{"_id":"611e812b8ebc3e7a0a7d318a","slug":"afghanistan-issue-became-difficult-for-america-in-southeast-asia-also-affecting-the-campaign-against-china","type":"story","status":"publish","title_hn":"खामियाजा: अफगानिस्तान की घटनाओं से अमेरिका के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया में मुश्किल, चीन के खिलाफ मुहिम पर भी असर","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
खामियाजा: अफगानिस्तान की घटनाओं से अमेरिका के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया में मुश्किल, चीन के खिलाफ मुहिम पर भी असर
Thu, 19 Aug 2021 09:35 PM IST
अभिषेक दीक्षित
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, सिंगापुर
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, सिंगापुर
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Thu, 19 Aug 2021 09:35 PM IST
सार
दक्षिण-पूर्व एशिया में कई देश हैं, जो इस्लामी चरमपंथ का सामना कर रहे हैँ। इसलिए फिलीपीन्स, इंडोनेशिया और थाईलैंड में गहरी चिंता है। उन्हें फिक्र इस बात की है कि अफगानिस्तान फिर से आतंकवाद का अड्डा बन सकता है, जिसका असर उन पर पड़ेगा
विज्ञापन
जो बाइडन
- फोटो : PTI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
दुनिया के कई हलकों से की गई तमाम अपीलों को नजरअंदाज करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी के अपने फैसले पर अडिग रहे। उनका प्रशासन इस समझ पर कायम रहा कि अब अमेरिका अफगानिस्तान के विकास पर और अधिक खर्च नहीं कर सकता। लेकिन उनके इस फैसले के परिणास्वरूप जब तालिबान ने काबुल की सत्ता पर कब्जा जमा लिया, तो उससे अमेरिका की एशिया रणनीति के लिए कई मुश्किलें उठ खड़ी हुई हैँ।
दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में यह पूछा जा रहा है कि हाल में अमेरिका ने उनसे जो वादे किए हैं, उन पर कितना भरोसा किया जा सकता है। अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन कुछ समय पहले सिंगापुर, वियतनाम, और फिलीपीन्स जैसे देशों की यात्रा पर आए थे। उन्होंने चीन के खिलाफ अमेरिकी मुहिम में इन देशों का समर्थन हासिल करने की कोशिश की थी। पर्यवेक्षकों ने कहा है कि जब अमेरिका इन देशों का समर्थन पाने की कोशिश में है, तभी उसे एक ऐसा झटका लगा है, जिसकी तुलना में वियतनाम युद्ध में उसकी हार से की जा रही है। अफगानिस्तान में जो हुआ, उसे अमेरिका की सबसे बड़ी खुफिया नाकामी समझा जा रहा है।
वेबसाइट एशिया टाइम्स के टीकाकार मारवान मेकन-मारकर ने एक विश्लेषण में लिखा है- ‘इसमें कोई अचरज की बात नहीं है कि चीन और उसके क्षेत्रीय सहयोगी देश अमेरिका की हार का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैँ। वे यह प्रचारित कर रहे हैं कि अमेरिका ऐसा सहयोगी है, जिस पर यकीन नहीं किया जा सकता। अमेरिका ऐसा देश है, जो देशों के अंदर हस्तक्षेप तो करता है, लेकिन जब उन देशों की जरूरत आती है, तो उन्हें अकेला छोड़ देता है।’
विज्ञापन
दक्षिण-पूर्व एशिया में कई देश हैं, जो इस्लामी चरमपंथ का सामना कर रहे हैँ। इसलिए अफगानिस्तान के घटनाक्रम से फिलीपीन्स, इंडोनेशिया, और थाईलैंड में गहरी चिंता पैदा हुई है। उन्हें फिक्र इस बात की है कि अफगानिस्तान फिर से आतंकवाद का अड्डा बन सकता है, जिसका असर उन पर पड़ेगा। अब तक इन देशों को चरमपंथ का मुकाबला करने में अमेरिका से सहयोग की आशा रही है। लेकिन अफगानिस्तान को जिस हाल में अमेरिका ने छोड़ दिया, उससे उन्हें मायूसी हुई है।
ताइवान स्थित विशेषज्ञ चांग चिंग ने चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स से बातचीत में कहा- क्या इसी तरह अमेरिका ने 1970 के दशक में वियतनाम में अपने सहयोगियों को अकेला नहीं छोड़ दिया था? अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के तुरंत बाद चीनी विशेषज्ञों ने ताइवान के अलगाववादियों को चेतावनी दी। चाइना फॉरेन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंध विषय के प्रोफेसर ली हाइदोंग ने कहा- ‘अमेरिका का भाग खड़ा होना ताइवानी अलगाववादियों के लिए एक चेतावनी है। बल्कि यह इस बात की भविष्यवाणी है कि उनके साथ भविष्य में क्या होगा।’
