क्या है हांगकांग पर थोपा गया चीन का नया कानून, जिसके विरोध मे हैं अमेरिका समेत कई देश
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- चीन की संसद में सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को मंजूरी
- नए कानून से हांगकांग की स्वायत्ता खतरे में हो सकती है
- अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा ने कानून का किया विरोध
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विस्तार
चीन की संसद में नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने हांगकांग पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब इस विधेयक को चीन के वरिष्ठ नेतृत्व के पास भेजा जाएगा। इस नए कानून के लागू हो जाने से हांगकांग अपनी स्वायत्ता खो सकता है और हांगकांग का विशेष दर्जा खत्म हो जाएगा।
साल 1997 में ब्रिटेन ने जब हांगकांग चीन को सौंपा था तब कुछ कथित कानून बनाए गए जिसके तहत हांगकांग में कुछ खास तरह की आजादी थी जो आम चीनी लोगों को हासिल नहीं है। चीन का यह प्रस्ताव इतना विवादित है कि संसद से मंजूरी मिलने के बाद दुनियाभर में कई देश चीन के खिलाफ बोलते नजर आ रहे हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि अगर यह कानून लागू हो जाएगा तो अमेरिका और हांगकांग के बीच होने वाले विशेष व्यापार का अंत हो सकता है। विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा कि प्रशासन का ऐसा मानना है कि चीन के कानून लागू होने के बाद हांगकांग अपनी स्वतंत्रता खो देगा।
इस नए कानून के खिलाफ हांगकांग में काफी पहले से विरोध प्रदर्शन चल रहा है। इससे पहले बुधवार को सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों के बीच कई झड़पें हुई। बुधवार के दिन हांगकांग में सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया और 24 मई के दिन भी हांगकांग में प्रदर्शन जारी था।
चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने प्रदर्शनकारियों को भरोसा दिलाते हुए कहा कि बुनियादी कानून के तहत जो आजादी और कानूनी हक दिए गए है उससे हांगकांग के लोगों पर खासा असर नहीं पड़ेगा। ये कानून एक देश, दो सिस्टम वाली व्यवस्था को बरकरार रखने में मदद करेगा।
पिछले कुछ दिनों से चीन के नए कानून और हांगकांग की स्वायत्ता को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। कहीं विरोध प्रदर्शन तो कहीं आंसू गैस के गोले दागे जा रहे हैं। आखिर हांगकांग का मुद्दा आजकल क्यों इतना गर्माया हुआ है, ये जानने के लिए समझते हैं कि इस कानून का असर हांगकांग पर कितना पड़ेगा...
हांगकांग की स्वायत्ता
दो दशक पहले हांगकांग की स्वायतत्ता को लेकर चीन-ब्रिटेन ने एक साझा बयान जारी किया था जिसमें चीन की योजना को ऐतिहासिक ज्वाइंट डिक्लेरेशन का खुला उल्लंघन बताया गया है।
इस पर चीन ने चीन के विदेश मंत्री ने कहा कि हांगकांग की घटनाएं चीन का आंतरिक मामला हैं। वैश्विक संबंधों के तहत दूसरों के घरेलू मामलों में दखलंदाज़ी नहीं की जाती है। चीन ये बात स्पष्ट कर देना चाहता है।
चीन ने हांगकांग को लेकर उस समय राजनीतिक धमाका किया जब उसने कहा कि वो इस शहर में एक नया सुरक्षा कानून लागू करने जा रहा है। कई लोगों को ऐसा लगता है कि चीन के इस कानून से हांगकांग के लोगों की आज़ादी खत्म हो जाएगी जो आम चीनी लोगों को नहीं मिलती है।
चीन का नया कानून क्या कहता है?
चीन के इस नए कानून को लेकर ज्यादा जानकारी तो नहीं है लेकिन अभी तक जितनी जानकारी सामने आई है उसस पता चलता है कि देश से रिश्ता तोड़ना, केंद्रीय सरकार की सत्ता या अधिकार को कमज़ोर करना अपराध माना जाएगा।
लोगों को डराना धमकाना या उनके खिलाफ हिंसा का इस्तेमाल आतंकवाद के अपराध के तहत आएगा। हांगकांग के मामलों में दखलंदाजी करने वाली विदेशी ताकतों की गतिविधियां भी अपराध की श्रेणी में आएंगी।
प्रस्तावित कानून के जिस प्रावधान को लेकर लोग ज्यादा चिंतित हैं, वो ये है कि चीन हांगकांग में ऐसी एजेंसियों का गठन कर सकता है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होंगी यानि कि हांगकांग में चीन अपना कानून लागू करने वाली एजेंसी बनाएगा।
नए कानून को लागू करने के पीछे क्यों पड़ा है चीन?
