{"_id":"616062f78ebc3e629674682b","slug":"africa-who-approves-first-malaria-vaccine","type":"story","status":"publish","title_hn":"हजारों जानें बचने की उम्मीद: मलेरिया के पहले टीके को डब्ल्यूएचओ की मंजूरी, इसलिए हुआ अफ्रीका में परीक्षण","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
हजारों जानें बचने की उम्मीद: मलेरिया के पहले टीके को डब्ल्यूएचओ की मंजूरी, इसलिए हुआ अफ्रीका में परीक्षण
Fri, 08 Oct 2021 08:57 PM IST
Amit Mandal
एजेंसी, जिनेवा।
एजेंसी, जिनेवा।
Published by: Amit Mandal
Updated Fri, 08 Oct 2021 08:57 PM IST
सार
एक साल तक 450 बच्चों पर इसका परीक्षण किया गया है। इस बीमारी का परीक्षण अफ्रीका में इसलिए कराया गया क्योंकि यहीं के देशों में हर साल हजारों बच्चे इस बीमारी से मारे जाते हैं।
विज्ञापन
malaria
- फोटो : istock
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अफ्रीका में हुए परीक्षणों के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दुनिया की पहली मलेरिया वैक्सीन को मंजूरी दे दी है। वैज्ञानिकों का दावा है कि ये वैक्सीन लगने के बाद मलेरिया से लड़ने की क्षमता करीब 77 प्रतिशत है और इसका 450 बच्चों पर एक साल तक परीक्षण हो चुका है। ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन नामक कंपनी द्वारा बनाए गए मॉसक्विरिक्स नामक टीके से हजारों जानें बचाए जाने की उम्मीद है।
विज्ञापन
इस बीमारी का परीक्षण अफ्रीका में इसलिए कराया गया क्योंकि यहीं के देशों में हर साल हजारों बच्चे इस बीमारी से मारे जाते हैं। डब्ल्यूएचओ महानिदेशक टेड्रॉस अधनोम ग्रेब्रेयेसिस ने यूएन के दो सलाहकार समूहों का समर्थन मिलने के बाद इस वैक्सीन को मंजूरी की घोषणा की और इसे ऐतिहासिक पल बताया। उन्होंने कहा, इस वैक्सीन को अफ्रीका में अफ्रीकी वैज्ञानिकों ने तैयार किया है और हमें उन पर गर्व है। मलेरिया का कारगर इलाज ढूंढने की कोशिश पिछले 80 साल से चल रही है और करीब 60 साल से टीके के विकास पर शोध जारी है लेकिन 80 के दशक में ये बात सामने आई कि मलेरिया के मच्छर के प्रोटीन से वैक्सीन बनाई जा सकती है। तब से अब तक लगातार कोशिश जारी थी लेकिन 2019 में कई दौर के ट्रायल के बाद ही साफ हो पाया कि मलेरिया की वैक्सीन कारगर है। इसे अब मान्यता मिल चुकी है।
विज्ञापन
भारत में उड़ीसा, छत्तीसगढ़ व पश्चिम बंगाल सर्वाधिक प्रभावित
भारत में 2016 की तुलना में 2017 में मलेरिया के तकरीबन 24 फीसद मामलों में कमी आई है, लेकिन इस वैक्सीन के आने के बाद मलेरिया को काबू में करने की उम्मीद कई गुना बढ़ गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल अब भी मलेरिया प्रभावित राज्य हैं जहां एक स्तर पर आकर रोगी को हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है और वह अनीमिक हो जाता है। इससे अब बचा जा सकेगा।
विज्ञापन
ऐसे रुकेंगी मलेरिया से मौतें
डब्ल्यूएचओ ने मलेरिया टीका मॉसक्विरिक्स को मंजूरी दे दी है। मच्छरों की 460 में से करीब 100 प्रजातियां इंसानों में मलेरिया का संक्रमण फैला सकती हैं। मच्छरों के काटने से शरीर में पैरासाइट प्लाजमोडियम फाल्सीपैरम संक्रमण फैलता है। लेकिन डब्ल्यूएचओ का टीका लगने के बाद शरीर में मलेरिया संक्रमण का असर बेहद कम हो जाएगा और मरीज गंभीर स्थिति में पहुंचने से बच जाएगा। इससे मौतें रोकी जा सकेंगी।
टीके के कई स्वरूप विकसित किए जाएंगे
मॉसक्विरिक्स टीका बनाने का आइडिया 1980 के दशक में बेल्जियम स्थित स्मिथक्लाइन बीचम कंपनी के बायोलॉजिस्ट्स को आया था। इस टीके का वैज्ञानिक नाम रीकॉम्बीनेंट प्रोटीन बेस्ड मलेरिया वैक्सीन भी है। यह वैक्सीन लेने के बाद शरीर में मलेरिया संक्रमण करने वाले पैरासाइट प्लाजमोडियम फाल्सीपैरम का असर बेहद कम हो जाता है। अभी इसके कई नए ताकतवर वैरिएंट्स विकसित किए जाएंगे।
वैज्ञानिकों में उत्साह
डब्ल्यूएचओ के अफ्रीका महाद्वीप के निदेशक डॉ. मात्शिदो मोएती ने इस टीके को उम्मीद की किरण बताया है। कैंब्रिज इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल रिसर्च के निदेशक जूलियन रायनर ने कहा है कि यह बड़ा कदम है। उन्होंने कहा, यह टीका पूरी तरह दोष रहित नहीं है लेकिन यह लाखों बच्चों को मरने से बचाएगा। टीका परीक्षण करने वाले डब्ल्यूएचओ विशेषज्ञ समूह के प्रमुख डॉ. आलेहांद्रो क्राविओतो ने बताया कि हम बहुत ज्यादा प्रभावशाली होने की पहुंच में नहीं हैं लेकिन अब हमारे पास एक टीका है जो सुरक्षित है और जिसका इस्तेमाल किया जा सकता है।