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Myanmar: म्यांमार के सैनिक शासकों की बेरहमी, तूफान पीड़ितों के लिए यूएन की मदद रोकी

Thu, 15 Jun 2023 02:22 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यंगून
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यंगून Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 15 Jun 2023 02:22 PM IST
सार

म्यांमार के सैनिक शासन ने अपने ताजा फैसले का कारण नहीं बताया है। लेकिन समझा जाता है कि सैनिक शासक अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियों पर भरोसा नहीं करते। इसलिए उन्होंने इन एजेंसियों की अपनी देश में पहुंच को रोकने की कोशिश की है...

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brutality of the military rulers of Myanmar, stopped United nations help for the storm victims
म्यांमार जनरल मिन आंग हलिंग - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

म्यांमार के सैनिक शासक अब प्राकृतिक आपदा से पीड़ितों को मिलने वाली विदेशी सहायता भी रोकने लगे हैं। उन्होंने पिछले दिनों आए चक्रवात मोचा के पीड़ितों के लिए संयुक्त राष्ट्र की सहायता रोक दी है। संयुक्त राष्ट्र सहायता एजेंसी ने मंगलवार को थाइलैंड की राजधानी बैंकाक में यह जानकरी दी। उसने बताया कि म्यांमार में इस समय दस लाख से अधिक लोगों को मानवीय सहायता की तुरंत जरूरत है। म्यांमार सरकार के ताजा फैसले से उन लोगों की मुसीबत और बढ़ेगी।

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म्यांमार के सैनिक शासन ने अपने ताजा फैसले का कारण नहीं बताया है। लेकिन समझा जाता है कि सैनिक शासक अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियों पर भरोसा नहीं करते। इसलिए उन्होंने इन एजेंसियों की अपनी देश में पहुंच को रोकने की कोशिश की है। म्यांमार में फरवरी 2021 में सेना ने निर्वाचित जन प्रतिनिधियों का तख्ता पलट कर देश की सत्ता पर कब्जा जमा लिया था।

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संयुक्त राष्ट्र की मानवीय सहायता एजेंसी के समन्वयक रामनाथन बालाकृष्ण ने एक बयान में कहा है- ‘मैं म्यांमार सरकार से अपील करता हूं कि वह अपने इस फैसले पर तुरंत पुनर्विचार करे और सहायता पहुंचाने के लिए पहले दी गई अनुमति को बहाल कर दे। हम उन लोगों को मदद पहुंचाने के लिए तैयार हैं, जिन्हें इनकी बेहद जरूरत है।’

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म्यांमार में पिछले 14 मई को मोचा चक्रवात आया था। खासकर रखाइन प्रांत में इससे बड़ी तबाही हुई। समुद्र में उठी ऊंची लहरों और भारी बारिश के कारण इस प्रांत के कई इलाकों में बाढ़ आ गई। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक चक्रवात के कारण कम से कम 148 लोगों की जान गई थी। उनमें से 80 फीसदी रोहिंग्या मुसलमान थे। इसी इलाके में रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं। म्यांमार की सेना पर आरोप है कि वह रोहिंग्या समुदाय के उत्पीड़न में शामिल रही है।

चक्रवात से तबाही की खबर मिलने के तुरंत बाद संयुक्त राष्ट्र की सहायता और शरणार्थी एजेंसियों ने राहत कार्य की शुरुआत की। इसके लिए राहत सामग्रियों को इकट्ठा किया गया। सहायता एजेंसियों के अधिकारियों के पास म्यांमार जाने के लिए जरूरी दस्तावेज पहले से मौजूद थे। लेकिन इस महीने सैनिक शासकों ने यात्रा अनुमति को वापस ले लिया। उन्होंने कहा कि अनुमति दोबारा देने के पहले म्यांमार की आपदा प्रबंधन समिति विदेशी एजेंसियों की गतिविधियों की समीक्षा करेगी।

खबरों के मुताबिक चक्रवात से प्रभावित हुए एक लाख दस हजार से अधिक लोग अलग-अलग जगहों पर राहत शिविरों में हैं। बालाकृष्णन ने अपने बयान में बताया कि संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां रखाइन प्रांत में तीन लाख लोगों को खाद्य सहायता पहुंचा चुकी हैं। उधर म्यांमार सरकार के एक अधिकारी ने एक रेडियो चैनल से कहा कि हर प्रकार की विदेशी सहायता पर रोक नहीं लगाई गई है। सिर्फ यह नियम लागू किया गया है कि सहायता से जुड़े कर्मियों को पीड़ित इलाकों में जाने के पहले पूर्व अनुमति लेनी होगी। उधर म्यांमार की एक स्वतंत्र न्यूज एजेंसी म्यांमार नॉव ने कहा है कि सैनिक शासकों को शक है कि संयुक्त राष्ट्र की मदद उन विद्रोही ताकतों के हाथ में पहुंच सकती है, जिन्होंने सैनिक शासन के खिलाफ गृह युद्ध छेड़ रखा है।

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