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चीन में धार्मिक पुनरुत्थान का दौर: बढ़ रही है बौद्ध, ईसाई और ताओ धर्म मानने वालों की संख्या

Mon, 09 Aug 2021 04:47 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 09 Aug 2021 04:47 PM IST
सार

विश्लेषकों का कहना है कि अब जबकि कम्युनिस्ट पार्टी अपनी स्थापना की 100 सालगिरह मना रही है, तब वह दुनिया के सामने पूरे चीन की एकजुटता दिखाने की कोशिश में है। इसी प्रयास में सभी धर्मावलंबियों को साथ जोड़ने की कोशिश हो रही है...

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Buddhists, Christians and Taoists followers are increasing in china
चीन - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने देश के परंपरागत धार्मिक पंथों के प्रति सहनशीलता की नीति को और आगे बढ़ाने का संकेत दिया है। जबकि कम्युनिस्ट शासन के शुरुआती दशकों में तमाम परंपरागत धर्मों को देश के सामंती इतिहास का हिस्सा बता कर उन पर लगाम कसने की कोशिश की गई थी। विश्लेषकों का कहना है कि हालांकि 1970 के दशक के आखिरी वर्षों में ही चीन सरकार ने धर्मों के खिलाफ अपनी नीति को नरम बना दिया था, लेकिन हाल में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता शी जिनपिंग ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति पर नए सिरे से जोर देना शुरू किया है।

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ऑस्ट्रेलियाई वेबसाइट कन्वर्सेशन.कॉम में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक नास्तिकता अभी भी कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा का हिस्सा है। पार्टी के सदस्यों पर किसी धर्म का पालन करने पर रोक है। लेकिन अब गुजरे समय की तरह सबको नास्तिक बनाने की कोशिश छोड़ दी गई है। ये कोशिश 1966 से 1976 की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान अपने चरम पर पहुंच गई थी। उस दौरान सभी मंदिरों और चर्च को बंद करवा दिया गया था। साथ ही उस दौर में किसी प्रकार की धार्मिक गतिविधि पर प्रतिबंध था।
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लेकिन अब जगह-जगह पर नए मंदिर और बौद्ध संघों की स्थापना हो रही है। धार्मिक उत्सव भी मनाए जा रहे हैं। बौद्ध, ईसाई और ताओ धर्म को मानने वाले लोगों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है। कई धार्मिक स्थलों को तीर्थ के लिए खोल दिया गया है। वहां अब बड़ी संख्या में लोग जाते हैं। स्थानीय सरकारें पर्यटन और आर्थिक विकास के मकसद से भी धार्मिक तीर्थ को बढ़ावा दे रही हैं।

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ऐसा लगता है कि चीन के लोगों को ये नीति पसंद आ रही है। अमेरिकी सर्वे एजेंसी पिउ रिसर्च सेंटर के एक सर्वे से सामने आया है कि चीन की 48.2 फीसदी आबादी किसी ना किसी धर्म में आस्था रखती है। चीनी इतिहास के जानकारों के मुताबिक चीन में प्राचीन काल से ज्यादातर लोग किसी एक खास धर्म का पालन नहीं करते थे। बल्कि वे विभिन्न प्रकार की आस्थाओं और धार्मिक प्रथाओं के साथ जीते थे। ऐसे लोग बड़ी संख्या में थे, जो एक साथ बौद्ध, कॉन्फ्यूशियस और ताओ पंथ का पालन करते थे। चीन के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग तरह की प्रथाएं थीं।

बीती सदी में कम्युनिस्ट पार्टी प्राचीन दार्शनिक कंफ्यूशियस की शिक्षाओं की कड़ी आलोचक थी। लेकिन अब पार्टी ने ये आलोचना छोड़ दी है। इससे हाल में कंफ्यूशियस की शिक्षाओं को मानने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। खबरों के मुताबिक अब खुद सरकार कंफ्यूशियस के मंदिरों और उनसे जुड़े संस्थानों की स्थापना में मदद कर रही है। कंप्यूशियस की शिक्षाओं पर आयोजित समारोहों को उसने प्रायोजित भी किया है।

ये नया बदलाव है। अभी 2015 में चीन सराकर ने लगभग 1,200 चर्चों पर से क्रॉस हटवा दिए थे। तब झेजियांग प्रांत में एक क्रॉस हटाने का विरोध करने वाले एक पादरी को 14 साल की कैद सुनाई गई थी। 2018 में शांक्सी प्रांत में एक चर्च तोड़ने की घटना हुई थी। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि अब जबकि कम्युनिस्ट पार्टी अपनी स्थापना की 100 सालगिरह मना रही है, तब वह दुनिया के सामने पूरे चीन की एकजुटता दिखाने की कोशिश में है। इसी प्रयास में सभी धर्मावलंबियों को साथ जोड़ने की कोशिश हो रही है। विश्लेषकों का कहना है कि इससे देश में धार्मिक पुनरुत्थान का दौर शुरू हो गया है।

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