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PAK vs AFG: तालिबान की पाकिस्तान से बदला लेने की चेतावनी में कितना दम, संगठन के पास कौन से हथियार, ताकत कितनी?
Thu, 26 Dec 2024 03:03 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 26 Dec 2024 03:03 PM IST
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तालिबान vs पाकिस्तान।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
अफगानिस्तान में शासन कर रहे तालिबान और पाकिस्तान के बीच बीते तीन वर्षों में रिश्तों में किस तरह तेजी से गिरावट आई है, इसका एक नजारा मंगलवार को दिखा जब पाकिस्तानी वायुसेना ने अफगानिस्तान के पक्तिका प्रांत में हवाई हमलों को अंजाम दिया। यहां अब तक करीब 46 लोगों की मौत की खबर है। पाकिस्तान की तरफ से इन हमलों को लेकर कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया गया है। हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में सुरक्षा एजेंसियों के हवाले से दावा किया गया है कि इस्लामाबाद की तरफ से यह हमले पाकिस्तान में आतंक फैला रहे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के सरगनाओं को निशाना बनाने के लिए किए गए। हालांकि, अफगान तालिबान ने पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि वह जवाबी कार्रवाई करेगा।तालिबान की तरफ से पाकिस्तान को दी गई इस धमकी के बाद यह सवाल उठते हैं कि आखिर अफगानिस्तान में शासन कर रहे इस संगठन के पड़ोसी देश से रिश्ते कैसे बिगड़ गए? तालिबान के तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के साथ रिश्तों की इसमें क्या भूमिका है? दोनों देशों के बीच और किस मुद्दे पर विवाद हैं और कब-कब दोनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हुई है? इसके अलावा सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर तालिबान की पाकिस्तान को दी गई चेतावनी में कितना दम है? और उसके पास कितनी ताकत है? आइये जानते हैं...
पहले जानें- अफगानिस्तान ने पाकिस्तान को क्या धमकी दी?
अफगानिस्तान में किए गए हमलों पर भले ही पाकिस्तान की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई, लेकिन एक अधिकारी ने न्यूज एजेंसी एएफपी से कहा कि वायुसेना ने लड़ाकू विमानों और ड्रोन्स के जरिए आतंकियों के ठिकानों को तबाह कर दिया। उन्होंने दावा किया कि एयरस्ट्राइक में टीटीपी के 20 आतंकी मारे गए हैं।
अफगानिस्तान के विदेश कार्यालय ने काबुल में तैनात पाकिस्तान के मिशन प्रमुख को तलब किया है। अफगानिस्तान उन्हें हवाई हमलों को लेकर औपचारिक विरोध पत्र सौंपेगा। साथ ही राजनयिक को ऐसी कार्रवाई को लेकर आगाह किया जाएगा। राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता इनायतुल्लाह खौराजमी ने कहा कि अफगानिस्तान हवाई हमलों को अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों का उल्लंघन और आक्रामक कृत्य मानता है। हम इसका जवाब देंगे।
अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बीच कैसे बिगड़ गए रिश्ते?
गौरतलब है कि अफगानिस्तान में तीन साल पहले 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया था। इसी के साथ देश में तालिबान शासन की 20 साल बाद वापसी हुई। अफगानिस्तान में तालिबान की इस वापसी की एक बड़ी वजह पाकिस्तान रहा, जिसने इस्लामी चरमपंथी संगठन को अलग-अलग मौकों पर समर्थन देने के साथ-साथ उसके सरगनाओं को अपने देश में पनाह देने का भी काम किया। पिछले करीब एक दशक में अमेरिका से बिगड़ते रिश्तों और आतंकवाद के मुद्दे पर घिरने के बाद पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में ऐसी सरकार की स्थापना की कोशिश की, जो उसके हितों को नुकसान नहीं पहुंचाएगी। इसमें वह काफी हद तक सफल भी हुआ।
हालांकि, कुछ समय बाद ही पाकिस्तान और तालिबान के रिश्तों में दरार दिखने लगी। इसके पीछे कुछ अहम वजहें रहीं। मसलन-
अफगानिस्तान में किए गए हमलों पर भले ही पाकिस्तान की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई, लेकिन एक अधिकारी ने न्यूज एजेंसी एएफपी से कहा कि वायुसेना ने लड़ाकू विमानों और ड्रोन्स के जरिए आतंकियों के ठिकानों को तबाह कर दिया। उन्होंने दावा किया कि एयरस्ट्राइक में टीटीपी के 20 आतंकी मारे गए हैं।
अफगानिस्तान के विदेश कार्यालय ने काबुल में तैनात पाकिस्तान के मिशन प्रमुख को तलब किया है। अफगानिस्तान उन्हें हवाई हमलों को लेकर औपचारिक विरोध पत्र सौंपेगा। साथ ही राजनयिक को ऐसी कार्रवाई को लेकर आगाह किया जाएगा। राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता इनायतुल्लाह खौराजमी ने कहा कि अफगानिस्तान हवाई हमलों को अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों का उल्लंघन और आक्रामक कृत्य मानता है। हम इसका जवाब देंगे।
अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बीच कैसे बिगड़ गए रिश्ते?
