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अपनी इन शर्तों पर चीन ऐसे बना दुनिया का 'बादशाह'

Sat, 21 Apr 2018 04:31 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
बीबीसी, हिन्दी Updated Sat, 21 Apr 2018 04:31 PM IST
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कारोबार हो या फिर विदेश नीति या फिर इंटरनेट सेंसरशिप का मामला हो, ये विषय आज के दौर में चीन की सुर्खियां बनाते हैं। लेकिन खास बात ये है कि इन सब अहम मुद्दों पर चीन अपनी परंपराओं और इतिहास को बहुत अहमियत देता रहा है। मेरे ख्याल से चीन जिस तरह अपनी संस्कृति और इतिहास को याद रखने वाला समाज है, वैसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। मौजूदा दौर में किस तरह से चीन अपनी परंपराओं के मुताबिक ही काम करता है, इसे इस तरह देखा जा सकता है-

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कारोबार

एक समय ऐसा भी था जब चीन को उन परिस्थितियों में कारोबार करना पड़ा, जिसके लिए वो तैयार नहीं था, लेकिन आज के दौर में पश्चिमी ताकतों की लगातार कोशिशों के बाद भी अपनी शर्तों पर कारोबार कर रहा है। अमेरिका और चीन में इस बात का विवाद चल रहा है कि चीन अपना सामान तो अमेरिकी बाजार में बेच रहा है, लेकिन अमेरिकी उत्पादों के लिए अपना बाजार उसने बंद किया हुआ है। बीजिंग में लोग आज भी इस बात को याद करते हैं, करीब 150 साल पहले, चीन का अपने कारोबार पर मामूली सा अंकुश था। ब्रिटेन ने 1839 में अफीम युद्ध के दौरान चीन पर हमला किया था। उस वक्त ब्रिटेन ने एक संस्थान का गठन केवल इसलिए किया था ताकि वह चीन से आयात होने वाले उत्पादों पर कर लगा सके और वसूल सके।
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यह संस्था वैसे तो चीनी सरकार के अधीन ही थी, लेकिन यह ब्रिटिश संस्थान थी, जिसका प्रमुख कोई चीनी आदमी नहीं था, बल्कि नार्दन आयरलैंड में रहने वाले सर रॉबर्ट हॉर्ट थे, जो इस संस्थान के महानिदेशक के तौर पर 1863 से 1911 तक कार्यरत रहे। वे एक बेहद ईमानदार अधिकारी थे, जिनकी मदद से चीन की आमदनी काफी बढ़ गई थी। मिंग के शासनकाल के दौरान चीन में कारोबार की स्थिति बदली, एडमिरल जेंग ने सात समुद्री बेड़े को दक्षिण पूर्व एशिया, श्रीलंका और यहां तक कि पूर्वी अफ्रीका के तटों तक भेजा था, इससे चीन के कारोबारी साम्राज्य की झलक मिलती है। उसके बाद चीन ने समुद्र के रास्ते अपने सामान कई देशों में भेजे। इससे ना केवल चीन का दुनिया भर में कारोबार फैला बल्कि चीन में दूसरी दुनिया की बेहतरीन चीजें भी आनी शुरू हुईं, अफ्रीकी जिराफ ऐसे ही चीन तक पहुंचा था।

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पड़ोस के साथ मुश्किल

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चीन की हमेशा अपने पड़ोसी देशों के साथ मुश्किल रही है। इतिहास के मुताबिक चीन ने उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन से भी खराब पड़ोसी देखा है। 1127 में सोंग साम्राज्य के शासन के दौरान एक महिला ली किंगजाहो अपने घर से भाग निकली थीं। हम उनकी कहानी इसलिए जानते हैं क्योंकि वो चीन की सबसे बेहतरीन कवि थीं, जिनकी कविताओं को काफी पढ़ा जाता रहा है, लेकिन उन्हें अपने घर से इसलिए भागना पड़ा क्योंकि उनके यहां आक्रमण हो रहे थे। चीन के उत्तर में रहने वाले यूरेचेन समुदाय के लोगों का चीन के सुंग साम्राज्य के साथ मधुर रिश्ते नहीं रहे, जिसके चलते युद्ध होते ही रहते थे। 

कुछ समय तक जिन साम्राज्य का शासन उत्तरी चीन में रहा जबकि सुंग साम्राज्य ने दक्षिण चीन में अपना साम्राज्य फैलाया। बाद में दोनों साम्राज्य मंगोलों के अधीन आ गए। इन सबका असर ये हुआ कि चीन की सीमा रेखा समय के साथ बदलती रही। चीन की संस्कृति पर वहां की भाषा, इतिहास और कंफ्यूशियिज्म का असर देखने को मिला। मंचोस और मंगोलो समुदाय के लोगों ने चीन पर अलग अलग शासन किया अपने विचारों को देश पर थोपने की कोशिश की। लेकिन कई बार उन्होंने चीनी संस्कृति को ही मूल रूप में प्रभावी बनाने की कोशिश की।