पर्यवेक्षकों का कहना है कि अफगानिस्तान के ताजा घटनाक्रम से दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के दोस्त नेताओं का मनोबल बढ़ेगा। उनमें सबसे ज्यादा निगाह फिलीपीन्स के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते पर है। दुतेर्ते पहले फिलीपीन्स में मौजूद अमेरिकी सैनिकों को निकालने की बात कह चुके हैं, हालांकि हाल में उन्होंने अपना रुख बदल लिया था। आशंका है कि इन नेताओं की अमेरिका विरोधी भावनाएं फिर जाग सकती हैं। फिलपीन्स सरकार के एक अधिकारी ने एशिया टाइम्स से कहा- ‘ये अमेरिका की आदत बन गई है। वह अपने सहयोगियों की परवाह नही करता।’
विज्ञापन
दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में यह पूछा जा रहा है कि हाल में अमेरिका ने उनसे जो वादे किए हैं, उन पर कितना भरोसा किया जा सकता है। अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन कुछ समय पहले सिंगापुर, वियतनाम, और फिलीपीन्स जैसे देशों की यात्रा पर आए थे। उन्होंने चीन के खिलाफ अमेरिकी मुहिम में इन देशों का समर्थन हासिल करने की कोशिश की थी। पर्यवेक्षकों ने कहा है कि जब अमेरिका इन देशों का समर्थन पाने की कोशिश में है, तभी उसे एक ऐसा झटका लगा है, जिसकी तुलना में वियतनाम युद्ध में उसकी हार से की जा रही है। अफगानिस्तान में जो हुआ, उसे अमेरिका की सबसे बड़ी खुफिया नाकामी समझा जा रहा है।
विज्ञापन
वेबसाइट एशिया टाइम्स के टीकाकार मारवान मेकन-मारकर ने एक विश्लेषण में लिखा है- ‘इसमें कोई अचरज की बात नहीं है कि चीन और उसके क्षेत्रीय सहयोगी देश अमेरिका की हार का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैँ। वे यह प्रचारित कर रहे हैं कि अमेरिका ऐसा सहयोगी है, जिस पर यकीन नहीं किया जा सकता। अमेरिका ऐसा देश है, जो देशों के अंदर हस्तक्षेप तो करता है, लेकिन जब उन देशों की जरूरत आती है, तो उन्हें अकेला छोड़ देता है।’
विज्ञापन
दक्षिण-पूर्व एशिया में कई देश हैं, जो इस्लामी चरमपंथ का सामना कर रहे हैँ। इसलिए अफगानिस्तान के घटनाक्रम से फिलीपीन्स, इंडोनेशिया, और थाईलैंड में गहरी चिंता पैदा हुई है। उन्हें फिक्र इस बात की है कि अफगानिस्तान फिर से आतंकवाद का अड्डा बन सकता है, जिसका असर उन पर पड़ेगा। अब तक इन देशों को चरमपंथ का मुकाबला करने में अमेरिका से सहयोग की आशा रही है। लेकिन अफगानिस्तान को जिस हाल में अमेरिका ने छोड़ दिया, उससे उन्हें मायूसी हुई है।
ताइवान स्थित विशेषज्ञ चांग चिंग ने चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स से बातचीत में कहा- क्या इसी तरह अमेरिका ने 1970 के दशक में वियतनाम में अपने सहयोगियों को अकेला नहीं छोड़ दिया था? अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के तुरंत बाद चीनी विशेषज्ञों ने ताइवान के अलगाववादियों को चेतावनी दी। चाइना फॉरेन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंध विषय के प्रोफेसर ली हाइदोंग ने कहा- ‘अमेरिका का भाग खड़ा होना ताइवानी अलगाववादियों के लिए एक चेतावनी है। बल्कि यह इस बात की भविष्यवाणी है कि उनके साथ भविष्य में क्या होगा।’
पर्यवेक्षकों का कहना है कि अफगानिस्तान के ताजा घटनाक्रम से दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के दोस्त नेताओं का मनोबल बढ़ेगा। उनमें सबसे ज्यादा निगाह फिलीपीन्स के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते पर है। दुतेर्ते पहले फिलीपीन्स में मौजूद अमेरिकी सैनिकों को निकालने की बात कह चुके हैं, हालांकि हाल में उन्होंने अपना रुख बदल लिया था। आशंका है कि इन नेताओं की अमेरिका विरोधी भावनाएं फिर जाग सकती हैं। फिलपीन्स सरकार के एक अधिकारी ने एशिया टाइम्स से कहा- ‘ये अमेरिका की आदत बन गई है। वह अपने सहयोगियों की परवाह नही करता।’