गौरतलब है कि अफगानिस्तान में तीन साल पहले 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया था। इसी के साथ देश में तालिबान शासन की 20 साल बाद वापसी हुई। अफगानिस्तान में तालिबान की इस वापसी की एक बड़ी वजह पाकिस्तान रहा, जिसने इस्लामी चरमपंथी संगठन को अलग-अलग मौकों पर समर्थन देने के साथ-साथ उसके सरगनाओं को अपने देश में पनाह देने का भी काम किया। पिछले करीब एक दशक में अमेरिका से बिगड़ते रिश्तों और आतंकवाद के मुद्दे पर घिरने के बाद पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में ऐसी सरकार की स्थापना की कोशिश की, जो उसके हितों को नुकसान नहीं पहुंचाएगी। इसमें वह काफी हद तक सफल भी हुआ।
हालांकि, कुछ समय बाद ही पाकिस्तान और तालिबान के रिश्तों में दरार दिखने लगी। इसके पीछे कुछ अहम वजहें रहीं। मसलन-
1. सीमा विवाद
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच एक काल्पनिक डूरंड रेखा को सीमा माना जाता है। हालांकि, अंग्रेजों की बनाई इस रेखा को अफगानिस्तान शुरुआत से ही नकारता रहा है। उसका कहना है कि ब्रिटिश अफसरों ने उसके पश्तो समुदायों को अलग करने के लिए यह रेखा खींची। इसी डूरंड रेखा को पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच विवाद की बड़ी वजह माना जाता है। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि तालिबान के आने के बाद वह अफगानिस्तान से जमीन छीन सकता है या इससे जुड़े विवाद सुलझा सकता है।
हालांकि, तालिबान ने पाकिस्तान की इस नीति को मंजूर नहीं किया। अपना शासन आने के बाद तालिबान ने यहां अपना दावा मजबूत करने के लिए कुछ सुरक्षा चौकियों का निर्माण भी शुरू किया है। इसे लेकर दोनों पक्षों के बीच कुछ समय पहले ही झड़पें भी देखी गईं। इसी साल सितंबर में पाकिस्तान-तालिबान के बीच भारी गोलीबारी हुई। अफगानिस्तान के खोस्त प्रांत में हुए इन हमलों में अफगान तालिबान के दो वरिष्ठ कमांडर खलील और जान मोहम्मद समेत आठ तालिबानी लड़ाकों की मौत हुई।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच एक काल्पनिक डूरंड रेखा को सीमा माना जाता है। हालांकि, अंग्रेजों की बनाई इस रेखा को अफगानिस्तान शुरुआत से ही नकारता रहा है। उसका कहना है कि ब्रिटिश अफसरों ने उसके पश्तो समुदायों को अलग करने के लिए यह रेखा खींची। इसी डूरंड रेखा को पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच विवाद की बड़ी वजह माना जाता है। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि तालिबान के आने के बाद वह अफगानिस्तान से जमीन छीन सकता है या इससे जुड़े विवाद सुलझा सकता है।
