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यूक्रेन संकट और अंतरराष्ट्रीय तनाव: क्या फ्रांस और जर्मनी की मध्यस्थता रोक सकेगी तीसरा विश्वयुद्ध होने से?

Dr. Mohammad Rizwan डॉ. मोहम्मद रिजवान
Updated Thu, 27 Jan 2022 03:16 PM IST
सार

22 वर्षों के कार्यकाल में पुतिन ने रूस को सैनिक व आर्थिक रूप से पुनः स्थापित करने का काम किया है और उनके लंबे व ताकतवर नेतृत्व ने रूसियों में फिर से आत्मविश्वास कायम कर दिया है। क्रीमिया पर अधिकार और सीरिया में अपने मित्र बशर-अल-असद के सशस्त्र विरोधियों पर बमबारी करवा कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उन्होंने अपनी अलग ही छवि स्थापित की जो पूर्व सोवियत राष्ट्रपतियों से मेल खाती है...

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Amidst the rising tension between Russia and Ukraine, both countries have agreed to ceasefire without any conditions
यूक्रेन और रूस के बीच तनाव - फोटो : Agency

विस्तार

रूस और यूक्रेन के बढते तनाव के बीच पेरिस से एक राहत भरी खबर यह आई है कि दोनों देश बिना किसी शर्त के सीजफायर के लिए राजी हो गए हैं। लेकिन इस बात की कई गारंटी नहीं है कि इससे तनाव खत्म होगा या नहीं, क्योंकि यह एक अस्थाई सीजफायर है। यह भी देखने वाली बात होगी कि मध्यस्थ बने फ्रांस और जर्मनी की बात को रूस कितनी अहमियत देगा। पुतिन जानते हैं कि अमेरिका के नेतृत्व में नाटो देश रूस के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं, अग उनका किसी तरह से मुकाबला कर भी ले, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर वह बाजी हार जाएंगे।      

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लावरोव और ब्लिंकन की वार्ता हो चुकी है फेल

हालांकि इस विषय पर 21 जनवरी 2022 को जेनेवा में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन व उनके रूसी समकक्ष सर्गेई लावरोव के मध्य हुई बातचीत का कोई सार्थक नतीजा नहीं निकल सका। मौजूदा समय में रूस ने यूक्रेन की सीमा पर एक लाख से अधिक फौज तैनात कर रखी है और वह लगातार अमेरिका पर यह दबाव बनाए हुए है कि रूसी फौजें तभी हटेंगी जब तक यूक्रेन व अन्य पूर्वी यूरोपीय देशों को नाटो में शामिल नहीं करने का आश्वासन नहीं मिल जाता।

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दूसरी ओर अमेरिका भी रूसी दबाव को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है, उसने नाटो के तमाम देशों को रूस के विरुद्ध संभावित युद्ध के लिए तैयार रहने को कह दिया है साथ ही यूक्रेन में अपने दूतावास कर्मियों को यूक्रेन छोड़ने के लिए चेतावनी भी जारी कर दी है। वास्तव में यूक्रेन के प्रश्न पर रूस और अमेरिका के वर्तमान टकराव ने अंतरराष्ट्रीय जगत में शीत युद्ध जैसा माहौल फिर से उत्पन्न कर दिया है और यूक्रेन को लेकर रूसी राष्ट्रपति के तेवर सोवियत राष्ट्रपतियों की याद दिलाते हैं। लेकिन वास्तव में यूक्रेन और रूसी सम्बन्धों में क्रीमिया का विषय लंबे समय से पूर्वी यूरोप में तनाव का कारण बना हुआ है,

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क्या है क्रीमिया का मामला?

