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बैकफायर कर गई है चीन की वैक्सीन कूटनीति? टीके की सप्लाई में देरी पर कई देशों ने की शिकायत

Tue, 26 Jan 2021 03:47 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 26 Jan 2021 03:47 PM IST
सार

चीन से वैक्सीन लेने के लिए अब तक कम से कम 24 देश अनुबंध पर दस्तखत कर चुके हैं। इनमें ज्यादातर निम्न या मध्य आय श्रेणी वाले देश हैं। जबकि धनी देशों में ज्यादातर फाइजर या मॉर्डेना की वैक्सीन खरीदी जा रही हैं...

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China corona vaccine diplomacy has been backfired, Many countries complain about delaying in supply
Sinovac Vaccine - फोटो : Agency

विस्तार

पश्चिमी मीडिया में छप रही खबरों के मुताबिक चीन की कोरना वायरस के संक्रमण से रोकथाम का वैक्सीन बांटने की कूटनीति का उलटा असर हो रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक खबर के मुताबिक ब्राजील और टर्की ने उनके यहां वैक्सीन भेजने की धीमी रफ्तार को लेकर चीन से शिकायत दर्ज कराई है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन में बनी वैक्सीन अमेरिकी कंपनियों फाइजर और मॉर्डेना वैक्सीन जितनी प्रभावी नहीं है।

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चीन से वैक्सीन लेने के लिए अब तक कम से कम 24 देश अनुबंध पर दस्तखत कर चुके हैं। इनमें ज्यादातर निम्न या मध्य आय श्रेणी वाले देश हैं। जबकि धनी देशों में ज्यादातर फाइजर या मॉर्डेना की वैक्सीन खरीदी जा रही हैं। वैक्सीन सप्लाई में देरी अमेरिकी कंपनियों ने भी की है। इसलिए यूरोप के भी कई देशों ने चीनी और रूस के वैक्सीन का रुख किया है। इन देशों में सर्बिया भी है।
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चीनी अधिकारियों ने पश्चिमी मीडिया में छप रही खबरों को चीन के खिलाफ छेड़े गए अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के चीन विरोधी अभियान का हिस्सा बताया है। चीनी मीडिया ने अमेरिकी कंपनियों के वैक्सीन को लेकर उठ रहे सवालों की खबरें प्रमुखता से छापी है। फाइजर की वैक्सीन लगवाने के बाद जर्मनी और नॉर्वे में हुई लगभग दो दर्जन मौतों की खबर चीनी मीडिया में सुर्खियां बनीं। इस बारे में चीनी मीडिया ने ऐसे वीडियो साझा किए, जिनमें अमेरिकी कंपनियों के वैक्सीन लेने के बाद हुए दुष्प्रभावों को दिखाया गया।
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चीनी टीवी चैनल सीजीटीएन के एंकर लिउ शिन ने अपने एक ट्विट में पूछा है कि पश्चिमी मीडिया ने वैक्सीन लेने के बाद जर्मनी में हुई मौतों की खबरों की आगे पड़ताल क्यों नहीं की है। उनके इस ट्विट को चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने री-ट्विट किया। चाईनीज सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के प्रमुख जॉर्ज गाओ ने अमेरिकी कंपनियों की वैक्सीन की सुरक्षा पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि इन कंपनियों ने नए तरीके से वैक्सीन बनाई, जबकि चीनी कंपनियों ने पारंपरिक विधि से वैक्सीन तैयार की है।

लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलीपींस के कुछ सांसदों ने चीन से वैक्सीन खरीदने के सरकार के फैसले की आलोचना की है। उधर चीनी कंपनी साइनोवॉक से वैक्सीन खरीदने का अनुबंध करने के बाद मलेशिया और सिंगापुर के अधिकारियों को अपनी जनता को यह भरोसा देना पड़ा कि उन वैक्सीन को लगाने की मंजूरी तभी दी जाएगी, जब उनके सुरक्षित और प्रभावी होने की पुष्टि हो जाएगी। चीनी वैक्सीन की विशेषता यह बताई गई है कि इन्हें साधारण रेफ्रीजरेटर के तापमान पर रखा जा सकता है, जबकि फाइजर और मॉर्डेना की वैक्सीन को रखने के लिए अत्यंत निम्न तापमान की जरूरत पड़ती है। इसलिए चीनी वैक्सीन को लेकर विकासशील देशों में ज्यादा आकर्षण है। पाकिस्तान और फिलीपीन्स जैसे देशों को चीन ने वैक्सीन अनुदान के रूप में दिए हैं।


लेकिन पश्चिमी देशों ने चीन के वैक्सीन से संबंधित डाटा को जारी करने में देर की आलोचना की है। इसका वहां के लोगों पर गहरा असर हुआ है। इसी महीने ब्रिटिश पत्रिका द इकॉनमिस्ट से जुड़ी एजेंसी यूगोव के एक सर्वे में देखा गया कि लोगों ने सबसे ज्यादा संदेह चीनी वैक्सीन को लेकर जताए। ये सर्वे 17 देशों में हुआ और इस दौरान 19 हजार लोगों से बातचीत की गई। इससे यह साफ है कि पश्चिमी देशों में चीन के वैक्सीन को लेकर गहरा संदेह है। इसके बावजूद एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में इन वैक्सीन की बहुत मांग है। ये जरूर है कि इन वैक्सीन के वहां पहुंचने की रफ्तार धीमी है, जिससे वहां असंतोष पैदा हुआ है।

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