रूस और यूक्रेन: बड़े रहस्यमय हैं राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन! उनकी नीतियों में युद्ध और शांति का मिश्रण
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि रूस ने केवल कमजोर नस पर थोड़ा सा दबाव बढ़ाया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने इसके बाद अपने बयान की भाषा को थोड़ा बदल दिया। फ्रांस और जर्मनी ने रूस के साथ शांति के प्रस्ताव की मध्यस्थता तेज कर दी। बुधवार 26 जनवरी को पेरिस में दोनों देशों की अगुवाई और मध्यस्थता में यूक्रेन और रूस के दूतों ने बात की। युद्ध विराम पर सहमत हुए...
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आठ घंटे की मैराथन बैठक के बाद रूस और यूक्रेन के बीच में थोड़ी शांति की उम्मीद जगी है। दुनिया की निगाहें अब दो सप्ताह बाद बर्लिन में होने वाली बैठक पर टिक गई हैं। इसमें फ्रांस और जर्मनी की अहम भूमिका रही। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के लिए फिलहाल अंत भला तो सब भला का इंतजार है। इन सबके बीच दुनिया के सबसे रहस्यमय, दमदार, कूटनीति में माहिर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दौर में रूस की सेना ने शांति और युद्ध के एक बेजोड़ कॉकटेल में महारत हासिल कर ली है।
पहले बात यूक्रेन के ताजा संकट की
यूक्रेन के शहर डोनाबास में सोवियत संघ के विघटन के बाद अलग होने वाले इस शहर में करीब 70 प्रतिशत लोग रूसी भाषा बोलते हैं। 37-38 फीसदी की आबादी कट्टर रूसी समर्थकों की है। यूक्रेन की राजधानी कीव को हमेशा डोनबास में रूस का परोक्ष दखल सताता रहता है। कीव को क्रीमिया का दर्द इतनी आसानी से कैसे भूलेगा। क्रीमिया को राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस में मिला लिया था। क्रीमिया में बहुसंख्यक रूसी बोलने वाले थे। शांति और युद्ध के बेजोड़ कॉकटेल के जरिए बिना किसी बड़े युद्ध या खून-खराबे के क्रीमिया को रूस का हिस्सा बना लिया। 9 मार्च 2015 को रूस के राष्ट्रपति ने क्रीमिया को रूस में मिलाने के आदेश की जानकारी देने के साथ सबको चौंका दिया। नाटो के कंधे पर सिर रखने और यूरोपीय संघ में शामिल होने के बाद भी यूक्रेन यहां यूरोप और अमेरिका के भरोसे में मात खा गया।
सैनिकों की तैनाती को रूस ने बताया रूटीन सैन्य अभ्यास
यूक्रेन के ताजा संकट को इसी नजरिए से फिर देखा जा रहा है। यूक्रेन की सीमा पर रूस ने भारी हथियारों के साथ घेराबंदी कर रखी है। हालांकि अपनी फ्रंट लाइन इंफैट्री और लड़ाकू दस्ते के सैनिकों को अभी वहां से दूर रखा है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन में बढ़ रहे नाटो देशों के प्रभाव और यूरोपीय दखल को रोकने की परोक्ष चेतावनी काफी पहले से दे रखी है। इसकी तीव्रता को उन्होंने पिछले कुछ महीने से न केवल बढ़ा रखा है, बल्कि अंजाम भुगतने की धमकी तक दे चुके हैं। हालांकि क्रीमिया को लेकर यूक्रेन की सीमा पर इस तैनाती को रूस ने अपना रूटीन सैन्य अभ्यास बताया है। लेकिन रूस के खतरनाक इरादों को यूरोप और अमेरिकी भी बारीकी से समझ रहे हैं। यही राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की रूसी सेना की बड़ी उपलब्धि है। वह युद्ध जैसा माहौल बनाती है, युद्ध नहीं करती, शांति, स्थायित्व और रूटीन बताकर और युद्ध से मिलने वाले परिणाम को शांति से हासिल कर लेती है। जरूरत पडऩे पर त्वरित, सटीक, आक्रामक सैन्य कार्रवाई से लक्ष्य साध लेती है। शांति और युद्ध के इस खेल में रूसी को कूटनीतिक महारत हासिल है। इसी से यूक्रेन, यूरोप (खासकर ब्रिटेन) और अमेरिका के माथे पर बल है।
क्या है यूरोप की मजबूरी?
