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Hindi News ›   World ›   Refusal to stop education despite forced out of school, girl's plight in Afghanistan

Afghanistan: आपबीती- जबरन स्कूल से बाहर होने के बावजूद शिक्षा छोड़ने से इनकार

Wed, 28 Sep 2022 07:03 PM IST
शैलजा श्रीवास्तव यूएन हिंदी समाचार
यूएन हिंदी समाचार Published by: शैलजा श्रीवास्तव Updated Wed, 28 Sep 2022 07:03 PM IST
सार


अफगानिस्तान में सत्ता में आते ही तालिबान ने 12 से 18 साल की लड़कियों को घर पर ही रहने और उनकी शिक्षा रोकने का आदेश जारी किया था। वहीं संयुक्त राष्ट्र समर्थित एक कार्यक्रम की मदद से लड़कियों को इस परिस्थिति में भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यहां लड़िकयां अपनी साथियों को शिक्षा दे रहीं हैं जब तक औपचारिक स्कूली शिक्षा में उनकी वापसी नहीं हो जाती।

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Refusal to stop education despite forced out of school, girl's plight in Afghanistan
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Social Media

विस्तार

अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान का कब्जा होने के एक साल बाद, 17 वर्षीय मुरसल फसीही को अब भी विश्वास नहीं हो रहा है कि वो वापस स्कूल नहीं जा सकती है। कभी एक होनहार छात्रा रहीं फसीही देश के नेतृत्वकर्ताओं के द्वारा बनाए गए नियमों के कारण स्कूली शिक्षा में वापसी करने में असमर्थ हैं।
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मुरसल फसीही महिलाओं और लड़कियों को सार्वजनिक जीवन में भाग लेने से प्रतिबंधित करने जैसे निर्देशों के बारे में जिक्र करते हुए कहतीं हैं कि यह उचित नहीं है कि वो हमारे लिए निर्णय ले रहे हैं। हमें महरम (ऐसा पुरुष साथी जिसके साथ विवाह नहीं हो सकता) के साथ जाते हुए अपना चेहरा छिपाने का आदेश दे रहें हैं, और स्कूल जाना बंद कर रहे हैं।
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मुरसल फसीही ने जुलाई 2021 में 11वीं कक्षा की परीक्षा देते हुए, अपने स्कूल को भीतर से अंतिम बार देखा था। तालिबान ने एक महीने बाद 15 अगस्त को काबुल पर नियंत्रण पाने के बाद पूरे देश को अपने कब्जे में ले लिया था।
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'मुझे अपने दोस्तों, शिक्षकों और स्कूल की याद आती है'

मुरसल फसीही का कहना है कि उनके कुछ दोस्त अफगानिस्तान छोड़ कर जाने में सफल रहे और अब विदेशों में अपनी शिक्षा जारी रख रहे हैं। वो कहतीं हैं कि मुझे सच में अपने दोस्तों, शिक्षकों और स्कूल की बहुत याद आती है। मेरा स्कूल बहुत अच्छा था लेकिन अब मैं वहां नहीं जा सकती। 

मुरसल फसीही का डॉक्टर बनने का सपना भले ही सुनिश्चित न हो लेकिन उनकी उम्मीदें खत्म नहीं होंगी। वे अपने समय का सदुपयोग करने के लिए, यूथ पीयर एजुकेटर्स नेटवर्क (Y-PEER) में शामिल हो गईं हैं, जो संयुक्त राष्ट्र की यौन और प्रजनन स्वास्थ्य एजेंसी - UNFPA द्वारा समर्थित और युवाओं के नेतृत्व में एक क्षेत्रीय कार्यक्रम है।

Y-PEER उन युवाओं के जीवन कौशल के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करता है जो किसी भी प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। मुरसल फसीही गत जुलाई में एक प्रशिक्षण सत्र में शामिल हुईं और अब अफगानिस्तान में Y-PEER के 25 प्रशिक्षकों में से एक हैं। प्रशिक्षण में मुरसल फसीही को विभिन्न मुद्दों पर जागरूक किया गया जिनका सामना अफगान युवा रोज करते हैं।

मुरसल फसीही को यह मालूम नहीं था कि काबुल शहर में कितनी लड़कियां, विशेष रूप से गरीबी से जूझ रही या दूरस्थ इलाकों में रहने वाली युवा लड़कियां बाल विवाह और किशोर गर्भावस्था से पीड़ित हैं।

निर्धनता व दरिद्रता में वृद्धि

अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के साथ आए आर्थिक संकट के परिणामस्वरूप गरीबी में हुई वृद्धि ने कई चिंताओं की चर्चाओं को सामने ला दिया है। बहुत से परिवारों को हताश होकर अपनी कम उम्र की बेटियों की शादी करनी पड़ी ताकि वे उनकी देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी से छुटकारा पा सकें।

मुरसल फसीही बताती हैं कि यह दुखद है क्योंकि कोई लड़की अगर खुद बच्ची है तो वो किसी बच्चे को इस दुनिया में कैसे ला सकती है और उसका पालन-पोषण कैसे कर सकती है? इस उम्र में, हम सिर्फ बच्चे हैं, हमें अपनी शिक्षा जारी रखनी चाहिए, बड़े लक्ष्य रखने चाहिए। यह हमारे शादी करने का समय नहीं है। 

काले बादलों के छंटने का इंतजार

मुरसल फसीही की औपचारिक शिक्षा पाने की इच्छा तो रुकी हुई है पर वह अन्य लड़कियों के लिए एक सहकर्मी शिक्षक बनकर अपना एक नया उद्देश्य ढूंढ रही हैं। वे युवाओं को कम उम्र में शादी और किशोर गर्भावस्था से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूक करने के अलावा, एक बेहतर भविष्य की आशा को साझा करने में सक्षम हैं।


उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की यौन और प्रजनन स्वास्थ्य एजेंसी को बताया कि जब काले बादल छटेंगें, तो हम एक उज्ज्वल सुबह देखेंगे। मुझे उम्मीद है कि युवा लड़कियां हार नहीं मानेंगी। डरना और रोना तो ठीक है, लेकिन हार मान लेना कोई विकल्प नहीं है। मुझे उम्मीद है कि वे किसी भी तरह से सीखना जारी रखेगीं। शायद कोई हमारी सहायता करेगा या स्कूल फिर से खुल जाएंगे। हमारी उज्ज्वल सुबह अवश्य आएगी।

 (नोट: यह लेख संयुक्त राष्ट्र हिंदी समाचार सेवा से लिया गया है।)

 
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