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West Asia: इधर ईरान और इस्राइल में उलझा रहा अमेरिका, उधर चीन ने यूएई के साथ मिलकर की बड़ी डील

Sat, 27 Apr 2024 08:55 PM IST
मिथिलेश नौटियाल वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: मिथिलेश नौटियाल Updated Sat, 27 Apr 2024 08:55 PM IST
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सार

West Asia: पहले चीन ने ईरान और सऊदी अरब की पुरानी दुश्मनी को दोस्ती में बदलवाया, वहीं अब संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) को अपने पांचवी पीढ़ी के जे-20 स्टील्थ लड़ाकू विमान बेचने की तैयारी कर रहा है।

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China's J-20 fighter jets will now may be seen flying in the skies of Gulf countries
शी जिनपिंग - फोटो : अमर उजाला GFX

विस्तार

ईरान और इस्राइल के बीच रहे तनाव ने पूरे पश्चिमी एशिया को दो हिस्सों में बांट दिया है। वहीं अमेरिका इसमें बीच में फंस गया है। अमेरिका के लिए इस समय पसोपेश वाली स्थिति है कि वह इस्राइल का साथ दे या उसके पश्चिम एशिया में सहयोगी मुस्लिम देशों का। पहले फिलीस्तीन-इस्राइल संघर्ष और अब ईरान-इस्राइल के बीच रहे तनाव ने चीन की खाड़ी देशों में कूटनीतिक पहुंच बनाने का रास्ता तैयार कर दिया है। पहले चीन ने ईरान और सऊदी अरब की पुरानी दुश्मनी को दोस्ती में बदलवाया, वहीं अब संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) को अपने पांचवी पीढ़ी के जे-20 स्टील्थ लड़ाकू विमान बेचने की तैयारी कर रहा है। 



'अब्राहम समझौते' का हिस्सा थी यह डिफेंस डील 
दरअसल यूएई ने 2020 में अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन का एफ-35 लाइटनिंग II फाइटर जेट खरीदने की इच्छा जताई थी। 2020 में ही अमेरिका की मध्यस्थता में संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने इस्राइल के साथ संबंध सामान्य किए थे, जिसे 'अब्राहम समझौता' कहा जाता है। दोनों देशों के बीच राजनयिक और कारोबारी संबंध भी स्थापित हुए और दोनों के बीच हवाई सेवा भी शुरू हो गई। कहा जाता है कि इन संबंधों का आधार अमेरिका और यूएई के बीच 50 एफ-35 लड़ाकू जेट, 18 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन और 10 अरब डॉलर से अधिक के सैन्य साजो सामान की खरीदारी थी। अगर यह सौदा अंजाम तक पहुंच गया होता, तो यूएई एफ-35 जेट और रीपर यूएवी दोनों पाने वाला पहला अरब देश होता। उस समय इस सौदे पर इस्राइल की भी मौन सहमति थी। उस दौरान इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इस्राइल के रक्षा मंत्री बेनी गैंट्ज ने अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद कहा कि वे रक्षा समझौते का विरोध नहीं करेंगे, क्योंकि अमेरिका इस क्षेत्र में इस्राइल की सैन्य बढ़त सुनिश्चित करेगा।