पूरा यूरोप मौसम की मार से तंग है। उसके उद्योग, कल कारखाने तक के लिए गैस की एक तिहाई आपूर्ति रूस से होती है। रूस ने इस गैस की सप्लाई में बड़े पैमाने पर कटौती कर रखी है। यूरोप के पास रूस की गैस का कोई विकल्प नहीं है और संभावित तरीकों से गैस की आपूर्ति में लागत के 35-40 फीसदी तक बढ़ जाने का जोखिम है। सीधा अर्थ है कि अमेरिका के लिए भले ही गैस आपूर्ति का अवसर मिल जाए, लेकिन यूरोप की अर्थव्यवस्था बर्बाद होने का जोखिम है। यूरोप, यूक्रेन से लगा हुआ है। बिना यूरोप के अमेरिका का कोई भी सैन्य अभियान रूस या यूक्रेन तक करीब-करीब असंभव है। वह भी तब जब चीन और रूस के साथ उसका छत्तीस का आंकड़ा आक्रामक रुख अख्तियार करता जा रहा हो।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि रूस ने केवल कमजोर नस पर थोड़ा सा दबाव बढ़ाया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने इसके बाद अपने बयान की भाषा को थोड़ा बदल दिया। फ्रांस और जर्मनी ने रूस के साथ शांति के प्रस्ताव की मध्यस्थता तेज कर दी। बुधवार 26 जनवरी को पेरिस में दोनों देशों की अगुवाई और मध्यस्थता में यूक्रेन और रूस के दूतों ने बात की। युद्ध विराम पर सहमत हुए। फ्रांस और जर्मनी की गारंटी के साथ संयुक्त साझा बयान जारी करने पर रजामंदी हुई और दो सप्ताह बाद जर्मनी की राजधानी बर्लिन में अगले वार्ता की तैयारी से दुनिया ने थोड़ी राहत की सांस ली है।
क्या यूक्रेन कर पाएगा युद्ध का सामना?
रूस के अत्याधुनिक युद्धक क्षमता का सामना कर पाना यूक्रेन के बस की बात नहीं। यूक्रेन की पूरी ताकत नाटो देश हैं। युद्ध की स्थिति आने पर अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन उसके पीछे तो खड़े हो जाते हैं, लेकिन हालात बगलें झांकने वाली हो जाती है। इसका ताजा उदाहरण क्रीमिया की स्थिति है। क्रीमिया को रूस ने अपना हिस्सा बना लिया है। 2015 में रूस में मिलाने की जानकारी देने से पहले रूसी समर्थक क्रीमिया विद्रोहियों ने 2014 में मलयेशिया के 298 यात्रियों से भरे जहाज को निशाना बना दिया था। इस रणनीति के पीछे रूस की भूमिका से कभी संदेह कम नहीं हुआ। तब से यूरोप (खासकर ब्रिटेन) और अमेरिका क्रीमिया को रूस का हिस्सा नहीं मानते।
माना जा रहा है कि कुछ ऐसी ही परिस्थिति देखकर ब्रिटेन ने यूक्रेन के बर्बाद हो जाने की संभावना बता दी थी। भारतीय सैन्य मामलों के जानकार वाइस एयर मार्शल (पूर्व) एनबी सिंह कहते हैं रूस की सैन्य शक्ति के आगे यूक्रेन कुछ भी नहीं है। यूक्रेन को अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोप के हथियारों की आपूर्ति के बल पर भी मुगालता नहीं पालना चाहिए। क्योंकि हथियारों का इस्तेमाल और युद्ध का प्रशिक्षण कोई आसान प्रक्रिया नहीं है। इस मामले में यूक्रेन करीब-करीब जीरो है।
क्यों बड़े रहस्यमय हैं राष्ट्रपति पुतिन?
किसी भी अभियान को रोके बिना और आक्रामकता तथा शांति प्रयास में बेजोड़ तालमेल बनाकर कूटनीतिक, रणनीतिक तैयारी ही राष्ट्रपति व्लादिमीर की ताकत है। लंबे संयम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव राष्ट्रपति पुतिन के सबसे करीबी और भरोसेमंद हैं। रूस में लंबे समय रहे भारत के एक पूर्व राजनयिक का कहना है कि पुतिन की टीम की डिजाइन ही कुछ ऐसी है। जहां वह अंत तक पत्ते नहीं खोलते। चाहे वह भारत, चीन, सीरिया जैसे करीबी देशों के साथ संबंध ही क्यों न हो। विनोद शर्मा भी लंबे समय से रूस में हैं। कहते हैं कि राष्ट्रपति पुतिन के राजनीतिक, प्रशासनिक, निजी जीवन में जो चल रहा है उसके बारे में कुछ दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। जो जानकारी आधिकारिक तौर पर सामने आती है, उसे मान लिया जाता है।
आखिर कुछ तो है पुतिन में?
विदेश मंत्रालय के अधिकारी कहते हैं कि पुतिन 2000 में रूस के राष्ट्रपति बने थे। तब रूस की स्थिति अच्छी नहीं थी। 2008 तक इस पद रहे। चार साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे। दैमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बनाया और तब भी रूस उनके दिशा-निर्देश पर चल रहा था। 2012 के बाद से वह फिर अपने देश के राष्ट्रपति हैं। यूरेशिया डेस्क पर रह चुके संयुक्त सचिव का कहना है कि वह केवल इतना ही कहेंगे राष्ट्रपति पुतिन न केवल रूस को बल्कि राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय हित में सत्ता को दबाव के साथ फंसाकर रखते हैं। पिछले 21 साल में उनको लेकर निजी स्तर पर भी हर बार बस कयास ही लग पाए। कई बार तो पुतिन के स्वास्थ्य को लेकर भी तमाम भ्रामक खबरें आईं। फिलहाल वह अपने देश की जनता का 75 फीसदी वोट पाकर एक मजबूत राष्ट्रपति हैं।
करीब 70 साल के पुतिन 1991 में राजनीति की तरफ आए। इसके पहले रूस की गुप्तचर संस्था केजीबी के अधिकारी के रूप में देश की सेवा की। लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से रिटायर होने के बाद से वह रूस की सबसे मजबूत राजनीतिक शख्सियत हैं।