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भारत और अमरीका के चुनाव में पांच अंतर

Sat, 27 Oct 2012 03:43 PM IST
बीबीसी हिन्दी
बीबीसी हिन्दी Updated Sat, 27 Oct 2012 03:43 PM IST
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five differences between india and us election
बैंक ऑफ़ अमरीका, जेपी मॉर्गन चेज़, सिटीग्रुप और मॉर्गन स्टैनली अमरीका के बड़े बैंक हैं। लेकिन इनमें समानता क्या है?
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समानता ये है कि ये सभी कॉरपोरेट संस्थाएं अमरीकी राष्ट्रपति पद के चुनाव में राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रतिद्वंद्वी मिट रोमनी की समर्थक हैं। ये अमरीकी जनता के लिए कोई ढँकी-छिपी बात नहीं है। कॉरपोरेट से चुनावी चंदा लेना और उनका समर्थन हासिल करना अमरीकी चुनाव की पुरानी परंपरा है। ये प्रक्रिया पारदर्शी तो है ही साथ ही ये एक प्रमाणित सच भी है।

भारत में भी चुनाव लड़ने वाली पार्टियों और उम्मीदवारों को कॉरपोरेट जगत से पैसे मिलते हैं लेकिन ये अधिकतर गुप्त रूप से आते हैं। अमरीका और भारत विश्व के दो सबसे बड़े प्रजातंत्र हैं। इसीलिए चुनाव दोनों देशों में एक विशाल प्रक्रिया है। अगर भारत में मतदाता पार्टियों और पार्टियों के उम्मीदवारों को वोट देते हैं तो अमरीका में राष्ट्रपति पद के दो अहम उम्मीदवारों को।
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अमरीका और भारत के चुनाव में एक बड़ा फ़र्क ये भी है कि भारत में चुनाव केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी होती है और चुनाव आयोग हर तरह के चुनाव करवाता है। लेकिन अमरीका में चुनाव इसके राज्य कराते हैं। तो आखिर दोनों देशों की चुनावी प्रक्रिया में कितनी समानता है और कितनी असमानता -आइए कुछ पर प्रकाश डालते हैं:
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फ़ंडिंग
हाल में देश के राष्ट्रपति और अमरीकी चुनाव में उम्मीदवार बराक ओबामा ने खुश होकर ऐलान किया कि उन्होंने चुनाव के लिए पर्याप्त मात्रा में फंड जुटा लिया है।

अमरीकी चुनाव में पैसों का खेल सबसे बड़ा है। अगर एक आम अमरीकी ग़रीब है और उसमें चंदा जुटाने की क्षमता नहीं है तो वो शायद अमरीका का राष्ट्रपति नहीं बन सकता। ये है अहमियत अमरीकी चुनावों में चंदे की। अमरीकी क़ानून चुनाव के लिए उम्मीवारों के खिलाफ या उनके पक्ष में काम करने वाली संस्थाओं को चंदा जुटाने की अनुमति देता है।

जो संस्थाएं उम्मीदवारों के लिए या उनके विरोध में मुहिम चलाती हैं उन्हें पॉलिटिकल ऐक्शन ग्रुप के नाम से जाना जाता है। ये संस्थाएं चुनाव से पहले और इसके दौरान अधिक से अधिक चंदा जुटाने की कोशिश करती हैं। इसी तरह से आम नागरिक अपने पसंदीदा उम्मीदवार को 2500 डॉलर प्राइमरी चुनावी दौर में और 2500 डॉलर असली चुनाव के समय दे सकता है।

लेकिन भारत में चुनाव लड़ने के लिए गोपनीय रूप से चंदा जुटाया जाता है। राजनीति में काले धन का इस्तेमाल आमतौर पर होता है। हालांकि हर उम्मीदवार को अपने धन का हिसाब देना पड़ता है लेकिन इसके बावजूद काले धन के खेल को रोका नहीं जा सका है।

कॉरपोरेट की भूमिका

कहा जाता है कि अमरीका की एक प्रतिशत धनवान जनता चुनाव को नियंत्रित करती है। कॉरपोरेट जगत के पैसों के दान के कारण उनका असर काफी बढ़ जाता है। मिट रोमनी को समर्थन देने वाली संस्थाओं पर एक नज़र डालें तो उनमें अधिकतर ऐसी हैं जिनकी आर्थिक स्थिति बुरी है और वो सरकारी बेल आउट (आर्थिक मदद) का इंतज़ार कर रही हैं।


