फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Chinese President Jinping reached Tibet amidst changing global conditions

Xi Jinping: बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच जिनपिंग तिब्बत में; दलाई लामा विवाद के बीच दौरे के क्या मायने?

Thu, 21 Aug 2025 08:55 AM IST
शिव शुक्ला वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ल्हासा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ल्हासा Published by: शिव शुक्ला Updated Thu, 21 Aug 2025 08:55 AM IST
सार

तिब्बत हमेशा से चीन की सत्ता और उसके राजनीतिक एजेंडे का केंद्र रहा है। 1950 के दशक में चीनी सेना के कब्जे के बाद से ही बीजिंग लगातार तिब्बत को अपना अभिन्न अंग बताता रहा है। वहीं बड़ी संख्या में  तिब्बती इससे इनकार करते हैं। वे इसे चीनी दमन और सांस्कृतिक हस्तक्षेप बताते हैं। 

विज्ञापन
Chinese President Jinping reached Tibet amidst changing global conditions
तिब्बत पहुंचे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग। - फोटो : पीटीआई।

विस्तार

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग बुधवार को तिब्बत दौरे पर ल्हासा पहुंचे। यहां उन्होंने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की स्थापना के 60 वर्ष पूरे होने पर कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने वहां कई अधिकारियों और स्थानीय नेताओं से मुलाकात की और तिब्बत को आधुनिक, विकसित बनाने पर जोर दिया। गौरतलब है कि चीन में अब तक केवल दो राष्ट्रपति ही हुए हैं जिन्होंने तिब्बत की यात्रा की है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दूसरी बार तिब्बत पहुंचे थे। वे इससे पहले 2021 में तिब्बत आए थे। जिनपिंग से पहले 1990 में केंद्रीय सैन्य आयोग के चेयरमैन जियांग जेमिन ने यहां का दौरा किया था।

विज्ञापन


चीनी राष्ट्रपति ने तिब्बत का यह दौरा तब किया है जबकि क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन के बांध बनाने की परियोजना और दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर तनाव व्याप्त है। जिनपिंग ने अपने दौरे के दौरान यह भी कहा कि वे तिब्बत को स्थिर समाजवादी क्षेत्र बनाएंगे ताकि वहां राजनीतिक स्थिरता, सामाजिक सौहार्द्र, जातीय एकता और धार्मिक संतुलन स्थापित किया जा सके। 
विज्ञापन


बता दें कि एशिया की छत कहे जाने वाला यह क्षेत्र चीन की सत्ता और उसके राजनीतिक एजेंडे का केंद्र रहा है। 1950 के दशक में चीनी सेना के कब्जे के बाद से ही बीजिंग लगातार तिब्बत को अपना अभिन्न अंग बताता रहा है। वहीं बड़ी संख्या में  तिब्बती इससे इनकार करते हैं। वे इसे चीनी दमन और सांस्कृतिक हस्तक्षेप बताते हैं। 
विज्ञापन
विज्ञापन


दलाई लामा जारी रखे हुए हैं विरोध
गौरतलब है कि1959 में असफल विद्रोह के बाद 14वें दलाई लामा भारत आ गए थे और तब से वे भारत के धर्मशाला से तिब्बत को लेकर वे अपना संघर्ष जारी रखे हुए हैं। वहीं, दलाई लामा के भारत आने के बाद चीन ने 1965 में तिब्बत की स्वायत्तता का एलान किया। हालांकि इसकी हकीकत कुछ और ही है। चीन लगातार तिब्बत के प्रशासन, धार्मिक गतिविधियों और इंफ्रास्ट्रक्चर में अपना दखल जारी रखे हुए है। 

भारत और चीन दोनों के लिए अहम है यह 
तिब्बत भारत और चीन दोनों देशों के लिए रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है। चीन तिब्बत को अपने अधिकार क्षेत्र में बताता रहा है। उसका कहना है कि तिब्बत-भारत सीमा अब उसकी सीमा है। यहां से चीन भारत के हिमालयी क्षेत्र पर नजर रख सकता है। वहीं भारत चीन के साथ जो सीमा साझा करता है उसका अधिकांश हिस्सा तिब्बती क्षेत्र में आता है। यह भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रह्मपुत्र समेत कई बड़ी नदियां तिब्बती क्षेत्र से निकलती हैं और चीन वहां डैम परियोजनाएं चलाने की योजना में है, जो भारत के लिए बड़ा जल संकट पैदा कर सकती हैं। हाल ही में चीन ने तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर दुनिया का सबसे बड़ा बांध का निर्माण शुरू किया है। इस परियोजना के जरिए चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की बात कहता है, हालांकि इस प्रोजेक्ट को लेकर न सिर्फ तमाम विशेषज्ञों ने चिंता जाहिर की है, बल्कि इसे लेकर अब दो देशों- भारत और बांग्लादेश में पानी की जरूरतों को लेकर भी चिंता पैदा हो गई है। इतना ही नहीं चीन के इस फैसले के बाद भारत सरकार कूटनीतिक रूप से भी सक्रिय हो गई है। 


दलाई लामा की शरण भी भारत से तनाव का कारण
भारत में दलाई लामा की शरण भी भारत-चीन के बीच विवाद का एक कारण है। भारत में दलाई लामा और लाखों तिब्बती शरणार्थियों की मौजूदगी चीन को हमेशा संदेह में रखती है। चीन इसका विरोध करता है। वहीं, भारत का कहना है कि उसने केवल मानवीय आधार पर शरण दी है। दलाई लामा के उत्तराधिकारी चयन में भी चीन ने हाल में अपने हस्तक्षेप का संकेत दिया है। चीन के विदेश मंत्रालय का कहना है कि दलाई लामा के पुनर्जन्म को मान्यता देने का अधिकार उसके पास है। चीनी अधिकारियों ने इस पर जोर दिया है कि दलाई लामा के चयन में घरेलू प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है। चीन इस पूरे मुद्दे को राष्ट्रीय स्वायत्तता और धार्मिक नियमों से जुड़ा मानता है। 2007 में उसने इससे जुड़ा एक कानून भी बनाया था, जिसके तहत तिब्बत के सर्वोच्च धर्मगुरुओं को चीन की तरफ से मान्यता होनी चाहिए और उन्हें चीनी कानून, धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक मिसालों को मानना चाहिए। चीन के इस रुख को तिब्बती समुदाय अपनी आस्था पर हमला मानता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed