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COP28: मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति को उम्मीद- फंड जुटाने में मिलेगी मदद; इस मामले में हिलेरी को भारत पर भरोसा

Mon, 04 Dec 2023 06:27 PM IST
ज्योति भास्कर वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, दुबई
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, दुबई Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 04 Dec 2023 06:27 PM IST
सार

मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति ने जलवायु संकट से निपटने में बड़े देशों से आर्थिक मदद मिलने का भरोसा जताया है। पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने जलवायु परिवर्तन को गंभीर समस्या माना और कहा, भारत जैसे देश में लिंग आधारित जलवायु नीति की जरूरत है।

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COP28 Dubai Maldives Ex President Nasheed Fund Collection Hillary Clinton climate resilience in India
पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति नशीद (फाइल) - फोटो : ANI

विस्तार

मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने सोमवार को कहा, दुबई जलवायु सम्मेलन में किए गए वादों को पूरा किया जाए, वह इस दिशा में पूरा प्रयास करेंगे। उन्होंने कहा, वह सुनिश्चित करेंगे कि अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और यूरोपीय संघ समेत अन्य देश वास्तव में जलवायु-संवेदनशील देशों की आर्थिक मदद करने का वादा पूरा करेंगे। बता दें कि नशीद जलवायु परिवर्तन के खिलाफ बनाए गए मंच- क्लाइमेट वल्नरेबल फोरम (Climate Vulnerable Forum) के महासचिव भी हैं। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक दुबई में आयोजित सीओपी28 समिट के बाद फंड जुटाने में बड़े देशों की भूमिका पर नशीद ने कहा, ''मेरा काम यह सुनिश्चित करना है कि हमें वह पैसा जरूर मिले जो बड़े देशों के पास  रखा है।''
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गौरतलब है कि COP28 में किए गए बड़े वित्तीय वादे सुर्खियों में रहे हैं। ग्रीन क्लाइमेट फंड के तहत 3 बिलियन अमरीकी डॉलर का योगदान करने के लिए अमेरिका ने प्रतिबद्धता दिखाई है। संयुक्त अरब अमीरात, यूरोपीय संघ और अमेरिका सहित कई देशों की तरफ से 400 मिलियन अमरीकी डॉलर से अधिक राशि के योगदान का वादा किया है।
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खबरों के अनुसार बड़े देशों ने जलवायु संकट में कम योगदान देने के बावजूद इसका खामियाजा भुगतने वाले विकासशील और गरीब देशों को मुआवजा देने के लिए प्रारंभिक समझौता किया है।दरअसल, पेरिस जलवायु समझौते का लक्ष्य पूरा करने के लिए विकासशील देशों को 5.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की जरूरत है।  जी20 देशों के ऐसा कहने पर मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, जलवायु संकट के बीच हम अरबों-खरबों डॉलर की चर्चा में फंस गए हैं। वे मामले की संवेदनशीलता और गंभीर जलवायु संकट को देखते हुए फंड की जरूरत को खरबों तक जाते हुए खामोशी से नहीं देख सकते।
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दुबई में आयोजित जलवायु सम्मेलन को लेकर पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने भी अहम बात कही। उन्होंने जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए स्थानीय समाधानों को अपनाने का आह्वान किया। भारत की भूमिका पर क्लिंटन ने कहा, भारत में महिलाओं के सामने कई चुनौतियां हैं। ऐसे में लिंग आधारित जलवायु नीतियों की बेहद अहम भूमिका है। सीओपी-28 के तहत जलवायु परिवर्तन की समस्या से लड़ाई में समुदायों को सशक्त बनाने पर भी चर्चा की गई।

हिलेरी क्लिंटन ने महिलाओं की भूमिका पर कहा, अत्यधिक गर्मी का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है। आजीविका, समाजिक ताना-बाना और इंसान की सेहत भी इससे बुरी तरह प्रभावित हो रही है। इस तेजी से बढ़ने वाले खतरे के प्रभाव की चपेट में महिलाएं भी आ रही हैं। भारत में स्व-रोज़गार महिला संघ (SEWA) के साथ अपने लंबे अनुभव का हवाला देते हुए क्लिंटन ने कहा, अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं पर अत्यधिक गर्मी का असर कई तरह से होता है। भारत के असंगठित क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका रेखांकित करते हुए क्लिंटन ने कहा, जलवायु परिवर्तन केवल सेहत से जुड़ा मुद्दा नहीं हैं। यह एक आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा भी है। महिलाओं की भूमिका लगातार अहम होती जा रही है। महिलाएं श्रम प्रधान व्यवसायों में पहले की तुलना में अधिक सक्रिय हुई हैं।

क्लिंटन ने कहा, अत्यधिक गर्मी और लगातार बढ़ते वैश्विक तापमान को जलवायु परिवर्तन का सबसे खतरनाक परिणाम मानना चाहिए। खासकर भारत में ऐसा किए जाने की जरूरत है। जब हम बड़े बदलाव, नवाचार और परिवर्तन की दौड़ में शामिल हैं, तो हमें इस बारे में चिंता करनी होगी कि वास्तविक रूप से क्या हो रहा है? उन्होंने कहा कि दुनियाभर में लाखों लोग जलवायु परिवर्तन से बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। ख़ासकर भारत की महिलाओं पर भी इसकी बुरी मार पड़ी है। ऐसे में हमें लिंग आधारित जलवायु नीति अपनाने की सख्त जरूरत है।

योजनाएं लैंगिक रूप से संवेदनशील हों
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का नाम लिए बिना अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने कहा कि जिस दौर में दुनिया के बड़े नेता बेशर्मी के साथ यह कह रहे हैं कि महिलाएं घर रहें और ज्यादा बच्चे पैदा करें, उस दौर में यह बहुत अहम हो जाता है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए बनाई जा रही नीतियों और योजनाओं को लैंगिक रूप से उत्तरदायी और संवेदनशील बनाया जाए। उन्होंने कहा कि दुनियाभर में महिलाओं की भूमिका को कमतर बनाने और उन्हें अर्थव्यवस्था से पीछे हटने के लिए मजबूर किया जा रहा है।


वहीं, जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर प्रमुख विकासशील विश्व नेता और बारबाडोस की पीएम मिया मोटली ने सोमवार को कहा कि वित्तीय सेवाओं, तेल-गैस व शिपिंग उद्योगों पर वैश्विक करों से गरीब देशों को ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए खरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है। उन्होंने इससे बचाने का विश्व बिरादरी से आग्रह किया। उन्होंनें बाढ़, जंगलों की आग और गर्मी से समुदायों के प्रभावित होने का भी जिक्र किया। बारबाडोस की पीएम ने इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि कैसे गरीब देश, अमीर देशों और अंतरराष्ट्रीय वित्त की मदद से दुनिया को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने, इसके भविष्य के दुष्प्रभाव को घटाने और जलवायु संकट जैसे नुकसान के लिए भुगतान की भारी लागत को वहन किया जा सकता है। उधर बाढ़, जंगल की आग और गर्मी की लहरें भी विश्व समुदाय को प्रभावित कर रही हैं।
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