{"_id":"698912ead0e952400106465a","slug":"brain-study-research-14-percent-of-people-cannot-form-mental-images-giving-neuroscience-a-new-way-2026-02-09","type":"story","status":"publish","title_hn":"Brain Study: दिमाग में तस्वीर नहीं बना पाते 14 प्रतिशत लोग, न्यूरोसाइंस को ऐसे मिलेगी नई राह","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
Brain Study: दिमाग में तस्वीर नहीं बना पाते 14 प्रतिशत लोग, न्यूरोसाइंस को ऐसे मिलेगी नई राह
Mon, 09 Feb 2026 04:19 AM IST
हिमांशु चंदेल
अमर उजाला नेटवर्क, सिडनी
अमर उजाला नेटवर्क, सिडनी
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Mon, 09 Feb 2026 04:19 AM IST
सार
वैज्ञानिकों के अनुसार करीब 14 प्रतिशत लोग मन में कोई दृश्य तस्वीर नहीं बना पाते, इस स्थिति को अफैंटेसिया कहा जाता है। ऐसे लोग चीजों को समझते और याद रखते हैं, लेकिन उन्हें मानसिक रूप से देख नहीं पाते। ब्रेन स्कैन और शोध से पता चला कि कल्पना और वास्तविक देखने की तंत्रिकीय प्रक्रिया अलग है। आइए इस शोध के बारे में विस्तार से जानते हैं।
विज्ञापन
14 प्रतिशत लोग मन में नहीं बनाते तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
किसी हरे-भरे पार्क, खुले मैदान या किसी अपने बेहद प्रिय व्यक्ति के चेहरे के बारे में सोचिए। क्या आप उसे अपने दिमाग में साफ-साफ देख पा रहे हैं? अधिकांश लोग ऐसी तस्वीरें मन में बना लेते हैं। वे अतीत को देख सकते हैं और भविष्य की छवियां गढ़ सकते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि करीब 14% लोगों के लिए यह संभव नहीं है।
ये लोग किसी वस्तु की अवधारणा समझ सकते हैं, उससे जुड़े शब्द और विचार याद कर सकते हैं, लेकिन उनकी मस्तिष्क दृष्टि (माइंड्स आई) पूरी तरह अंधेरी या खाली रहती है। इस अवस्था को अफैंटेसिया कहा जाता है और यही अब न्यूरोसाइंस को चेतना की प्रकृति समझने का एक नया रास्ता दिखा रही है।
पांच साल से अफैंटेसिया से ग्रस्त लोगों के दिमाग पर शोधकर्ता अध्ययन कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी में सिस्टम्स न्यूरोसाइंटिस्ट मैक शाइन को पहली बार एहसास हुआ कि उनका मानसिक अनुभव दूसरों से अलग है। वे और उनके सहकर्मी हैल्यूसिनेशन के न्यूरल आधार पर चर्चा कर रहे थे, तभी उन्होंने कहा, जब मैं आंखें बंद करता हूं, वहां बिल्कुल कुछ नहीं होता।
विज्ञापन
अफैंटेसिया से हाइपरफैंटेसिया तक का क्रम
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की कॉग्निटिव न्यूरोसाइंटिस्ट जूलिया काबाई खुद हाइपरफैंटेसिया से ग्रस्त हैं यानी उनकी मानसिक छवियां बेहद जीवंत होती हैं। 2015 में अफैंटेसिया के बारे में जानकर वे हैरान रह गईं। उनके मुताबिक, जिन लोगों में पूरी तरह मानसिक छवियों का अभाव है, उनसे समझ सकते हैं कि कल्पना हमारी भावनाओं, ध्यान, स्मृति और धारणा को कैसे प्रभावित करती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा के न्यूरोलॉजिस्ट एडम जेमन ने 2003 में अफैंटेसिया पर काम शुरू किया। उन्होंने एक ऐसे मरीज को देखा, जिसकी मामूली हार्ट प्रोसीजर के बाद माइंड्स आई खत्म हो गई थी, जबकि उसकी सामान्य दृष्टि बनी रही। ब्रेन स्कैन में पाया गया कि तस्वीरें देखने पर उसका विजुअल कॉर्टेक्स सामान्य रूप से सक्रिय था, लेकिन कल्पना करने पर नहीं।
