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China-Tibet: तिब्बत पर चीन की तिरछी नजर, लारुंग गार बौद्ध अकादमी में सैकड़ों सैनिक तैनात; जानिए पूरा मामला

Sat, 28 Dec 2024 03:43 PM IST
पवन पांडेय वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: पवन पांडेय Updated Sat, 28 Dec 2024 03:43 PM IST
सार

1980 में स्थापित, लारुंग गार तिब्बती बौद्ध शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, जो हजारों भिक्षुओं और भिक्षुणियों को आकर्षित करता है। हालांकि, अकादमी को अक्सर चीनी अधिकारियों की तरफ से निशाना बनाया जाता रहा है। 2001 में और फिर 2016 और 2017 के बीच बड़ी कार्रवाई हुई, जिसके दौरान हजारों आवासीय संरचनाओं को ध्वस्त कर दिया गया।

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China deploys hundreds of troops to Larung Gar, intensifies religious crackdown in Tibet
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI

विस्तार

केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के सबसे बड़े तिब्बती बौद्ध अध्ययन केंद्र के रूप में पहचाने जाने वाले लारुंग गार बौद्ध अकादमी में चीनी सैन्यकर्मियों में काफी बढ़ोतरी देखी गई है, जो धार्मिक प्रथाओं पर गहन निगरानी और सख्त नियमों को दर्शाता है। सीटीए ने 20 दिसंबर को बताया कि तिब्बती खाम क्षेत्र में मौजूद करजे (चीनी: गंजी) के सेरथर काउंटी में अकादमी में लगभग 400 चीनी सैन्य कर्मियों को तैनात किया गया था, जो अब सिचुआन प्रांत का हिस्सा है। इस तैनाती के साथ हेलीकॉप्टर निगरानी भी की गई, जो महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल की बढ़ी हुई निगरानी का संकेत है।
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नए साल से तमाम नियम लागू करने की फिराक में चीन
सूत्रों के अनुसार, चीनी अधिकारी 2025 में लारुंग गार में नए नियम लागू करने की योजना बना रहे हैं। इनमें वहां रहने की अधिकतम समय 15 वर्ष तक सीमित करना और सभी भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए अनिवार्य पंजीकरण लागू करना शामिल है। इसके अलावा, सरकार का लक्ष्य अकादमी में धार्मिक चिकित्सकों की संख्या को कम करना है, रिपोर्टों में कहा गया है कि चीनी छात्रों को संस्थान छोड़ने का निर्देश दिया जा रहा है।
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बौद्ध शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है लारुंग गार
1980 में स्थापित, लारुंग गार तिब्बती बौद्ध शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, जो हजारों भिक्षुओं और भिक्षुणियों को आकर्षित करता है। हालांकि, अकादमी को अक्सर चीनी अधिकारियों की तरफ से निशाना बनाया जाता रहा है। 2001 में और फिर 2016 और 2017 के बीच बड़ी कार्रवाई हुई, जिसके दौरान हजारों आवासीय संरचनाओं को ध्वस्त कर दिया गया और चिकित्सकों को जबरन बेदखल कर दिया गया। सीटीए ने बताया कि इन कार्रवाइयों ने लारुंग गार की आबादी को आधा कर दिया, जो लगभग 10,000 से घटकर वर्तमान स्तर पर आ गई। 
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तिब्बत में बीजिंग के अभियान में बढ़ोतरी
हालिया सैन्य निर्माण और आसन्न नियम तिब्बत में धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करने के बीजिंग के अभियान में बढ़ोतरी को उजागर करते हैं। ये उपाय बौद्ध संस्थानों पर नियंत्रण रखने की व्यापक रणनीति के अनुरूप हैं, क्योंकि पारंपरिक प्रथाओं और शिक्षाओं को राज्य के बढ़ते हस्तक्षेप का सामना करना पड़ता है। तिब्बत का मुद्दा लंबे समय से विवाद का विषय बना हुआ है। सीटीए की रिपोर्ट के अनुसार, 1959 में एक बड़े विद्रोह के बाद दलाई लामा भारत चले गए, जहां उन्होंने निर्वासित तिब्बती सरकार की स्थापना की। जबकि चीन तिब्बत को अपने क्षेत्र का अविभाज्य हिस्सा मानता है, कई तिब्बती अधिक स्वायत्तता या स्वतंत्रता की मांग करना जारी रखते हैं।
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