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तालिबान को लेकर अंदेशों और उम्मीद के बीच डूब-उतरा रहा है चीन, 'दोस्त' के बयान से कितनी मिलेगी राहत

Tue, 13 Jul 2021 02:44 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 13 Jul 2021 02:44 PM IST
सार

चीन और रूस दूसरे देशों के मामलों में दखल न देने की नीति पर चलते हैं, लेकिन अफगानिस्तान के मामले में वे सभी संबंधित पक्षों के साथ तालमेल बनाने की कोशिश करेंगे, ताकि अफगान समस्या का शांतिपूर्ण हल निकल सके...

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China fears that Muslim extremists may infiltrate Xinjiang via the Wakhan Corridor after the Taliban seize power in Kabul
वांग यी अफगानिस्तान के विदेश मंत्री के साथ - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

चीन अफगानिस्तान में तेजी से बदल रहे हालात से चिंतित है। ये बात खुद चीन के मीडिया में स्वीकार की जाने लगी है। चीन की चिंता अपने मुस्लिम बहुल शिनजियांग प्रांत को लेकर है। इसकी सीमा अफगानिस्तान से लगती है। चीन को अंदेशा है कि काबुल की सत्ता पर तालिबान के काबिज होने के बाद मुस्लिम चरमपंथी वाखान गलियारे से होते हुए शिनजियांग में घुसपैठ कर सकते हैं। हालांकि चीन को ये उम्मीद भी है कि तालिबान अब पहले जैसा नहीं रहा है। उसकी दिलचस्पी अब अफगानिस्तान में स्थिरता लाने और शासन करने में है। इसलिए तालिबान के इस बयान को यहां काफी अहमियत दी गई है कि तालिबान चीन को अपना दोस्त मानता है।

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चीन के विदेश मंत्री वांग यी इस समय मध्य एशिया की यात्रा पर हैं। शंघाई सहयोग संगठन की अफगान मामले पर विशेष बैठक में भाग लेने के साथ वे तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान की यात्रा करेंगे। शंघाई सहयोग संगठन की इस बैठक को चीन की पहल पर विदेश मंत्री स्तर का किया गया। सामान्य रूप से इस संगठन के अफगानिस्तान कॉन्टैक्ट ग्रुप की बैठक अधिकारियों के स्तर पर होती है।
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चीन के सरकार समर्थक अखबार ग्लोबल टाइम्स में छपी एक टिप्पणी में कहा गया है कि हालांकि चीन और रूस दूसरे देशों के मामलों में दखल न देने की नीति पर चलते हैं, लेकिन अफगानिस्तान के मामले में वे सभी संबंधित पक्षों के साथ तालमेल बनाने की कोशिश करेंगे, ताकि अफगान समस्या का शांतिपूर्ण हल निकल सके। सिंगहुआ यूनिवर्सिटी में नेशनल स्ट्रेटेजी इंस्टीट्यूट के निदेशक चियान फेंग ने ग्लोबल टाइम्स से बातचीत में ध्यान दिलाया है कि शिनजियांग की सीमा 90 किलोमीटर तक अफगानिस्तान से मिलती है। उन्होंने कहा कि चीन आसानी से इस इलाके को ब्लॉक कर सकता है। उधर, चीन की लानझाऊ यूनिवर्सिटी में सुरक्षा विशेषज्ञ काओ वेई ने इस अखबार से बातचीत में कहा कि अब तालिबान वह नहीं है, जो 20 साल पहले था। उन्होंने ध्यान दिलाया कि तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने एक इंटरव्यू में कहा कि तालिबान को उम्मीद है कि चीन अफगानिस्तान के निर्माण कार्यों में निवेश करेगा।
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कुछ दूसरे चीनी विश्लेषकों ने भी कहा है कि तालिबान अब एक सामान्य राजनीतिक संगठन के रूप में सामने आ रहा है। उसका ध्यान अफगानिस्तान के अंदरूनी हालात पर है। लेकिन काओ वेई ने कहा कि यह सिर्फ समय आने पर ही साबित होगा कि तालिबान जो कह रहा है, उसकी करनी भी वैसी ही रहेगी या नहीं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि चीन अफगानिस्तान में तालिबान के शासन के लिए खुद को तैयार कर रहा है। यहां इस अमेरिकी खुफिया आकलन को गंभीरता से लिया गया है कि अमेरिकी फौज की वापसी पूरी होने के छह अंदर ही तालिबान का काबुल की सत्ता पर कब्जा हो सकता है।


जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि अफगानिस्तान में बिगड़ रही स्थिति का असर अभी से अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों पर पड़ने लगा है। अफगान की सरकारी सेना के सैकड़ों जवान पिछले दिनों भाग कर ताजिकिस्तान चले गए। तब ताजिकिस्तान ने रूस के नेतृत्व वाले सैनिक गठजोड़ से मदद मांगी। चीन का आकलन है कि अफगानिस्तान में उभर रही सूरत से रूस पर चीन की तुलना में ज्यादा दबाव पड़ेगा। मुमकिन है कि तालिबान के मजबूत होने के बाद इस्लामी चरमपंथी कॉकेसस क्षेत्र और रूस के चेचन्या प्रांत तक फैल जाएं।

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