साल 1997 में हांगकांग ब्रिटेन से निकलकर चीन के हाथों में आया था लेकिन इसके लिए दोनों देशों के बीच एक अनूठा समझौता हुआ था। हांगकांग के लिए एक छोटे से संविधान की नींव रखी गई थी जिसे 'बेसिक लॉ' यानि बुनियादी कानून भी कहते हैं।
इसी के साथ ही चीन में 'एक देश, दो सिस्टम' की कथित अवधारणा का जन्म हुआ। ऐसा माना जाता है कि इस बुनियादी कानून की वजह से हांगकांग के लोगों को खास मुद्दों पर आज़ादी मिलेगी। वे जनसभा कर सकेंगे, उन्हें अपनी बात कहने और रखने का हक होगा और वहां एक स्वतंत्र न्यायपालिका होगी।
इसके अलावा कुछ ऐसे लोकतांत्रिक अधिकार भी होंगे जो आम चीनी लोगों के पास नहीं है। इसी समझौते के तहत हांगकांग को अपना राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू करने का हक भी हासिल है। 'बुनियादी कानून' के अनुच्छेद 23 में इसके लिए प्रावधान किया गया है।
काफी अलोकप्रिय होने की वजह से इस कानून को कभी इस्तेमाल ही नहीं किया गया। सरकार ने एक बार पहले भी साल 2003 में कोशिश की थी, लेकिन तब पांच लाख लोग सड़कों पर उतर आए थे और सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा था।
पिछले साल एक प्रत्यर्पण क़ानून को लेकर भी महीनों विरोध प्रदर्शन हुए और हिंसा भड़क गई थी। आगे चलकर इस विरोध प्रदर्शन ने भी चीन विरोधी और लोकतंत्र समर्थक स्वरूप ले लिया था। इसलिए चीन नहीं चाहता कि वहां दोबारा ऐसा हो।
हांगकांग का अंब्रेला आंदोलन
ऐसा पहली बारल नहीं है कि हांगकांग में इतने बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हो। इससे पहले भी ऐसी ही भीड़ हांगकांग की सड़कों पर उतर चुकी है। साल 2014 में हुए 'अंब्रेला आंदोलन' में कुछ हज़ार लोग सड़कों पर उतरे थे लेकिन यह नाकाम हो गया था क्योंकि इसे नागरिकों के बड़े वर्ग का समर्थन नहीं मिला था।
ऐसा बताया जाता है कि साल 2014 का 'अंब्रेला आंदोलन' भी लोकतंत्र के बचाव के नाम पर किया गया था। इस बार प्रत्यर्पण कानून मसौदे के खिलाफ हुए आंदोलन को भी 'प्रो डेमोक्रेसी' कहा गया है।
अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया ने किया विरोध
अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने कहा कि हांगकांग आज़ादी के गढ़ के तौर पर फला-फूला है। अपने संयुक्त बयान में इन देशों ने कहा कि हांगकांग की संपन्नता और स्थिरता में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की अहम भूमिका रही है।
बयान में कहा गया है कि महामारी के दौरान हांगकांग में चीन के नए सुरक्षा कानून से सरकार में और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को लेकर भरोसा कम हुआ है। हालांकि चीन ने विदेशी आलोचनाओं को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
बुधवार को अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा था कि हांगकांग में जो कुछ भी चीन की ओर से किया जा रहा है उससे साफ है कि यहां स्वायतत्ता जैसी अब कोई बात नहीं रही। पॉम्पियो ने कहा कि इससे हांगकांग की जो ट्रेड हब की पहचान है वो प्रभावित होगी।
इधर ब्रिटेन ने गुरुवार को कहा कि अगर चीन विवादित सुरक्षा कानून निलंबित नहीं करता है तो हांगकांग में तीन लाख रह रहे ब्रिटिश नागरिकों के वीजा का विस्तार किया जाएगा और इससे भविष्य में नागरिकता के लिए भी राह खुलेगी।
इन देशों ने संयुक्त बयान में यह भी कहा कि चीन के नए सुरक्षा कानून से हांगकांग में विभाजन बढ़ेगा और चीन के साथ यहां के लोगों का टकराव भी बढ़ेगा। अमेरिका और सहयोगी देशों ने चीन से अपील की है कि वो हांगकांग से बातचीत करें और लोकतंत्र के साथ स्थिरता को सुनिश्चित करें।
इन चार देशों के अलावा जापान ने भी कहा है कि उसका हांगकांग के साथ अहम साझेदारी है और यहां लोकतंत्र बहाल होना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि इस नए कानून के मुताबिक अगर कोई चीन की आलोचना करेगा तो उन्हें अपराधी के तौर पर देखा जाएगा।
हांगकांग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- 1842 में चीन के प्रथम अफीम युद्ध हारने के बाद चीन ने ब्रिटिश साम्राज्य को हांगकांग सौंप दिया था, जिसके बाद हांगकांग (एक अलग भू-भाग) का अस्तित्व सामने आया।
- लगभग छह दशक के दौरान चीन के लगभग 235 द्वीप भी ब्रिटेन के कब्जे में आ गए और हांगकांग अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र बन गया।
- 20वीं सदी की शुरुआत में यहां भारी संख्या में शरणार्थी आए जिनमें से चीनी लोगों की संख्या सबसे ज्यादा थी।
- बड़ी संख्या में प्रवासियों के आने से हांगकांग के लिये एक मुख्य विनिर्माण केंद्र के रूप में एक नई भूमिका निभाने में मदद की।
- चीन की अर्थव्यवस्था और भौगोलिक स्थिति के प्रभाव के कारण हांगकांग सेवा-आधारित अर्थव्यवस्था के साथ-साथ दुनिया के सबसे बड़े बाजारों के लिये एक महत्त्वपूर्ण प्रवेश द्वार बन गया है।
- 1997 तक हांगकांग ब्रिटिश साम्राज्य के नियंत्रण में था।
- 'एक देश, दो व्यवस्था' के तहत हांगकांग एक जुलाई, 1997 को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का एक विशेष प्रशासनिक क्षेत्र बन गया।
- इस व्यवस्था से शहर को अपनी पूंजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने के लिये स्वायत्तता, स्वतंत्र न्यायपालिका और कानून का शासन, मुक्त व्यापार एवं बोलने की स्वतंत्रता आदि की अनुमति मिलती है।