सूचनाओं का प्रवाह

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आज के समय में चीन में इंटरनेट सेंसर को राजनीतिक तौर पर संवेदनशील माना जाता है। सत्ता प्रतिष्ठानों के खिलाफ सच बोलने पर भी चीन में अधिकारी आपको गिरफ्तार कर सकते हैं या आपके साथ इससे भी बुरा हो सकता है। चीन में सत्ता प्रतिष्ठान के विरोध में बोलना हमेशा से एक मुद्दा रहा है। चीन के इतिहासकारों के मुताबिक उन्हें वही लिखना पड़ा है जो सरकार चाहती थी, ना कि उनके लिहाज से महत्वपूर्ण था।

लेकिन सीमा कियान (जिन्हें चीन का महान इतिहासकार समझा जाता रहा है) ने अलग रास्ता चुना। उन्होंने चीन के इतिहास को कलमबद्ध किया था, ईसा से पहले पहली शताब्दी में। उन्होंने युद्ध हार चुके एक जेनरल के बचाव की कोशिश की थी, जिसके चलते शासक ने उनका बधिया करवा दिया था। लेकिन उन्होंने जो कोशिश की, वह चीन के इतिहास को लिपिबद्ध करने की शुरुआत थी। उन्होंने एक तरह से लेखकों को संदेश दे दिया था कि अगर आप अपनी सुरक्षा को दांव पर लगाते हैं तो आप इतिहास लिख सकते हैं, ऐसा नहीं कर सकते तो फिर खुद को सेंसर करके रहिए।

धार्मिक स्वतंत्रता

धार्मिक तौर पर चीन अब कहीं ज्यादा सहिष्णु देश है, माओ की सांस्कृतिक क्रांति के समय में इस पर काफी हद तक अंकुश था। लेकिन ऐतिहासिक तौर पर चीन में धार्मिक विश्वास को लेकर काफी खुलापन था। तुंग साम्राज्य के समय में यानी 7वीं सदी के दौरान महारानी वू जेटियन ने बौद्ध धर्म पर सवाल उठाए थे। मिंग साम्राज्य के दौर में जेसुर माटो रिक्की तो कोर्ट पहुंच गए थे, उनको सम्मानित वार्ताकार का दर्जा मिला हुआ था, हालांकि लोगों की दिलचस्पी उनके पाश्चात्य ज्ञान में ज्यादा थी।

19वीं शताब्दी के समय विद्रोही हॉग जिउकुआन ने तो खुद को जीसस का छोटा भाई होने का दावा तक कर दिया था। ताइपिंग विद्रोहियों ने चीनी इतिहास के सबसे खतरनाक युद्ध की शुरुआत की, 1850 से 1864 के बीच किंग साम्राज्य और जिउकुआन के साम्राज्य के बीच संघर्ष देखने को मिला था, कुछ सूत्रों के मुताबिक इस युद्ध में दो करोड़ लोगों की मौत हुई हैं। सरकारी सेना शुरुआती दौर में विद्रोहियों पर अंकुश नहीं लगा पाई थी लेकिन कई चीनी ईसाइयों की मौत के बाद ही विद्रोह थमा था। कुछ दशकों के बाद 1900 में चीन में ईसाई धर्म एक बार फिर बढ़ा। इसके बाद से आज तक चीन में धर्म को लेकर सहिष्णुता देखने को मिली है, चीनी सरकार को हालांकि इस बात का डर भी रहता है कि ये मुद्दा भड़कने से देश खतरे में आ सकता है।

तकनीक

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चीन आज के दौर में दुनिया भर में तकनीक का केंद्र बन गया है। एक शताब्दी पहले देश में ओद्यौगिक क्रांति हुई थी। दोनों जगहों पर महिलाएं केंद्र में हैं। आज की तारीख में चीन आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस, वाइस रिकॉगनाइजेशन और बिग डेटा के क्षेत्र में दुनिया का अगुआ है। दुनिया भर में बनने वाले स्मार्टफोन में से ज्यादातर फोन चीन में बने चिप से बनते हैं। चीनी फैक्ट्रियों में युवा महिलाएं काम करती हैं, हालांकि काम करने की शर्तें बेहद कठिन हैं, लेकिन महिलाए तेजी से जगह बना रही हैं।

शंघाई और यांगेज डेल्टा में महिलाओं ने 100 साल पहले काम करना शुरु कर दिया था, वे कंप्यूटर चिप नहीं बना रही हैं, लेकिन सिल्क और सूती बना रही हैं। महिलाएं आज चीन में अपने दम पर सेंट्रल शंघाई में डिपार्टमेंटल स्टोर खोल सकती हैं। भविष्य के इतिहासकार क्या सोचेंगे? चीन इन दिनों बदलाव के दौर से गुजर रहा है, भविष्य के इतिहासकारों की नजर में चीन 1978 से पहले एक गरीब देश होगा जिसने महज 25 साल में अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में बदल डाला।

इसके अलावा एक संतान की नीति जो अब समाप्त की जा चुकी है और आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस सर्विलियांस पर लेखकों का ध्यान जरूर जाएगा। इसके अलावा पर्यावरण, अंतरिक्ष में खोजबीन और आर्थिक विकास पर लोगों का ध्यान जाएगा। एक बात तो तय है- एक शताब्दी बाद भी चीन आकर्षण का केंद्र रहेगा, जो लोग वहां होंगे, उनके लिए भी और जो चीनी संस्कृति को जीते हैं उनके लिए भी और उसका समृद्ध इतिहास उसके वर्तमान और भविष्य को दिशा देता रहेगा।

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