हालांकि, तालिबान ने पाकिस्तान की इस नीति को मंजूर नहीं किया। अपना शासन आने के बाद तालिबान ने यहां अपना दावा मजबूत करने के लिए कुछ सुरक्षा चौकियों का निर्माण भी शुरू किया है। इसे लेकर दोनों पक्षों के बीच कुछ समय पहले ही झड़पें भी देखी गईं। इसी साल सितंबर में पाकिस्तान-तालिबान के बीच भारी गोलीबारी हुई। अफगानिस्तान के खोस्त प्रांत में हुए इन हमलों में अफगान तालिबान के दो वरिष्ठ कमांडर खलील और जान मोहम्मद समेत आठ तालिबानी लड़ाकों की मौत हुई।
2. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी)
काबुल और इस्लामाबाद के बीच विवाद की दूसरी सबसे बड़ी वजह है तालिबान के समर्थन वाले तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की आतंकी गतिविधियां। 2007 में पाकिस्तान में कई आतंकी संगठनों के गठबंधन से बने टीटीपी का मकसद चार चरण में है-
काबुल और इस्लामाबाद के बीच विवाद की दूसरी सबसे बड़ी वजह है तालिबान के समर्थन वाले तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की आतंकी गतिविधियां। 2007 में पाकिस्तान में कई आतंकी संगठनों के गठबंधन से बने टीटीपी का मकसद चार चरण में है-
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान।
- फोटो :
Amar Ujala
तालिबान-टीटीपी का क्या है कनेक्शन?
गौरतलब है कि पाकिस्तान का तालिबान और अफगान तालिबान का जुड़ाव सिर्फ इनकी गतिविधियों की वजह से नहीं है, बल्कि अपनी धार्मिक विचारधारा की वजह से है। यानी दोनों ही संगठनों का केंद्र एक है। तालिबान एक पश्तो शब्द है, जिसका मतलब होता है 'छात्र'। इसे अफगानिस्तान और पाकिस्तान के मदरसों में पढ़ रहे मजदूर, किसानों और आम लोगों ने बनाया। इस संगठन में शामिल अधिकतर लोग पश्तून समुदाय से हैं, जिनकी बोली पश्तो भी समान ही है। यह समुदाय दोनों देशों के सीमाई क्षेत्र में सबसे ज्यादा बसे हुए हैं।
तहरीक-ए-तालिबान के अधिकतर आतंकी पाकिस्तानी के पश्तो समुदाय से ही जुड़े रहे हैं। इस लिहाज से दोनों देशों में तालिबान एक-दूसरे के हिमायती माने जाते हैं।
गौरतलब है कि पाकिस्तान का तालिबान और अफगान तालिबान का जुड़ाव सिर्फ इनकी गतिविधियों की वजह से नहीं है, बल्कि अपनी धार्मिक विचारधारा की वजह से है। यानी दोनों ही संगठनों का केंद्र एक है। तालिबान एक पश्तो शब्द है, जिसका मतलब होता है 'छात्र'। इसे अफगानिस्तान और पाकिस्तान के मदरसों में पढ़ रहे मजदूर, किसानों और आम लोगों ने बनाया। इस संगठन में शामिल अधिकतर लोग पश्तून समुदाय से हैं, जिनकी बोली पश्तो भी समान ही है। यह समुदाय दोनों देशों के सीमाई क्षेत्र में सबसे ज्यादा बसे हुए हैं।
तहरीक-ए-तालिबान के अधिकतर आतंकी पाकिस्तानी के पश्तो समुदाय से ही जुड़े रहे हैं। इस लिहाज से दोनों देशों में तालिबान एक-दूसरे के हिमायती माने जाते हैं।
हमले टीटीपी कर रहा तो पाकिस्तान का तालिबान से टकराव क्यों?