हुआवै कंपनी के 5जी परीक्षणों से चिढ़ा अमेरिका
सब कुछ ठीक चल रहा था कि लेकिन इस बीच सीन में चीन की एंट्री हो गई। अमेरिका से एफ-35 लड़ाकू जेट की खरीदारी को लेकर इस्राइल की तरफ से भी अब कोई बाधा नहीं थी। लेकिन यूएई और चीन के नजदीकी संबंध अमेरिका को चुभ रहे रहे थे। इस बीच वाशिंगटन ने यूएई से चीन की हुआवै कंपनी के 5जी परीक्षणों को रोकने के लिए कहा। लेकिन इसके लिए यूएई तैयार नहीं हुआ। अमेरिका की चिंता मोबाइल फोन नेटवर्क थे, क्योंकि जहां एफ-35 को रखा जाना था, उस बेस के आसपास कई सेल फोन टावर थे। वहीं चीन इन टॉवरों की मदद से एफ-35 को ट्रैक कर सकता था और जानकारी जुटा सकता था। यही अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता थी। ईरान से यूएई के सुधरते रिश्तों और चीन के साथ तेजी से बन रहे नजदीकी संबंधों पर अमेरिका और इस्राइल दोनों की नजरें थीं। जिसके बाद अमेरिका ने पश्चिमी एशिया में अपने रणनीतिक साझेदार इस्राइल के जरिए यह कहलवाना शुरू कर दिया कि वह डील से असुरक्षित महसूस कर रहा है। इस्राइल का मानना था कि अगर यूएई एफ-35 फाइटर जेट को खरीदता है, तो उसकी सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हो सकता है। अमेरिका का रणनीतिक साझेदार होने के चलते इस्राइल इस क्षेत्र में अमेरिका के साथ होने वाली किसी भी डील पर नजर रखता है। लिहाजा इस्राइल के इस पेंच के बाद दिसंबर 2021 में अमेरिका और यूएई के बीच एफ-35 फाइटर जेट को लेकर बातचीत रुक गई। 

'प्रोजेक्ट 141' ने बढ़ाई अमेरिका की चिंता
रक्षा मामलों और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर मोहम्मद रिजवान का कहना है कि सिर्फ जहाज न देने की सिर्फ एक यही वजह नहीं थी। बल्कि अमेरिका जानता था कि यूएई आर्थिक विकास और राजनयिक लाभ के लिए रूस और चीन की ओर तेजी से झुक रहा है। वह कहते हैं कि 2021 में अमेरिकी खुफिया विभाग को यूएई बंदरगाह पर चीन की गुप्त सैन्य सुविधा के बारे में जानकारी मिली। हालांकि अमेरिका के कहने पर यूएई इस परियोजना को रोकने पर सहमत हो गया, लेकिन 2022 के अंत तक इसका फिर से निर्माण कर दिया गया। वहीं 2023 में अमेरिका को यह भी रिपोर्ट मिलीं कि आबू धाबी के पास एक बंदरगाह पर चीनी सेना कुछ गतिविधियां कर रही है, जिससे अमेरिका की नाराजगी बढ़ी। 'प्रोजेक्ट 141' के तहत चीन की योजना है कि 2030 तक दुनिया में कम से कम पांच विदेशी अड्डों और 10 लॉजिस्टिक सपोर्ट साइटें तैयार की जाएं, ताकि ग्लोबल मिलिट्री नेटवर्क तैयार किया जा सके।

पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान पाने की जिद ले गई चीन के पास
यूएई हमेशा से कहता रहा है कि वह पांचवीं पीढ़ी का देश है और उसे पांचवीं पीढ़ी के ही लड़ाकू विमान चाहिए। भले ही उसने स्पष्ट रूप से पेंटागन को बता दिया कि अब उसकी इस रक्षा समझौते में कोई रुचि नहीं है। लेकिन उसकी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान पाने की जिद चीन के और नजदीक ले गई। पिछले साल फरवरी 2023 में यूएई अबू धाबी ने अंतर्राष्ट्रीय रक्षा प्रदर्शनी (आईडीईएक्स) के 16वें संस्करण की मेजबानी की, जिसमें 65 देश और 1300 से अधिक कंपनियों ने हिस्सा लिया। इसमें यूएई ने चीन से लड़ाकू पायलटों को प्रशिक्षित करने के लिए एल-15 ट्रेनर कम लाइट अटैक एयरक्राफ्ट के लिए समझौता किया। खास बात यह है कि एल-15 ट्रेनर एयरक्राफ्ट का उपयोग पायलटों को चौथी और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू जेट उड़ाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। क्योंकि यूएई वायु सेना में अमेरिका के एफ-16 और फ्रांस के मिराज लड़ाकू विमान भी हैं, और वह फ्रांस से राफेल भी खरीद रहा है, जो 4.5वीं पीढ़ी के विमान माने जाते हैं। 