यूक्रेन एक राज्य और क्रीमिया रूसी प्रांत के रूप में पहले सोवियत संघ का ही एक भाग हुआ करते थे 1956 में तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति निकिता ख्रुश्चेव ने रूसी बाहुल्य क्षेत्र क्रीमिया यूक्रेन को भेंट कर दिया, कालांतर में 1991 में जब सोवियत संघ का विखंडन हुआ तो यूक्रेन ने स्वयं को स्वाधीन राष्ट्र घोषित कर दिया। लेकिन असल समस्या तब शुरू हुई, जब 2014 में यूक्रेन के रूस समर्थक राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को अमेरिकी व पश्चिम समर्थित एक तख़्तापलट घटनाक्रम में देश छोड़कर रूस में शरण लेनी पड़ी, लेकिन रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने तत्काल यूक्रेन में हस्तक्षेप करते हुए क्रीमिया पर अधिकार कर लिया। उनका स्पष्ट संदेश था कि रूसी जनता बहुल्य व सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्रीमिया को रूस विरोधियों के हवाले नहीं किया जा सकता।


तभी से क्रीमिया यूक्रेन व रूस के मध्य तनाव का एक बड़ा कारण बना हुआ है और अमेरिका को इस क्षेत्र में हस्तक्षेप का एक बहाना मिल गया, वास्तव यूक्रेन के माध्यम से अपने लिए कई प्रकार से महत्वपूर्ण काले सागर में अमेरिका की स्थिति मजबूत करना वाशिंगटन की वरीयता रही है। लेकिन इस विषय पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बात किये बिना यह विषय पूरा नहीं हो सकता, अक्तूबर 1952 को जन्मे 69 वर्षीय व्लादिमीर पुतिन ने अनेक वर्षों तक रूसी ख़ुफ़िया एजेंसी के.जी.बी. में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया और वे पहली बार बोरिस येल्तसिन के समय 1999 मे कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाए गए थे। सन 2000 में उन्होंने पहली बार राष्ट्रपति चुनाव जीता और उसके बाद से वे लगातार रूसी राजनीति के केंद्र में कायम हैं, कुछ समय पहले पास किये गए एक कानून के मुताबिक अब व्लादिमीर पुतिन 2036 तक रूसी राष्ट्रपति के पद पर काबिज़ रहेंगे।

वास्तव में 22 वर्षों के कार्यकाल में पुतिन ने रूस को सैनिक व आर्थिक रूप से पुनः स्थापित करने का काम किया है और उनके लंबे व ताकतवर नेतृत्व ने रूसियों में फिर से आत्मविश्वास कायम कर दिया है। क्रीमिया पर अधिकार और सीरिया में अपने मित्र बशर-अल-असद के सशस्त्र विरोधियों पर बमबारी करवा कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उन्होंने अपनी अलग ही छवि स्थापित की जो पूर्व सोवियत राष्ट्रपतियों से मेल खाती है।

शीतयुद्ध की तरफ जा रहा है विश्व

पुतिन ने चीन को भी साधने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, हाल ही में अमेरिका ने 2022 में बीजिंग में अयोजित होने वाले विंटर ओलंपिक्स के राजनयिक बहिष्कार की घोषणा की है, जिसके लिए शिंजियांग और हांगकांग में मानवाधिकार दमन को कारण बताया गया है, जबकि इसके पीछे भी कहीं न कहीं यूक्रेन के विषय पर रूस को मिलने वाला चीनी समर्थन है, जबकि इस पर चीन ने अमेरिका के विरुद्ध तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

रूस व चीन की उत्तरोत्तर बढ़ती सैनिक व आर्थिक शक्ति व उनके मध्य बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तालमेल के आलोक में उपरोक्त अंतरराष्ट्रीय तनाव व संघर्ष की परिस्थितियां अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पुनः एक शीत युद्ध की ओर इशारा करती हैं और यदि ऐसा कुछ हुआ तो तकनीकी विकास के चरम पर बैठी मानव सभ्यता एक बार फिर से शीतयुद्ध कालीन तनाव, युद्ध के अनिश्चित भय व आतंक की परिस्थितियों में रहने को अभिशप्त होगी।



(लेखक मेरठ कॉलेज में रक्षा अध्ययन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है)

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