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अफगानिस्तान संकट: तालिबान मसले पर रूस-चीन पर निर्भर हो गए हैं जी-7 देश?
Wed, 08 Sep 2021 03:19 PM IST
अजय सिंह
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को
Published by: अजय सिंह
Updated Wed, 08 Sep 2021 03:19 PM IST
सार
पर्यवेक्षकों का कहना है कि बीते 15 अगस्त को काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद से अफगानिस्तान की स्थिति के बारे में रूस का नजरिया पश्चिम देशों से अलग रहा है।
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विस्तार
जी-7 देशों ने रूस और चीन के साथ साझा बैठक करने की पहल की है। लेकिन रूस ने इस बारे में अभी कोई फैसला नहीं किया है। इसके बदले रूसी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने जी-7 देशों से पूछा है कि अफगानिस्तान के मामले में वे ‘खुद और दुनिया से क्या चाहते हैं?’ रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा से जब इस बारे में सवाल पूछा गया, तो उन्होंने इस पहल पर जवाबी सवाल दाग दिया।
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इसके पहले जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोटेगी ने एक टीवी कार्यक्रम में कहा था कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी से पैदा हुए संकट के बारे में जी-7 देशों के विदेश मंत्री चीन और रूस के विदेश मंत्रियों से बातचीत करना चाहते हैं। गौरतलब है कि जी-7 देशों ने सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूस को अपने ग्रुप का हिस्सा बनाया था। जब ये ग्रुप जी-8 हो गया था। लेकिन 2014 में क्राइमिया मसले पर यूक्रेन से रूस के युद्ध के बाद उसे इस समूह से निकाल दिया गया। जी-7 अपने को उदार लोकतांत्रिक देशों का समूह मानता है। इसमें शामिल सभी सात देश दुनिया के सबसे धनी देश माने जाते हैं।
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जखारोवा ने बताया कि रूस से फ्रांस और जर्मनी ने संपर्क किया है। दोनों ने इच्छा जताई है कि रूस अफगानिस्तान मसले पर जी-7 विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल हो। लेकिन जखारोवा ने कहा कि रूस से इस बारे में औपचारिक रूप से जी-7 ने कोई बात नहीं की है। जखारोवा ने कहा- ‘ये सारी घटनाएं रूस और जी-7 फॉर्मेट में उसकी भागीदारी के बारे में जी-7 देशों के बिखरे बयानों के बीच हो रही हैं। साफ तौर पर जी-7 में शामिल देशों में इस बात को लेकर समझदारी की कमी है कि वे खुद से और दुनिया से क्या चाहते हैं।’
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पर्यवेक्षकों का कहना है कि बीते 15 अगस्त को काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद से अफगानिस्तान की स्थिति के बारे में रूस का नजरिया पश्चिम देशों से अलग रहा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन ने दुनिया से अपील की है कि वह तथ्यों के आधार पर अपनी प्रतिक्रिया जताए। बताया जाता है कि तालिबान पर चीन और रूस का इस समय काफी प्रभाव है। इसलिए पश्चिमी देशों में धीरे-धीरे ये समझ बन रही है कि बिना इन दोनों देशों को साथ लिए वे अफगानिस्तान की घटनाओं को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं हैं।
बीते शनिवार को अमेरिकी नेतृत्व वाले उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के प्रमुख जेन्स स्टोल्टेनबर्ग ने रूस और चीन से मदद मांगी थी। उन्होंने कहा था- ‘मैं गहराई से यह महसूस करता हूं कि रूस और चीन के साथ पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस मकसद के लिए काम करना चाहिए कि अफगानिस्तान ऐसी जगह ना बन सके जहां आतंकवादी खुल कर अपनी गतिविधियां चलाएं और दूसरे देशों पर हमलों की तैयारी करें या उसके लिए धन मुहैया कराएं।’
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने सोमवार को कहा था कि अगर अफगानिस्तान की नई सरकार में देश के सभी जातीय समुदायों को शामिल किया गया, तो रूस उस नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेगा। उन्होंने कहा था- ‘मेरी राय में रूस को अफगानिस्तान की स्थिति को प्रभावित करने में सक्षम तमाम दूसरे आमंत्रित देशों के साथ ऐसे किसी समारोह में भाग लेने में खुशी होगी।’ चीन ने भी तालिबान शासन के प्रति सकारात्मक रुख रखा है। विश्लेषकों का कहना है कि इन वजहों से इन देशों के प्रति तालिबान का रुख भी सकारात्मक है। ऐसे में पश्चिमी देशों में अफगानिस्तान के मसले में रूस और चीन पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।