चीन ने यूएई के साथ किया संयुक्त हवाई अभ्यास 
चीन को इस बात की जानकारी थी कि यूएई की अमेरिका के साथ एफ-35 लड़ाकू विमान बेचने की डील खत्म हो चुकी है। चीन ने यूएई को पहली बार संयुक्त हवाई अभ्यास का ऑफर दिया। चीन जानता था कि यूएई की सेना में शामिल 90 फीसदी हथियार अमेरिकी हैं। फाल्कन शील्ड 2023 नाम का यह अभ्यास चीन के उत्तर-पश्चिमी शिनजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र में हुआ। इस अभ्यास के दौरान चीन ने यूएई के सामने अपने ट्विनजेट ऑल-वेदर स्टील्थ लड़ाकू विमान चेंगदू जे-20 का प्रदर्शन किया, जिसकी खूबियों से यूएई प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। चीन की कंपनी चेंगदू एयरोस्पेस कॉर्पोरेशन ने चीन की वायुसेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स (PLAAF) के लिए चेंगदू जे-20 को बनाया है। 

 

यूएई कमांडर बीजिंग दौरे के दौरान PLAAF कमांडर से मुलाकात करते हुए।
यूएई कमांडर बीजिंग दौरे के दौरान PLAAF कमांडर से मुलाकात करते हुए। - फोटो : MOD UAE

यूएई के कमांडर ने किया चीन का दौरा
वहीं अमेरिका ने भी नहीं सोचा होगा कि पश्चिम एशिया में उसका सबसे पुराना वफादार दोस्त संयुक्त अरब अमीरात उसे इस तरह धोखा देकर चीन से डील कर लेगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक 23 अप्रैल को, चेंगदू जे-20 लड़ाकू विमान के सौदे को लेकर संयुक्त अरब अमीरात के कमांडर मेजर जनरल सालेह मोहम्मद बिन मजरेन अल अमेरी ने बीजिंग का दौरा किया था और चीन पीपुल्स लिबरेशन आर्मी-एयर फोर्स (PLAAF) कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल चांग डिंगकिउ से मुलाकात की। माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच इस सौदे को लेकर जल्द ही अंतिम रूप दिया जा सकता है। वही अगर यह सौदा होता है, तो पश्चिम एशिया में अरब देशों पर अमेरिका के प्रभाव को लेकर भी सवाल खड़े होंगे।  

अमेरिका अपने मूड से चलाता है डिप्लोमेसी
प्रोफेसर रिजवान का कहना है कि यूएई के इस रुख लिए अमेरिका की नीतियां जिम्मेदार हैं। अमेरिका और खाड़ी देशों के संबंध प्रभावित हो सकते हैं। यूएई की तर्ज पर बाकी अमेरिकी मित्र देश भी ऐसे ही कदम उठा सकते हैं। कुल मिला कर अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती है। वह कहते हैं कि अमेरिका को भी अपनी नीतियों में बदलाव लाना चाहिए। उसके मूड के मुताबिक डिप्लोमेसी नहीं चलती। कभी वह किसी देश को अपना दोस्त बना लेता है, तो कभी उसे अपना दुश्मन मान लेता है, जो अमेरिका से संबंध बनाने का बड़ा रिस्क है। अगर किसी देश से संबंध खराब हो जाएं तो वह खुद के दिए हथियारों के इस्तेमाल पर रोक लगा देता है। यहां तक कि 'मानवाधिकार और लोकतांत्रिक' मुद्दों का हवाला देकर संबंधों को ताक पर रख देता है। यही वजह है कि अमेरिका की जियो-पॉलिटिक्स पश्चिम एशिया में बिगड़ने लगी है। 1,000 से अधिक अमेरिकी कंपनियां संयुक्त अरब अमीरात में काम करती हैं, और कई अन्य इसे मध्य-पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और एशिया के कुछ हिस्सों में व्यापार करने के लिए यूएई को क्षेत्रीय मुख्यालय के तौर पर उपयोग करती हैं। 1974 से अमेरिकी राजनयिक यूएई में है और अमेरिका यहां से बैठ कर पूरे खाड़ी क्षेत्र पर नजर रखता है।

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