माना जाता है कि टीटीपी को पाकिस्तान में तालिबान की तरफ से ही खड़ा किया गया। दरअसल, अमेरिका पर हुए 9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में अल-कायदा के सरगना ओसामा बिन-लादेन के खिलाफ हमले शुरू किए। अफगान तालिबान पर भी अमेरिका ने अल-कायदा की मदद करने का आरोप लगाया और उसे अफगानिस्तान की सत्ता से उखाड़ फेंका। पाकिस्तान ने भी पश्चिमी देशों से कूटनीतिक और आर्थिक मदद की उम्मीद के दबाव में अफगानिस्तान में तालिबान पर हमले किए।
इसके बाद तालिबान ने पाकिस्तान में भी अपने जैसे ही एक संगठन को खड़ा करने की तैयारी कर ली। कहा जाता है कि जब पाकिस्तान ने अपने हितों के लिए तालिबान सरगनाओं को देश में शरण दी, उस दौरान ही इन लोगों ने पाकिस्तान में टीटीपी के लड़ाके तैयार करना शुरू कर दिए थे।
तालिबान ने इन्हें न सिर्फ पाकिस्तान में आतंक फैलाने, बल्कि अफगानिस्तान में ही पश्चिमी देशों के खिलाफ मोर्चे के लिए भी तैयार किया। अफगानिस्तान पर फतह हासिल करने के बाद अब टीटीपी का पूरा ध्यान पाकिस्तान पर ही केंद्रित है और तालिबान उसके लड़ाकों को कई मौकों पर संरक्षण देता रहा है। दोनों देशों के बीच 2640 किलोमीटर की सीमा पर सुरक्षा के कमजोर इंतजामों के चलते टीटीपी के आतंकी मनमर्जी से पाकिस्तान पर हमले करने के बाद अफगानिस्तान के सीमाई इलाकों में छिप जाते हैं।
माना जाता है कि टीटीपी को पाकिस्तान में तालिबान की तरफ से ही खड़ा किया गया। दरअसल, अमेरिका पर हुए 9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में अल-कायदा के सरगना ओसामा बिन-लादेन के खिलाफ हमले शुरू किए। अफगान तालिबान पर भी अमेरिका ने अल-कायदा की मदद करने का आरोप लगाया और उसे अफगानिस्तान की सत्ता से उखाड़ फेंका। पाकिस्तान ने भी पश्चिमी देशों से कूटनीतिक और आर्थिक मदद की उम्मीद के दबाव में अफगानिस्तान में तालिबान पर हमले किए।
इसके बाद तालिबान ने पाकिस्तान में भी अपने जैसे ही एक संगठन को खड़ा करने की तैयारी कर ली। कहा जाता है कि जब पाकिस्तान ने अपने हितों के लिए तालिबान सरगनाओं को देश में शरण दी, उस दौरान ही इन लोगों ने पाकिस्तान में टीटीपी के लड़ाके तैयार करना शुरू कर दिए थे।
तालिबान ने इन्हें न सिर्फ पाकिस्तान में आतंक फैलाने, बल्कि अफगानिस्तान में ही पश्चिमी देशों के खिलाफ मोर्चे के लिए भी तैयार किया। अफगानिस्तान पर फतह हासिल करने के बाद अब टीटीपी का पूरा ध्यान पाकिस्तान पर ही केंद्रित है और तालिबान उसके लड़ाकों को कई मौकों पर संरक्षण देता रहा है। दोनों देशों के बीच 2640 किलोमीटर की सीमा पर सुरक्षा के कमजोर इंतजामों के चलते टीटीपी के आतंकी मनमर्जी से पाकिस्तान पर हमले करने के बाद अफगानिस्तान के सीमाई इलाकों में छिप जाते हैं।
पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर कहां-कहां तालिबान।
- फोटो :
अमर उजाला
पाकिस्तान का अफगानिस्तान में घुसकर यह दूसरा बड़ा हमला
पाकिस्तान अपने खिलाफ टीटीपी पर लगातार हमले करती रही है। हालांकि, अफगानिस्तान में तालिबान शासन आने के बाद यह सीमापार उसका दूसरा बड़ा हमला है। हफ्तेभर पहले ही दक्षिणी वजीरिस्तान में टीटीपी आतंकियों से मुठभेड़ में 16 पाकिस्तानी जवानों की मौत के बाद इस्लामाबाद ने इन हमलों को अंजाम दिया है।
इसी साल 17-18 मार्च की दरमियानी रात को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के वजीरिस्तान इलाके में एयरस्ट्राइक की थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, खोस्त और पक्तिका प्रांत में फाइटर जेट्स की तरफ से की गई बमबारी में आठ लोगों की जान चली गई थी। तब भी तालिबान ने आरोप लगाया था कि पाकिस्तान के हमले में मारे गए लोगों में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं।
पाकिस्तान अपने खिलाफ टीटीपी पर लगातार हमले करती रही है। हालांकि, अफगानिस्तान में तालिबान शासन आने के बाद यह सीमापार उसका दूसरा बड़ा हमला है। हफ्तेभर पहले ही दक्षिणी वजीरिस्तान में टीटीपी आतंकियों से मुठभेड़ में 16 पाकिस्तानी जवानों की मौत के बाद इस्लामाबाद ने इन हमलों को अंजाम दिया है।
इसी साल 17-18 मार्च की दरमियानी रात को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के वजीरिस्तान इलाके में एयरस्ट्राइक की थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, खोस्त और पक्तिका प्रांत में फाइटर जेट्स की तरफ से की गई बमबारी में आठ लोगों की जान चली गई थी। तब भी तालिबान ने आरोप लगाया था कि पाकिस्तान के हमले में मारे गए लोगों में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं।
पाकिस्तान का मुकाबला करने में कितना सक्षम है तालिबान?
