के लिए एक रोडमैप तैयार हुआ। पार्टियों ने  वनों की कटाई और वन क्षरण से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए एक हरित जलवायु कोष पर भी सहमति व्यक्त की। 

पेरिस समझौता

  • पेरिस में सीओपी21 में उपस्थित 196 दलों ने पेरिस समझौते को अपनाया , जो जलवायु परिवर्तन पर कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि है, जिसने भविष्य के लिए शुद्ध शून्य उत्सर्जन का दृष्टिकोण तैयार किया।

  • सभी देश 2020 तक अपनी जलवायु कार्य योजनाएं प्रस्तुत करने के लिए सहमत हुए। सभी प्रमुख उत्सर्जक देश अपने GHG उत्सर्जन को कम करने और समय के साथ अपनी प्रतिबद्धताओं को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।  लेकिन पेरिस समझौता शायद वैश्विक तापमान को 2 °C से नीचे, आदर्श रूप से 1.5 °C, पूर्व-औद्योगिक स्तरों से ऊपर सीमित करने के अपने लक्ष्य के लिए सबसे यादगार है।

 

ग्लासगो जलवायु संधि

  • भाग लेने वाले 197 देशों ने ग्लासगो जलवायु संधि पर सहमति व्यक्त की, जिसका उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री तक सीमित करना है।

  • इसमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को रोकने के प्रयासों में तेजी लाना। जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने में विकासशील देशों का समर्थन करने के लिए दोगुना वित्त पोषण करने की प्रतिबद्धता करना था।

सीओपी29 में भारत की प्राथमिकताएं क्या हैं?
विशेषज्ञों का अनुमान है कि सम्मेलन में भारत की प्रमुख प्राथमिकताएं जलवायु वित्त पर विकसित देशों की जवाबदेही सुनिश्चित करने, कमजोर समुदायों के लिए लचीलेपन को मजबूत करने तथा समतापूर्ण ऊर्जा परिवर्तन प्राप्त करने पर केंद्रित होंगी।

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