आनुवांशिकता की भी भूमिका
शोध से पता चला है कि अफैंटेसिया में काफी विविधता होती है। कई लोगों में सिर्फ दृश्य कल्पना नहीं होती, जबकि कुछ में अन्य इंद्रियों की कल्पना भी गायब रहती है। खास बात यह है कि कई पीडि़त सपनों में भी तस्वीरें नहीं देख पाते। इसमें आनुवंशिक तत्व भी दिखता है।
यदि किसी भाई-बहन में मस्तिष्क दृष्टि कमजोर है, तो दूसरे में अफैंटेसिया होने की संभावना दस गुना बढ़ जाती है। यह भी पाया गया है कि यह स्थिति कला पेशों की तुलना में वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्रों में काम करने वालों में अधिक दिखती है।
अन्य वीडियो-
विज्ञापन
ये लोग किसी वस्तु की अवधारणा समझ सकते हैं, उससे जुड़े शब्द और विचार याद कर सकते हैं, लेकिन उनकी मस्तिष्क दृष्टि (माइंड्स आई) पूरी तरह अंधेरी या खाली रहती है। इस अवस्था को अफैंटेसिया कहा जाता है और यही अब न्यूरोसाइंस को चेतना की प्रकृति समझने का एक नया रास्ता दिखा रही है।
विज्ञापन
पांच साल से अफैंटेसिया से ग्रस्त लोगों के दिमाग पर शोधकर्ता अध्ययन कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी में सिस्टम्स न्यूरोसाइंटिस्ट मैक शाइन को पहली बार एहसास हुआ कि उनका मानसिक अनुभव दूसरों से अलग है। वे और उनके सहकर्मी हैल्यूसिनेशन के न्यूरल आधार पर चर्चा कर रहे थे, तभी उन्होंने कहा, जब मैं आंखें बंद करता हूं, वहां बिल्कुल कुछ नहीं होता।
विज्ञापन
अफैंटेसिया से हाइपरफैंटेसिया तक का क्रम
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की कॉग्निटिव न्यूरोसाइंटिस्ट जूलिया काबाई खुद हाइपरफैंटेसिया से ग्रस्त हैं यानी उनकी मानसिक छवियां बेहद जीवंत होती हैं। 2015 में अफैंटेसिया के बारे में जानकर वे हैरान रह गईं। उनके मुताबिक, जिन लोगों में पूरी तरह मानसिक छवियों का अभाव है, उनसे समझ सकते हैं कि कल्पना हमारी भावनाओं, ध्यान, स्मृति और धारणा को कैसे प्रभावित करती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा के न्यूरोलॉजिस्ट एडम जेमन ने 2003 में अफैंटेसिया पर काम शुरू किया। उन्होंने एक ऐसे मरीज को देखा, जिसकी मामूली हार्ट प्रोसीजर के बाद माइंड्स आई खत्म हो गई थी, जबकि उसकी सामान्य दृष्टि बनी रही। ब्रेन स्कैन में पाया गया कि तस्वीरें देखने पर उसका विजुअल कॉर्टेक्स सामान्य रूप से सक्रिय था, लेकिन कल्पना करने पर नहीं।
आनुवांशिकता की भी भूमिका
शोध से पता चला है कि अफैंटेसिया में काफी विविधता होती है। कई लोगों में सिर्फ दृश्य कल्पना नहीं होती, जबकि कुछ में अन्य इंद्रियों की कल्पना भी गायब रहती है। खास बात यह है कि कई पीडि़त सपनों में भी तस्वीरें नहीं देख पाते। इसमें आनुवंशिक तत्व भी दिखता है।
यदि किसी भाई-बहन में मस्तिष्क दृष्टि कमजोर है, तो दूसरे में अफैंटेसिया होने की संभावना दस गुना बढ़ जाती है। यह भी पाया गया है कि यह स्थिति कला पेशों की तुलना में वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्रों में काम करने वालों में अधिक दिखती है।
अन्य वीडियो-
विज्ञापन
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन