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COP29: जलवायु वित्त को लेकर नहीं बन रही सहमति, विकसित-विकासशील देश आमने-सामने, इस मुद्दे पर अटकी बात
Tue, 19 Nov 2024 11:23 AM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बाकू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बाकू
Published by: नितिन गौतम
Updated Tue, 19 Nov 2024 11:23 AM IST
सार
विकासशील देशों का कहना है कि जब तक विकसित देश वित्तीय मदद देने पर कोई फैसला नहीं करते हैं, तब तक आगे कोई बात नहीं होगी। इसकी वजह से बाकू में चल रहे जलवायु सम्मेलन में कोई सहमति नहीं बन पा रही है।
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2022 में सबसे ज्यादा जलवायु वित्त देने वाला देश भारत
- फोटो : freepik
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विस्तार
अजरबैजान की राजधानी बाकू में चल रहे COP29 सम्मेलन में भी जलवायु वित्त को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। दरअसल विकासशील देश जहां कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए पहले विकसित देशों द्वारा वित्तीय मदद देने की मांग पर अड़े हैं। वहीं विकसित देशों का कहना है कि धनी विकासशील देशों को भी वित्तीय मदद में योगदान देना चाहिए।
विकासशील देशों का कहना है कि जब तक विकसित देश वित्तीय मदद देने पर कोई फैसला नहीं करते हैं, तब तक आगे कोई बात नहीं होगी। इसकी वजह से बाकू में चल रहे जलवायु सम्मेलन में कोई सहमति नहीं बन पा रही है। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु मामलों के प्रमुख ने चेतावनी दी है कि अगर दुनिया के देश समझौता नहीं करेंगे तो इससे बातचीत उल्टी दिशा में भी जा सकती है।
क्या है जलवायु वित्त
दरअसल जलवायु वित्त वह अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण है, जिसकी मांग विकासशील देशों द्वारा की जा रही है। विकासशील देशों का कहना है कि अगर उन्हें कार्बन उत्सर्जन कम करना है तो इसके लिए उन्हें वैकल्पिक संसाधनों की जरूरत होगी, जिसके लिए उन्हें वित्तीय मदद मिलनी चाहिए ताकि पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस से कम तक सीमित किया जा सके।
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यह वित्तीय मदद विकसित देशों द्वारा दिए जाने की मांग की जा रही है क्योंकि औद्योगिकरण का सबसे ज्यादा फायदा विकसित देशों ने उठाया है, जिसकी वजह से जलवायु परिवर्तन की समस्या हुई। अब जब विकासशील देशों को अपने विकास के लिए औद्योगिकरण की जरूरत है तो उन्हें कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए कहा जा रहा है। यही वजह है कि विकासशील देशों ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए वित्तपोषण दिए जाने की मांग की है। विकासशील देशों को जलवायु के बिगड़ते प्रभावों से निपटने के लिए सालाना कम से कम 1.3 खरब अमेरिकी डॉलर की जरूरत है।
इस मुद्दे पर अटकी बात
विकसित देशों के रुख में थोड़ा बदलाव आया है। पहले जहां वे विकासशील देशों को वित्त पोषित करने पर ही एकमत नहीं थे, अब उन्होंने अपने रुख में थोड़ी नरमी लाते हुए वित्तपोषित करने वाले देशों में उन विकासशील देशों को भी शामिल करने की मांग की है, जो धनी हैं, जैसे सऊदी अरब और चीन आदि। यूरोपीय संघ और कुछ विकसित देशों का तर्क है कि इतनी बड़ी राशि तभी हासिल की जा सकती है जब चीन और खाड़ी देशों जैसे 'अमीर उच्च-उत्सर्जक' विकासशील देश भी योगदान दें। यूरोपीय संघ ने कहा है कि विकासशील देशों को भी उनके कार्बन उत्सर्जन और विकास दर के आधार पर वित्तपोषण में योगदान देना चाहिए। हालांकि विकासशील देश वित्तपोषण के मुद्दे पर अंतिम सहमति बनने तक किसी और मुद्दे पर बातचीत के लिए तैयार नहीं हैं।
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विकासशील देशों का कहना है कि जब तक विकसित देश वित्तीय मदद देने पर कोई फैसला नहीं करते हैं, तब तक आगे कोई बात नहीं होगी। इसकी वजह से बाकू में चल रहे जलवायु सम्मेलन में कोई सहमति नहीं बन पा रही है। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु मामलों के प्रमुख ने चेतावनी दी है कि अगर दुनिया के देश समझौता नहीं करेंगे तो इससे बातचीत उल्टी दिशा में भी जा सकती है।
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क्या है जलवायु वित्त
दरअसल जलवायु वित्त वह अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण है, जिसकी मांग विकासशील देशों द्वारा की जा रही है। विकासशील देशों का कहना है कि अगर उन्हें कार्बन उत्सर्जन कम करना है तो इसके लिए उन्हें वैकल्पिक संसाधनों की जरूरत होगी, जिसके लिए उन्हें वित्तीय मदद मिलनी चाहिए ताकि पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस से कम तक सीमित किया जा सके।
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यह वित्तीय मदद विकसित देशों द्वारा दिए जाने की मांग की जा रही है क्योंकि औद्योगिकरण का सबसे ज्यादा फायदा विकसित देशों ने उठाया है, जिसकी वजह से जलवायु परिवर्तन की समस्या हुई। अब जब विकासशील देशों को अपने विकास के लिए औद्योगिकरण की जरूरत है तो उन्हें कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए कहा जा रहा है। यही वजह है कि विकासशील देशों ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए वित्तपोषण दिए जाने की मांग की है। विकासशील देशों को जलवायु के बिगड़ते प्रभावों से निपटने के लिए सालाना कम से कम 1.3 खरब अमेरिकी डॉलर की जरूरत है।
इस मुद्दे पर अटकी बात
विकसित देशों के रुख में थोड़ा बदलाव आया है। पहले जहां वे विकासशील देशों को वित्त पोषित करने पर ही एकमत नहीं थे, अब उन्होंने अपने रुख में थोड़ी नरमी लाते हुए वित्तपोषित करने वाले देशों में उन विकासशील देशों को भी शामिल करने की मांग की है, जो धनी हैं, जैसे सऊदी अरब और चीन आदि। यूरोपीय संघ और कुछ विकसित देशों का तर्क है कि इतनी बड़ी राशि तभी हासिल की जा सकती है जब चीन और खाड़ी देशों जैसे 'अमीर उच्च-उत्सर्जक' विकासशील देश भी योगदान दें। यूरोपीय संघ ने कहा है कि विकासशील देशों को भी उनके कार्बन उत्सर्जन और विकास दर के आधार पर वित्तपोषण में योगदान देना चाहिए। हालांकि विकासशील देश वित्तपोषण के मुद्दे पर अंतिम सहमति बनने तक किसी और मुद्दे पर बातचीत के लिए तैयार नहीं हैं।
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