1. कितनी बड़ी है सेना?
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज की वैश्विक सेनाओं की ताकत के बारे में जानकारी देने वाली एक सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगान तालिबान के पास मौजूदा समय में 1,50,000 सक्रिय लड़ाके हैं। तालिबान के सैन्य प्रमुख कारी फसीहुद्दीन फितरत ने 2023 में कहा था कि तालिबान शासन अपनी सेना में 50 हजार लड़ाकों को और शामिल करना चाहता है। हालांकि, इसके लिए अवधि तय नहीं की गई थी।
इतना ही नहीं सत्ता में आने के बाद से तालिबान ने अब तक अफगानिस्तान के लिए रक्षा बजट का भी सार्वजनिक तौर पर खुलासा नहीं किया है। इस लिहाज से यह अब तक साफ नहीं है कि अपना शासन स्थापित करने के बाद से तालिबान की ताकत कितनी बढ़ी है। हालांकि, उसने सेना को औपचारिक रूप देने के लिए विशेष बल और आठ इन्फैंट्री कोर के अंतर्गत तीन बटालियन की नींव रखी है।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज की वैश्विक सेनाओं की ताकत के बारे में जानकारी देने वाली एक सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगान तालिबान के पास मौजूदा समय में 1,50,000 सक्रिय लड़ाके हैं। तालिबान के सैन्य प्रमुख कारी फसीहुद्दीन फितरत ने 2023 में कहा था कि तालिबान शासन अपनी सेना में 50 हजार लड़ाकों को और शामिल करना चाहता है। हालांकि, इसके लिए अवधि तय नहीं की गई थी।
इतना ही नहीं सत्ता में आने के बाद से तालिबान ने अब तक अफगानिस्तान के लिए रक्षा बजट का भी सार्वजनिक तौर पर खुलासा नहीं किया है। इस लिहाज से यह अब तक साफ नहीं है कि अपना शासन स्थापित करने के बाद से तालिबान की ताकत कितनी बढ़ी है। हालांकि, उसने सेना को औपचारिक रूप देने के लिए विशेष बल और आठ इन्फैंट्री कोर के अंतर्गत तीन बटालियन की नींव रखी है।
2. तालिबान के पास कौन से हथियार?