इसी तरह से बराक ओबामा पिछले चुनाव के मुक़ाबले इस बार अमीर लोगों और संस्थाओं की खूब मदद ले रहे हैं। देखा ये गया है कि चंदा देने वाली संस्थाओं के वरिष्ठ अधिकारी और धनवान लोग चुनाव के बाद बड़े सरकारी पदों के हक़दार बन जाते हैं और उन्हें इन पदों से नवाज़ा भी जाता है।


भारत में कानूनी स्तर पर कॉरपोरेट जगत की चुनाव में भूमिका सीमित होती है और पैसे वालों को चुनाव के बाद बड़े पदों के लिए चुना जाना ज़रूरी नहीं होता। लेकिन ये तो हुआ जो ज़ाहिर है। गोपनीय रूप से पैसे देने वालों को बड़े पदों पर बिठाना कोई अनहोनी बात नहीं।


मीडिया की भूमिका
अमरीका और भारत दोनों देशों में मीडिया आज़ाद है। लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों में अख़बार और टीवी चैनलों का उम्मीदवारों और पार्टियों के प्रति झुकाव आमतौर से देखा जा सकता है।

लेकिन अमरीकी चुनाव में डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया नेटवर्क का इस्तेमाल भारत से कहीं अधिक होता है। कहा जाता है की 2008 में होने वाले चुनाव में बराक ओबामा ने फ़ेसबुक और ट्विटर का भरपूर इस्तेमाल किया था जिसकी खूब चर्चा भी हुई थी।

इस बार का चुनाव हैशटैग, ट्विटर, फेसबुक और ईमेल के ज़रिए लड़ा जा रहा है। इस बार सोशल मीडिया की चुनावी मुहिम में ओबामा मिट रोमनी से कहीं आगे हैं। अगर आज अमरीकी चुनाव केवल सोशल नेटवर्किंग साइट पर कराया जाए तो बराक ओबामा मिट रोमनी को आसानी से चित कर देंगे।

अक्तूबर के दूसरे हफ्ते तक फ़ेसबुक पर ओबामा के लगभग चार करोड़ 'लाइक्स' थे जबकि रोमनी को एक करोड़ से कम 'लाइक्स' मिले थे। इसी तरह से ट्विटर पर ओबामा के तीन करोड़ फीड्स हैं जबकि रोमनी के डेढ़ करोड़। यूट्यूब पर ओबामा के 2,40,000 सब्सक्राइबर थे जबकि रोमनी के केवल 23,700।


इसका मतलब ये नहीं है कि अखबार और दूसरे माध्यम का सहारा नहीं लिया जा रहा है। भारत में इंटरनेट कनेक्शन काफी कम होने के कारण नेताओं को ट्विटर और फेसबुक का इस्तेमाल अधिक फायदा नहीं पहुंचाता है। लेकिन अब भारत में भी चुनावी उम्मीदवारों और सियासी पार्टियों ने सोशल मीडिया का सहारा लेना शुरू कर दिया है।


चुनावी मुहिम

चुनावी मुहिम दोनों देशों में काफी अलग होती है। आम तौर से भारत में उम्मीदवार घर-घर जाते हैं या बड़ी जन सभाओं का आयोजन करते हैं। चुनावी प्रचार में गानों, संगीत, नारों और झंडों का खूब इस्तेमाल होता है।


हर पार्टी को चुनावी चिन्ह दिया जाता है। चुनाव प्रचार में काफी गर्मजोशी होती है, लेकिन अगर आप भारत में चुनावी प्रचार का मज़ा लेते हैं तो अमरीका में चुनावी मुहिम से आपको मायूसी हो सकती है।


अमरीका में दोनों उम्मीदवार टीवी और रेडियो में विज्ञापन जारी करते हैं। आम लोगों से भी मिलते हैं लेकिन अधिकतर टीवी चैनलों के लिए। दोनों देशों में चुनावी मुहिम का उदाहरण एक क्रिकेट मैच से दिया जा सकता है। भारत का चुनावी प्रचार स्टेडियम में क्रिकेट मैच देखने की तरह है जबकि अमरीका में चुनावी प्रचार इस मैच को टीवी पर देखने की तरह है।


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