अफगान तालिबान के पास मौजूदा समय में कई तरह के बख्तरबंद वाहन, लंबी दूरी तक मार करने वाली तोपें, तीन लाइट एयरक्राफ्ट और 14 हेलीकॉप्टर हैं। इसके अलावा उसके पास अमेरिका में बने कुछ ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर भी हैं। तालिबान के पास यह सभी हथियार काबुल पर कब्जा करने के दौरान अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षाबलों को हराने के बाद आए थे।
इतना ही नहीं 2021 में अमेरिका के नेतृत्व वाली अंतरराष्ट्रीय गठबंधन वाली सेनाओं के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद भी उसे हथियारों और सैन्य उपकरणों का एक बड़ा जखीरा मिला था। बताया जाता है कि गठबंधन सेनाएं अपने पीछे सात अरब डॉलर से ज्यादा कीमत की बंदूकें, बम और सैन्य उपकरण छोड़ गई थीं। इसके अलावा तालिबान के पास रूस में बने कुछ अटैक हेलीकॉप्टर भी हैं, जो कि उसे अफगानिस्तान की पुरानी सेना से ही मिले हैं।
अफगान तालिबान के पास मौजूदा समय में कई तरह के बख्तरबंद वाहन, लंबी दूरी तक मार करने वाली तोपें, तीन लाइट एयरक्राफ्ट और 14 हेलीकॉप्टर हैं। इसके अलावा उसके पास अमेरिका में बने कुछ ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर भी हैं। तालिबान के पास यह सभी हथियार काबुल पर कब्जा करने के दौरान अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षाबलों को हराने के बाद आए थे।
इतना ही नहीं 2021 में अमेरिका के नेतृत्व वाली अंतरराष्ट्रीय गठबंधन वाली सेनाओं के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद भी उसे हथियारों और सैन्य उपकरणों का एक बड़ा जखीरा मिला था। बताया जाता है कि गठबंधन सेनाएं अपने पीछे सात अरब डॉलर से ज्यादा कीमत की बंदूकें, बम और सैन्य उपकरण छोड़ गई थीं। इसके अलावा तालिबान के पास रूस में बने कुछ अटैक हेलीकॉप्टर भी हैं, जो कि उसे अफगानिस्तान की पुरानी सेना से ही मिले हैं।
पाकिस्तान से मुकाबले में क्या हैं चुनौतियां?
- इतनी बड़ी मात्रा में हथियारों और कुछ एयरक्राफ्ट्स की मौजूदगी के बावजूद तालिबान की पाकिस्तान से मुकाबला करने की क्षमताओं पर सवाल उठते हैं। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि तालिबान के पास इन हथियारों और एयरक्राफ्ट्स को चलाने में काबिल लोगों की काफी कमी हो सकती है। अमेरिका और पश्चिमी देशों की अधिकतर सैन्य तकनीकें उच्चस्तरीय हैं और इनका इस्तेमाल भी पारंपरिक हथियारों से अलग तरह से होता है।
- इतना ही नहीं इन हथियारों के रखरखाव की जानकारी न होने और इनके इस्तेमाल के लिए जरूरी विदेशी मदद की गैरमौजूदगी में तालिबान के लिए यह सैन्य उपकरण उतने कारगर नहीं होंगे, जितना उनकी क्षमता है।
- इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़े तालिबान को अपनी सेना को ट्रेनिंग देने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अफगानिस्तान की एक बड़ी आबादी के कम पढ़े-लिखे होने के चलते उन्हें औपचारिक सेना की तरह ट्रेनिंग देने और आदेशों के सख्ती से पालन में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।
- दूसरी तरफ पाकिस्तान की सैन्य ताकत बीते वर्षों में लगातार बढ़ी है। थलसेना और वायुसेना दोनों ही मामलों में पाकिस्तानी सेना अफगानिस्तान से ज्यादा ताकतवर है। हालांकि, तालिबान का अफगानिस्तान में अपने से ताकतवर अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना को हराने का पुराना रिकॉर्ड रहा है। लेकिन यह जंग उसकी अपनी जमीन पर चली थी, जहां तालिबान के लड़ाकों ने सेनाओं के खिलाफ गैर-पारंपरिक तरीके अपनाए। उन्हें क्षेत्र की भौगोलिक स्थितियों का भी काफी फायदा हुआ था।
- पाकिस्तान का मुकाबला करने में भी अफगानिस्तान तालिबान इन्हीं गैर-पारंपरिक तरीकों को अपनाता रहा है। माना जाता है कि टीटीपी की पाकिस्तानी सेना के खिलाफ गतिविधियां उसकी योजना का हिस्सा है। आगे पाकिस्तान का मुकाबला करने के लिए वह सीमाई इलाकों में टीटीपी के जरिए परोक्ष रूप से लड़ाई करने की जगह खुद अपने लड़ाकों को भेजकर प्रत्यक्ष जंग शुरू कर सकता है, जिससे सीमापार आतंकवाद की घटनाओं में इजाफा भी हो सकता है।
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